उत्तर प्रदेश का कृषि विभाग अगले महीने से मिश्रित खेती का एक अभिनव प्रयोग करने जा रहा है। खेतों में एक लाइन में गन्ना रहेगा तो दूसरी लाइन में उड़द, मसूर व अन्य दलहनी फसलें। ज्वार व बाजरा के खेतों में अब अरहर की बोआई भी होगी। इस वर्ष एक लाख 54 हजार हेक्टेयर क्षेत्रफल गन्ने के खेतों में दालें बोई जाएंगी तो अगले वर्ष से इनका क्षेत्रफल बढ़कर चार लाख 84 हजार 400 हेक्टेयर अभी से निर्धारित कर दिया गया है। भविष्य में इसे और भी बढ़ाने की योजना है। किसानों में इस मिश्रित खेती के प्रति दिलचस्पी बढ़ाने के लिए राज्य सरकार 1200 रुपये क्विंटल की सब्सिडी को बढ़ा चार हजार रुपये क्विंटल करने जा रही है। विभाग की इस महत्वाकांक्षी योजना को राज्य के आगामी बजट में भी शामिल कर लिया है। फसलोत्पादन में वृद्धि की उक्त योजना के अनुसार मूंगफली के शौकीनों को गर्मी में पैदा होने वाली मूंगफली की नई फसल का भी स्वाद मिल सकेगा। फर्रुखाबाद, औरैया, मैनपुरी, इटावा व उसके आसपास के इलाकों को मार्च माह में मूंगफली बोने के लिए चिन्हित किया गया है। मार्च में बोई गई मूंगफली की फसल जून-जुलाई के मध्य तैयार हो जायेगी। इसकी बोआई के लिए 40 हजार हेक्टेयर क्षेत्रफल निर्धारित किया गया है। कृषि निदेशक मुकेश गौतम कहते हैं कि गन्ने के साथ दलहनी फसलें बोने के लिए अगले माह से कृषि अधिकारियों की टीमें अलग-अलग क्षेत्रों में किसानों में अलख जगाने निकलेंगी। कृषि विभाग के सर्वेक्षण में पाया गया कि 15 फरवरी से 15 मार्च के बीच जिस समय गन्ने की बोआई होती है, उसी समय जायद की फसलों में उड़द, मूंग व कुछ अन्य दलहनी फसलें भी बोई जाती हैं। ढाई-तीन महीने तक गन्ने की फसल छोटी रहती है, इसलिए उड़द व मूंग की फसल को धूप मिलने की कोई कठिनाई नहीं होगी। गन्ने में नाइट्रोजन की जरूरत पूरी करने के लिए यूरिया का प्रयोग किया जाता है, लेकिन दलहनी फसलों में नैसर्गिक रूप से यह क्षमता होती है कि वे वातावरणीय नाइट्रोजन को इकट्ठा कर लेती हैं।
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Saturday, January 15, 2011
Thursday, January 13, 2011
भौगोलिक पहचान गढऩे की राजनीति
किसान आत्महत्या को रोकने के जितने प्रयास किए गए हैं, वे अब तक नाकाफी साबित हुए हैं और आत्महत्याओं के आंकड़े साल-दर-साल बढ़े ही हैं। विदर्भ क्षेत्र में कई गांवों की पहचान किसानों की आत्महत्या से होती है और समेकित रूप से देश के भीतर विदर्भ की पहचान ‘सुसाइड बेल्ट’ के तौर पर। देश में ऐसी अलग-अलग पहचान के कई क्षेत्र हैं, जिन्हें किसी खास विशेषता के साथ जोड़ दिया गया है। बीते दशक में कई साल विदर्भ के मुकाबले छत्तीसगढ़ में अधिक किसानों ने आत्महत्या की, लेकिन किसान आत्महत्या जैसे विषय के साथ छत्तीसगढ़ स्वाभाविक तौर पर चर्चा में नहीं रहता। ऐसा इसलिए होता है, क्योंकि नक्शे पर खींची गई कई पट्टियों के दायरे में छत्तीसगढ़ आता है और इनमें से किस पट्टी के साथ छत्तीसगढ़ के नाम को नत्थी किया जाए, इसे सत्ता अपनी सुविधानुसार अपने प्रचार तंत्र के जरिए स्थापित करती है। छत्तीसगढ़ को ‘रेड कॉरीडोर’ के प्रतिनिधि चेहरे के बतौर जाना जाता है।
गृह मंत्रालय द्वारा आधिकारिक-अनाधिकारिक तौर पर हर साल यह दावा किया जाता है कि देश के भीतर ‘रेड कॉरीडोर’ लगातार अपना विस्तार कर रहा है। इसको विस्तार देने से न सिर्फ देश के भीतर किसी विकास परियोजना के नाम पर हो रहे विस्थापन विरोधी आंदोलन को रोकने में सहूलियत होती है, बल्कि एक ऐसा प्रदेश, जो आत्महत्या के मामले में शिखर पर पहुंच कर किसान आत्महत्या जैसे बेहद संवेदनशील विषय पर राज्य की असफलता को और अधिक प्रमाणित करने का जरिया बनता, उसे उस पहचान से विमुख किया जाता है। इससे फायदा यह होता है कि ‘सुसाइड बेल्ट’ से इस क्षेत्र को गायब मान लिया जाता है और इस अहसास को प्रमुखता दी जाती है कि आत्महत्या रोकने में राज्य सफल हो रहा है। ‘रेड कॉरीडोर’ को लंबा करने और ‘सुसाइड बेल्ट’ को छोटा करने के साथ ही राज्य और सरकार की सफलता-असफलता जुड़ी हुई है और इसकी लंबाई-चौड़ाई तात्कालिक राजनीतिक परिस्थितियों के मुताबिक बदलती रहती है।
पहचान निर्मिति एक बड़ी राजनीतिक योजना के साथ होती है और इसका न सिर्फ प्रतीकात्मक महत्व है, बल्कि इसमें किसी एक पूरी राजनीतिक विरासत को बिल्कुल भिन्न लबादे में उतारने की भी कोशिश रहती है। मसलन, 1 मई सारी दुनिया में मजदूर दिवस के रूप में मनाया जाता रहा है और इसकी शुरुआत अमेरिका से हुई, जहां के मजदूरों ने प्रतिदिन आठ घंटे को कार्यदिवस के रूप में मानने-मनवाने के लिए लंबा संघर्ष किया। लेकिन, 1984 में रोनाल्ड रीगन ने यह कहते हुए इस दिन को कानून दिवस के रूप में मनाने का आह्वान किया कि दो सौ साल पहले इस दिन ‘मुक्ति और कानून’ के बीच साझेदारी का आरंभ हुआ था। बकौल चोम्सकी, इस घोषणा के बाद मजदूर दिवस का पूरा राजनीतिक संघर्ष राष्ट्रवाद के प्रतीक के तौर पर परिवर्तित हो गया।
राज्य की सहभागिता के बगैर ऐसी किसी भी पहचान का स्थानांतरण मुश्किल होता है। मसलन, नर्मदा में पिछले 25 साल से बड़े बांधों के सामाजिक-आर्थिक प्रभावों के कारण स्थानीय जनता और मानवाधिकार कार्यकर्ता ‘नर्मदा बचाओ आंदोलन’ के बैनर तले संघर्ष कर रहे हैं। इस संघर्ष के दौरान नर्मदा घाटी की एक ऐसी पहचान निर्मित हुई, जिसमें लोग अथक आंदोलन करते हुए सरकारों और कॉरपोरेट ताकतों से जूझ रहे हैं। अब नरेंद्र मोदी ने यह घोषणा की है कि वे सरदार पटेल की ऐसी प्रतिमा यहां लगाएंगे जो दुनिया की सबसे ऊंची प्रतिमा होगी। इस प्रतिमा को लगाने के साथ ही इस घाटी की पहचान और राजनीतिक संघर्ष को झटके में बदलने की यह कोशिश है। सरदार पटेल की पहचान को सरदार सरोवर बांध के साथ मोदी देख रहे हैं और सबसे ऊंचा, सबसे लंबा, सबसे पहले जैसे सामान्य ज्ञान के प्रश्नों के साथ ही गुजरात और नर्मदा घाटी की पहचान बनाने की कोशिश कर रहे हैं।
देश में ‘सुसाइड बेल्ट’ के तहत कई नए क्षेत्र उभर रहे हैं। तमिलनाडु के तिरुपुर में पिछले दो साल में एक हजार से अधिक कपड़ा मजदूरों ने आत्महत्या की। तिरुपुर अभी तक डॉलर सिटी, कॉटन सिटी जैसे नामों से जाना जाता रहा है, लेकिन अब इसे तमिलनाडु की आत्महत्या राजधानी कहा जा रहा है। मजदूरों की आत्महत्या देश में इस अर्थ में नई है कि आत्महत्या को किसान के साथ जोड़ दिया गया है, इसलिए तिरुपुर को ‘सुसाइड बेल्ट’ में आने में वक्त लग सकता है।
गृह मंत्रालय द्वारा आधिकारिक-अनाधिकारिक तौर पर हर साल यह दावा किया जाता है कि देश के भीतर ‘रेड कॉरीडोर’ लगातार अपना विस्तार कर रहा है। इसको विस्तार देने से न सिर्फ देश के भीतर किसी विकास परियोजना के नाम पर हो रहे विस्थापन विरोधी आंदोलन को रोकने में सहूलियत होती है, बल्कि एक ऐसा प्रदेश, जो आत्महत्या के मामले में शिखर पर पहुंच कर किसान आत्महत्या जैसे बेहद संवेदनशील विषय पर राज्य की असफलता को और अधिक प्रमाणित करने का जरिया बनता, उसे उस पहचान से विमुख किया जाता है। इससे फायदा यह होता है कि ‘सुसाइड बेल्ट’ से इस क्षेत्र को गायब मान लिया जाता है और इस अहसास को प्रमुखता दी जाती है कि आत्महत्या रोकने में राज्य सफल हो रहा है। ‘रेड कॉरीडोर’ को लंबा करने और ‘सुसाइड बेल्ट’ को छोटा करने के साथ ही राज्य और सरकार की सफलता-असफलता जुड़ी हुई है और इसकी लंबाई-चौड़ाई तात्कालिक राजनीतिक परिस्थितियों के मुताबिक बदलती रहती है।
पहचान निर्मिति एक बड़ी राजनीतिक योजना के साथ होती है और इसका न सिर्फ प्रतीकात्मक महत्व है, बल्कि इसमें किसी एक पूरी राजनीतिक विरासत को बिल्कुल भिन्न लबादे में उतारने की भी कोशिश रहती है। मसलन, 1 मई सारी दुनिया में मजदूर दिवस के रूप में मनाया जाता रहा है और इसकी शुरुआत अमेरिका से हुई, जहां के मजदूरों ने प्रतिदिन आठ घंटे को कार्यदिवस के रूप में मानने-मनवाने के लिए लंबा संघर्ष किया। लेकिन, 1984 में रोनाल्ड रीगन ने यह कहते हुए इस दिन को कानून दिवस के रूप में मनाने का आह्वान किया कि दो सौ साल पहले इस दिन ‘मुक्ति और कानून’ के बीच साझेदारी का आरंभ हुआ था। बकौल चोम्सकी, इस घोषणा के बाद मजदूर दिवस का पूरा राजनीतिक संघर्ष राष्ट्रवाद के प्रतीक के तौर पर परिवर्तित हो गया।
राज्य की सहभागिता के बगैर ऐसी किसी भी पहचान का स्थानांतरण मुश्किल होता है। मसलन, नर्मदा में पिछले 25 साल से बड़े बांधों के सामाजिक-आर्थिक प्रभावों के कारण स्थानीय जनता और मानवाधिकार कार्यकर्ता ‘नर्मदा बचाओ आंदोलन’ के बैनर तले संघर्ष कर रहे हैं। इस संघर्ष के दौरान नर्मदा घाटी की एक ऐसी पहचान निर्मित हुई, जिसमें लोग अथक आंदोलन करते हुए सरकारों और कॉरपोरेट ताकतों से जूझ रहे हैं। अब नरेंद्र मोदी ने यह घोषणा की है कि वे सरदार पटेल की ऐसी प्रतिमा यहां लगाएंगे जो दुनिया की सबसे ऊंची प्रतिमा होगी। इस प्रतिमा को लगाने के साथ ही इस घाटी की पहचान और राजनीतिक संघर्ष को झटके में बदलने की यह कोशिश है। सरदार पटेल की पहचान को सरदार सरोवर बांध के साथ मोदी देख रहे हैं और सबसे ऊंचा, सबसे लंबा, सबसे पहले जैसे सामान्य ज्ञान के प्रश्नों के साथ ही गुजरात और नर्मदा घाटी की पहचान बनाने की कोशिश कर रहे हैं।
देश में ‘सुसाइड बेल्ट’ के तहत कई नए क्षेत्र उभर रहे हैं। तमिलनाडु के तिरुपुर में पिछले दो साल में एक हजार से अधिक कपड़ा मजदूरों ने आत्महत्या की। तिरुपुर अभी तक डॉलर सिटी, कॉटन सिटी जैसे नामों से जाना जाता रहा है, लेकिन अब इसे तमिलनाडु की आत्महत्या राजधानी कहा जा रहा है। मजदूरों की आत्महत्या देश में इस अर्थ में नई है कि आत्महत्या को किसान के साथ जोड़ दिया गया है, इसलिए तिरुपुर को ‘सुसाइड बेल्ट’ में आने में वक्त लग सकता है।
Tuesday, December 28, 2010
सिंचाई मद में झारखंड को 600 करोड़ का तोहफा
सूखे और अकाल से जूझते झारखंड को केंद्र सरकार से 600 करोड़ रुपये का तोहफा मिला है। यह राशि एक्सीलरेटेड इरिगेशन बेनीफिट प्रोग्राम (एआइबीपी) के तहत योजना आयोग से स्वीकृत हो चुकी है। राज्य अलग होने के बाद यह पहला मौका है जब सूबे के लिए छह गुना अधिक राशि स्वीकृत की गई है। इस मद में झारखंड को अब तक सौ करोड़ रुपये का हिस्सा मिलता रहा है। उप मुख्यमंत्री सुदेश महतो ने जल संसाधन विभाग का प्रस्ताव योजना आयोग के समक्ष रखा था, जिस पर फिलहाल नया तोहफा मिल गया है। जिन तीन राज्यों का गठन दस साल पहले हुआ था, उसमें पड़ोसी छत्तीसगढ़ को इस मद में 300 करोड़ रुपये मिले हैं। सिंचाई योजनाओं के संबंध में पूछे जाने पर सुदेश ने बताया कि पिछली सरकार में पंचपरगना के लिए योजनाएं स्वीकृत की गई थीं। उसे कार्यान्वित करते हुए सूबे की छोटी सिंचाई योजनाओं को अविलंब जमीनी रूप देने का निर्देश दिया है, ताकि आने वाले खेती के समय इसका लाभ किसानों को मिल सके। जो बड़ी योजनाएं लंबित हैं, उसके कार्य में तेजी लाई जा रही है और उम्मीद है यह योजनाएं अपने निर्धारित समय पर पूरी हो जाएंगी। इसमें महत्वाकांक्षी सुवर्णरेखा और पुनासी जलाशय योजनाएं भी शामिल हैं। लिफ्ट और माइक्रोलिफ्ट इरिगेशन प्राथमिकता सूची में है और किसानों की यह मांग भी है। वे खुद इलाकों का भौतिक निरीक्षण कर रहे हैं। दरअसल, कृषि विकास के लक्ष्य को पाने के लिए सिंचाई को सुदृढ़ करना सरकार की प्राथमिकता भी है और इसी अनुरूप योजनाओं की मॉनिटरिंग हो रही है। किसानों के हितों को देखते हुए सिंचाई सरकार की प्राथमिकता रही है।
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