नई दिल्ली धन की कमी के चलते कृषि क्षेत्र में अनुसंधान, नए केंद्रीय विश्वविद्यालयों की स्थापना और कृषि प्रसार का कार्य बुरी तरह प्रभावित हो रहा है। कृषि क्षेत्र में नैनो टेक्नोलॉजी, स्टेम सेल, जेनोमिक्स और बायो रेमिडिएशन जैसे महत्वपूर्ण अनुसंधान प्रभावित हो रहे हैं। इससे खेती की गुणवत्ता व फसलों की उत्पादकता पर विपरीत प्रभाव पड़ने की आशंका है। बजट में लगातार कटौती से कृषि क्षेत्र की लगभग दो दर्जन शोध परियोजनाएं रूक गई हैं। इनमें दलहन, आलू, केला, खुम्बी, विभिन्न भौगोलिक जोन में फसलों की उत्पादकता बढ़ाने के लिए अलग-अलग फार्मूला, लवणीय और क्षारीय जमीनों को उर्वर बनाने, मत्स्य पालन के नए तरीके और जूट मिलों के कचरे को जैविक खाद में तब्दील करने जैसी परियोजनाओं में अनुसंधान प्रभावित हैं। असिंचित क्षेत्रों में वैज्ञानिक खेती और पूर्वी राज्यों में उत्पादकता बढ़ाने की योजना की सफलता पर भी सवाल खड़ा हो गया है। कृषि शिक्षा और कृषि प्रसार को भी धक्का लगा है। धन का उचित आवंटन न होने से देश के विभिन्न हिस्सों में स्थापित होने वाले तीन केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालयों के फैसले दस्तावेजों से वास्तविक जमीन पर नहीं उतर पा रहे हैं। मेघालय के बड़ापानी, बिहार में पूसा और उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड में केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय स्थापित होने में हो रही देरी पर संसद की स्थायी समिति ने सरकार को फटकार लगाई है। समिति के अनुसार धन के अभाव में कृषि क्षेत्र में अनुसंधान व शिक्षा के प्रभावित होने के साथ कृषि प्रसार की पूरी प्रणाली लड़खड़ा गई है। देश में अभी भी महज 589 कृषि विज्ञान केंद्र हैं। जबकि 11वीं पंचवर्षीय योजना के दौरान इनकी संख्या बढ़ाकर 667 की जानी थी। मंत्रालय की ओर से बताया गया है कि निधि के कम आवंटन से इन केंद्रों का ढांचागत विकास नहीं हो पा रहा है। ज्यादातर केंद्रों पर प्रशिक्षण के लिए आने वाले किसानों के रहने के लिए हॉस्टल, स्टाफ क्वार्टर और उपकरणों की भारी कमी है। इस वजह से केंद्र कृषि प्रसार का अपना मूल कार्य नहीं कर पा रहे हैं। कृषि अनुसंधान व शिक्षा विभाग (डेयर) को चालू वित्त वर्ष 2011-12 में 2,800 करोड़ रुपये का आवंटन किया गया है। जबकि 11वीं पंचवर्षीय योजना के लिए विभाग को 12,023 करोड़ रुपये आवंटित किया जाना था। मगर इसमें कटौती से इस दौरान विभाग को केवल 10,054 करोड़ रुपये ही मिल पाए हैं। यह कुल केंद्रीय योजना खर्च का केवल 0.46 फीसदी ही बैठता है
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Monday, September 5, 2011
कर्ज में डूबे हैं देश के आधे किसान
देश के कुल नौ करोड़ किसान परिवारों में से करीब आधे किसान परिवार कर्ज में डूबे हैं। नेशनल सैंपल सर्वे ऑर्गेनाइजेशन (एनएसएसओ) की एक रिपोर्ट में यह तथ्य सामने आया है। पिछले सप्ताह संसद में कृषि मंत्री शरद पवार ने एनएसएसओ की इस रिपोर्ट के हवाले से कहा कि देश में कुल 8.93 करोड़ किसान परिवार हैं। इनमें से 4.34 करोड़ किसान परिवार कर्जग्रस्त हैं। किसान परिवारों की कर्जग्रस्ता शीर्षक से प्रकाशित इस रिपोर्ट में कहा गया है कि देश के करीब 48.6 फीसदी किसानों ने नकदी या अन्य रूप में कर्ज लिया है। आंध्र प्रदेश में सबसे ज्यादा 49.49 लाख किसान परिवार कर्जग्रस्त हैं। यह संख्या प्रदेश के कुल किसान परिवारों की 82 प्रतिशत है। वहीं तमिलनाडु में 74.5 प्रतिशत, पंजाब में 65.4 प्रतिशत, केरल में 64.4 प्रतिशत, कर्नाटक में 61.6 प्रतिशत और महाराष्ट्र में 54.8 प्रतिशत किसान परिवार कर्ज के जाल में उलझे हैं। पवार ने कहा कि किसानों को संस्थागत कर्ज के बोझ से छुटकारा दिलाने के लिए सरकार ने कृषि कर्ज माफी और कर्ज राहत योजना 2008 लागू की थी। इस योजना के तहत करीब 3.69 करोड़ किसानों को 65,318 करोड़ रुपये का अनुदान मंजूर किया गया है। केंद्र सरकार ने इस योजना के तहत अब तक 51,340 करोड़ रुपये की राशि वित्तीय संस्थानों को जारी की है
पांच सौ एकड़ से ज्यादा के भूमि अधिग्रहण पर लागू हो नया कानून
नई दिल्ली प्रस्तावित भूमि अधिग्रहण कानून को संसद में पेश करने से ठीक पहले उद्योग जगत ने इसे लेकर लामबंदी तेज कर दी है। प्रमुख उद्योग चैंबर फिक्की ने अपनी तरह से इस कानून में अपेक्षित बदलावों की एक फेहरिस्त सरकार को सौंपी है। चैंबर ने कहा है कि यह कानून सिर्फ उन्हीं निजी कंपनियों पर लागू होना चाहिए, जो 500 एकड़ या इससे ज्यादा जमीन अधिग्रहीत करती हैं। प्रस्तावित कानून में यह सीमा 100 एकड़ निर्धारित की गई है। अन्य उद्योग चैंबरों की तरफ से भी सरकार को ऐसे ही प्रस्ताव भेजे गए हैं। इंडिया इंक को प्रस्तावित कानून के अधिकांश प्रावधानों से समस्या है। मसलन, किसी भी गांव की जमीन अधिग्रहीत करने के लिए उसके 80 फीसदी प्रभावित परिवारों की सहमति अनिवार्य करने का प्रस्ताव है। फिक्की का कहना है कि अगर 50 फीसदी प्रभावित परिवार भी तैयार हैं, तब भी सरकार को जमीन अधिग्रहण की प्रक्रिया पूरी करने में निजी कंपनियों को मदद करनी चाहिए। फिक्की ने जनहित की परिभाषा के दायरे को भी बढ़ाने का आग्रह किया है। फिक्की का कहना है कि अगर मौजूदा प्रावधानों को लागू किया जाता है तो यह देश में होने वाले निवेश पर काफी विपरीत असर डालेगा। नए कानून में कई ऐसे प्रावधान हैं, जिनके पचड़े में उद्योग जगत नहीं पड़ना चाहेगा। इसलिए वह अपना पैसा किसी दूसरे देश में लगाना पसंद करेगा। इस क्रम में विशेष आर्थिक क्षेत्र यानी एसईजेड का उदाहरण दिया गया है। सरकार ने जब एसईजेड कानून बनाया था, तब इसमें निवेश करने वाली कंपनियों को भारी कर छूट देने का वादा किया था। बाद में कर छूट खत्म करने का निर्णय लिया गया। इससे कई निवेशकों ने एसईजेड से बाहर निकलने का निर्णय किया है। सरकार के इस फैसले के बाद देश में एसईजेड का विकास काफी धीमा हो गया है
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