Friday, December 24, 2010

अब हवा में भी उगेंगी सब्जियां

भारतीय वैज्ञानिकों ने भी तैयार की ऐरोपोनिक्स तकनीक, कराया पेटेंट

आलू का बीज तैयार करने का शोध पूरा

नई दिल्ली। वह दिन दूर नहीं जब आम आदमी अपने घर पर ही बिना जमीन और मिट्टी के ही मनचाही सब्जियों की पैदावार कर सकेगा। वैज्ञानिकों ने हाल ही में ऐरोपोनिक्स नामक ऐसी तकनीक को ईजाद किया है जिसके जरिए जमीन और मिट्टी के बगैर रोगमुक्त बीज तैयार किए जा सकते हैं। इस तकनीक के जरिए वैज्ञानिक ने कई किस्मों के आलू के बीजों को विकसित किया है। अब वैज्ञानिक सब्जियों के व्यवसायिक उत्पादन के लिए इस तकनीक को तैयार करने में जुट गए हैं। दुनिया में अनोखी इस तकनीक को वैज्ञानिकों ने पेटेंट करा लिया है।
भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) के मुताबिक सेंट्रल पोटैटो रिसर्च इंस्टीट्यूट कैंपस (सीपीआरआईसी) मोदीपुरम, मेरठ के वैज्ञानिकों ने हवा में आलू बीज तैयार करने की अनोखी तकनीक ईजाद की है। जमीन से ऊपर बिना मिट्टी के बीज तैयार करने की इस तकनीक की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसके बीजों में किसी तरह का रोग होने की आशंका नहीं रहती। इसीलिए इसका नाम ऐरोपोनिक्स तकनीक रखा गया है। नई तकनीक के बीजों के जरिए आलू के उत्पादन को कई गुना बढ़ाना संभव है।
सीपीआरआईसी के वरिष्ठ वैज्ञानिक सुखविंदर सिंह के मुताबिक ऐरोपोनिक्स तकनीक के तहत एक चेंबर में आलू के बीज तैयार किए जाते हैं। इस चेंबर की तली में कई नोजल लगाई जाती है। जिसके जरिए चेंबर में पानी और हवा पहुंचाई जाती है। जमीन से तीन फुट की ऊंचाई पर चेंबर को रखा जाता है। पानी और हवा को बिजली की मोटर के जरिए पंप किया जाता है। पंप के आगे आधुनिक फिल्टर लगाया जाता है। इससे हवा व पानी दोनो ही सौ फीसदी स्वच्छ हो जाते हैं।

अधूरी उम्मीदों का साल

लेखक कृषि और किसानों की बुनियादी समस्याओं के साथ एक और वर्ष गुजरता देख रहे हैं

2010 तो इतिहास बनने जा रहा है। मैं सशंकित हूं कि क्या नया साल किसानों के लिए कोई उम्मीद जगाएगा? अनेक वर्षो से मैं नए साल से कहले क्रार्थना और उम्मीद करता हूं कि कम से कम यह साल तो किसानों के चेहरे कर मुसकान लाएगा, किंतु दुर्भाग्य से ऐसा कभी नहीं हुआ। साल दर साल किसानों की आर्थिक दशा बद से बदतर होती जा रही है। साथ ही कृषि भूमि किसानों के लिए अलाभकारी होकर उनकी मुसीबतें बढ़ा रही है। रासायनिक खाद के अत्यधिक इस्तेमाल से मिट्टी जहरीली हो रही है। अनुदानित हाइब्रिड फसलें मिट्टी की उर्वरता को नष्ट कर रही हैं और भूजल स्तर को गटक रही हैं। इसके अलावा इन फसलों में बहुतायत से इस्तेमाल होने वाले रासायनिक कीटनाशक न केवल भोजन को विषाक्त बना रहे हैं, बल्कि और अधिक कीटों को पनपने का मौका भी दे रहे हैं। परिणामस्वरूप किसानों की आमदनी घटने से वे संकट में फंस रहे हैं। खाद, कीटनाशक और बीज उद्योग किसानों की जेब से पैसा निकाल रहा है, जिसके कारण किसान कर्ज में डूबकर आत्महत्या जैसे कदम उठाने को मजबूर हैं। इससे इनकार नहीं किया जा सकता कि किसानों के खूनखराबे के लिए सबसे अधिक दोषी कृषि अधिकारी और विश्वविद्यालय के वैज्ञानिक हैं। रोजाना दर्जनों किसान रासायनिक कीटनाशक पीकर अपनी जीवनलीला समाप्त कर लेते हैं। पिछले 15 वर्षो में कृषि विनाश का बोझ ढोने में असमर्थ दो लाख से अधिक किसानों ने आत्महत्या कर ली है। यह सिलसिला रुकता दिखाई नहीं देता। पुरजोर प्रयासों के बावजूद करोड़ों किसान अपनी पीढि़यों को विरासत में कर्ज देने को मजबूर हैं। सरकार और कृषि विश्वविद्यालयों को अकारण दोषी नहीं ठहराया जा रहा है, किंतु एक हद तक किसान भी इस संकट के लिए जिम्मेदार हैं। जल्दी से जल्दी पैसा कमाने का लोभ उन्हें गैरजरूरी प्रौद्योगिकियों की ओर खींच रहा है, जो अंतत: उनके हितों के खिलाफ हैं। लंबे समय से किसान उपयोगी कृषि व्यवहार से विमुख होते जा रहे हैं और कृषि उद्योग व्यापार के जाल में फंसते जा रहे हैं। उद्योग उन्हें एक सपना बेच रहा है-जितनी अधिक उपज प्राप्त करोगे, उतनी ही कमाई होगी, जबकि असलियत में उद्योग जगत का मुनाफा बढ़ रहा है, किसानों को तो मरने के लिए छोड़ दिया गया है। हरित क्रांति के 40 साल बाद 90 प्रतिशत से अधिक किसान गरीबी रेखा के नीचे जीवनयापन कर रहे हैं। मानें या न मानें, देश भर में किसान परिवार की औसत आय 2400 रुपये से भी कम है। यह भी तब जब किसान अधिक आय के चक्कर में तमाम प्रौद्योगिकियों का इस्तेमाल कर रहे हैं। इस प्रकार अनेक रूपों में किसानों के साथ जो श्राप जुड़ गया है उसके लिए वे भी कम जिम्मेदार नहीं हैं। जरा इस पर विचार करें कि क्या किसानों को कृषि संकट के लिए दोषी नहीं ठहराया जाना चाहिए? आप कब तक सरकार और कृषि विश्वविद्यालयों के सिर ठीकरा फोड़ते रहेंगे। आप कृषि से दीर्घकालिक और टिकाऊ तौर पर अधिक आय हासिल क्यों नहीं करते? कृपया यह न कहें कि यह असंभव है। अगर किसान अपने परंपरागत ज्ञान का इस्तेमाल कृषि में करें तो वे इस लक्ष्य को आसानी से हासिल कर सकते हैं। महाराष्ट्र के यवतमल जिले के डरोली गांव के ­­­सुभाष शर्मा से मिलिए। वह उस विदर्भ पट्टी से हैं जहां बड़ी संख्या में किसान आत्महत्या करते हैं, लेकिन वह कृषि से अच्छी-खासी आमदनी हासिल कर रहे हैं। सुभाष शर्मा कोई बड़े किसान नहीं हैं। उनके पास 16 एकड़ जमीन है। देश में अधिकांश किसानों की तरह वह भी कर्ज के जाल में फंसे हुए थे। सुभाष के अनुसार, 1988 से 1994 के बीच का समय मेरे लिए सबसे बड़ी परेशानी का समय था। तब मैंने इस चक्रव्यूह से बाहर निकलने का उपाय ढूंढा और कर्ज का जुआ उतार फेंका। मैंने रासायनिक खाद और कीटनाशकों की कृषि पद्धति को तिलांजलि दे दी और ऑर्गेनिक कृषि को अपना लिया। इससे एक नई शुरुआत हुई। वह कहते हैं कि कर्ज के इस भयावह चक्र से बाहर निकलने का एक ही रास्ता है कि किसान हरित क्रांति के कृषि मॉडल का त्याग कर दें। हरित क्रांति कृषि व्यवस्था में मूलभूत खामियां हैं। इसमें कभी भी किसान के हाथ में पैसा नहीं टिक सकता। अब वह देश भर में कार्यशाला आयोजित कर किसानों को जागरूक कर रहे हैं कि प्राकृतिक कृषि के तरीकों से कर्ज के जाल को कैसे काटा जा सकता है। कृषि संवृद्धि और देश की खाद्यान्न सुरक्षा का जवाब इसी में निहित है। सुभाष शर्मा की आर्थिक स्थिति इतनी सुदृढ़ हो गई है कि उन्होंने कामगारों के लिए 15 लाख का आपात कोष भी जुटा लिया है। किसी की मृत्यु होने पर या फिर बेटी के विवाह के अवसर पर उनके सामाजिक सुरक्षा कोष से कुछ राहत मिल जाती है। वह श्रमिकों के बच्चों की शिक्षा का खर्च भी उठाते हैं। इसके अलावा उन्हें बोनस और छुट्टी यात्रा का भत्ता भी देते हैं। चौंकिए मत, सुभाष शर्मा अपने 51 कामगारों को प्रतिवर्ष 4.5 लाख रुपये का बोनस देते हैं, जो प्रति व्यक्ति 9000 रुपये बैठता है। वह अपने श्रमिकों को साल में एक बार घूमने के लिए छुट्टी देते हैं। प्रत्येक कामगार को साल में पचास दिन की छुट्टियां मिलती हैं। एक ऐसे समय में जब शायद ही किसी दिन श्रमिकों के साथ अमानवीय अत्याचार की खबरें न आती हों, इस तरह का रवैया सुखद आश्चर्य में डालने वाला है। जहां तक कीटनाशकों का सवाल है, हरियाणा के जींद जिले में चुपचाप एक क्रांति हो रही है। यहां के किसान बीटी कॉटन पैदा नहीं करते, बल्कि प्राकृतिक परभक्षियों पर भरोसा करते हैं। ये परभक्षी कीट नुकसानदायक कीटों को चट कर जाते हैं। उन्होंने कपास में लगने वाले प्रमुख कीट मिली बग का प्राकृतिक उपाय खोज निकाला है। जींद के सुरेंद्र दलाल ने बड़े परिश्रम के बाद मिली बग को काबू में करने में सफलता प्राप्त कर ली है। उन्होंने इस विषय पर काफी शोध किया और इस नतीजे पर पहुंचे कि नुकसान न पहुंचाने वाली आकर्षक लेडी बीटल इन मिली बगों को चट करने के लिए काफी हैं। यह इन मिली बग को बड़े चाव से खाती है, जिससे किसानों का महंगे कीटनाशकों पर पैसा खर्च नहीं होता। उन्होंने महिला पाठशाला भी शुरू की है। इन दो किसानों ने कृषि क्षेत्र में नया अध्याय लिख दिया है। अब सही समय है कि आप इनकी सफलता से सबक लें और कृषि का खोया हुआ गौरव वापस लौटा दें। निश्चित तौर पर आप यह कर सकते हैं। इसके लिए बस दृढ़ निश्चय की आवश्यकता है। तभी हम उम्मीद कर सकते हैं कि किसानों के लिए नया वर्ष नया हर्ष लेकर आएगा। (लेखक कृषि मामलों के विशेषज्ञ हैं)

Thursday, December 23, 2010

राग ने जगा दिए फसलों के भाग

भारत के प्राचीन धर्मग्रंथों में बताया गया है कि जब श्रीकृष्ण बांसुरी बजाते थे तो उसकी मीठी तानकर गोपियां अपनी सुध-बुध खो बैठती थीं और गाएं अधिक दूध देती थीं। इसीतरह संगीत सम्राट तानसेन राग मेघ मल्हार गाकर वर्षा करा देते थे और राग दीपक से कमल खिला देते थे। इसी प्राचीन अवधारणा की परख करने में कुछ भारतीय कृषि वैज्ञानिक जुटे हुए हैं। क्या स्वर लहरियों की खुराक से पेड़-पौधों की बढ़त को बेहतर बनाया जा सकता है। यह वह सवाल है, जो कई दशकों से वैज्ञानिकों के मन को मथता रहा है और इसके आधार पर मध्यप्रदेश का वन विभाग इन दिनों एक सुरीले प्रयोग को सींच रहा है। इस प्रयोग के तहत कुछ वृक्ष प्रजातियों को सूर्योदय से एक घंटा पहले से सूर्यास्त तक मशहूर सितार वादक रविशंकर की राग भैरवी में निबद्ध रचना सुनाई जा रही है। वन विभाग के अधिकारियों का दावा है कि सितार की स्वर लहरियों से आंवला और सीताफल (शरीफा) सरीखी फल प्रजातियों के बीजों में अंकुर फूटने की दर में नौ प्रतिशत का इजाफा दर्ज किया गया है। विभाग के इंदौर स्थित अनुसंधान और विस्तार केंद्र के मुख्य वन संरक्षक (सीसीएफ) पंकज श्रीवास्तव ने बताया, इस प्रयोग के जरिए हम पता लगाना चाहते हैं कि पौधों की बढ़त पर संगीत का क्या असर होता है। हम यह भी जानना चाहते हैं कि क्या संगीत के प्रति पौधों की संवेदनशीलता के वाणिज्यिक उपयोग की संभावनाएं तलाशी जा सकती हैं। महीने भर पहले शुरू हुए इस प्रयोग से जुड़ी वन विभाग की रेंज अफसर रेखा काले बताती हैं कि विभागीय नर्सरी में अलग-अलग जगहों पर कुल चार क्यारियां तैयार की गईं। इनमें आंवला और सीताफल और कुछ दूसरी प्रजातियों के बीज समान मात्रा में डाले गए। रेखा ने बताया कि इन क्यारियों को एक जैसा खाद-पानी दिया गया। मगर इन्हें सितार की स्वर लहरियों की खुराक अलग-अलग ढंग से दी गई। एक क्यारी को इन स्वर लहरियों से पूरी तरह दूर रखा गया, जबकि तीन अन्य क्यारियों को अलग-अलग वक्त पर सितार का संगीत सुनाया गया। वन विभाग की रेंज अफसर ने कहा, हमने पाया कि उस क्यारी में आंवला और सीताफल के बीजों का अंकुरण अपेक्षाकृत तेज गति से हुआ, जिसे सूर्योदय से सूर्यास्त तक सितार की स्वर लहरियां सुनाई गई थीं। अंकुरण की यह दर उस क्यारी के मुकाबले नौ प्रतिशत अधिक थी, जिसे ए स्वर लहरियां बिल्कुल नहीं सुनाई गई थीं। भोपाल के बरकतुल्लाह विश्वविद्यालय की व्याख्याता श्रीपर्णा सक्सेना इस प्रयोग में वन विभाग की मदद कर रही हैं। उन्होंने कहा, संगीत के पेड़-पौधों पर प्रभाव के बारे में दुनिया भर में कई अनुसंधान किए गए हैं। हमें अपने प्रयोग की शुरूआत में अंकुरण को लेकर बेहद सकारात्मक रुझान मिले हैं। लेकिन इसका असली निष्कर्ष तीन से चार महीने के बाद निकल सकता है, जब इस प्रयोग का पहला चरण समाप्त हो जाएगा।

Tuesday, December 21, 2010

खोजा जा रहा दुधारू भैंस का रहस्य

 गुजरात का आणंद कृषि  विश्वविद्यालय ऐसे जैव प्रौद्योगिकीय अध्ययनों में लगा है, जिससे यह पता लग सकता है कि कोई भैंस ज्यादा अथवा कम दूध क्यों देती है या उसके गर्भधारण में देर क्यों होती है या फिर उस पर किसी आम बीमारी का असर क्यों नहीं पड़ता! विश्वविद्यालय के वैज्ञानिक इसके लिए भैसों का जिनोम-मानचित्रण यानी इस पशु की कोशिकाओं का सूक्ष्म से सूक्ष्म विश्लेषण कर रहे हैं। इसमें गुजरात में पाई जाने वाली भैंसों की चार नस्लों को चुना गया है। आणंद कृषि विश्वविद्यालय के पशु जैवप्रौद्योगिकी विभाग के प्रोफेसर और परियोजना के प्रभारी सीजे जोशी ने बताया, हम जाफराबादी, मेहसाणी, सूरती और बान्नी, गुजरात में पाई जाने वाली इन चारो नस्लों की भैंसों के एसएनपी (सिंगल निक्लियोटाइड पॉलीमॉरफिज्म) की पहचान करेंगे। उन्होंने कहा कि एसएनपी का संबंध दुधारूपन, प्रजनन क्षमता और रोग प्रतिरोधक क्षमता से है। यह पशुओं के जीन की व्यवस्था में परिवर्तन का परिणाम है। इस परियोजना के माध्यम से ऐसे भैंसे (नर) की पहचान की जाएगी जिनमें ऐसे अनुकूल जीन हों जो ज्यादा दूध देने वाले, अधिक प्रजनन क्षमता वाले पशुओं के प्रजनन में सहायक हो सकें। इस परियोजना में हर नस्ल की दस-दस भैंसे ली जा रही हैं। जोशी ने कहा कि कोई दुधारू भैंस कम या अधिक दूध देने वाली होगी यह निर्धारण उसमें पाए जाने वाले करीब 400 प्रकार के जीन से तय होता है। जोशी के अनुसार इस परियोजना में अब तक जाफराबादी भैंसों की 64,212 डीएनए कडि़यों का चित्रण किया जा चुका है। इन्हें वैज्ञानिकों की बोलचाल की भाषा में कांटिग कहा जाता है। अब तक के विश्लेषणों को नेशनल सेंटर फॉर बायोटेक्नोलॉजी इंफॉर्मेशन (एनसीबीआई) के पास जमा कराया गया है। एनसीबीआई एक जीन बैंक है जहां जीनोम सूचनाओं को सुरक्षित रखा जाता है। जीनोम मानचित्रण को सुगम बनाने के लिए गुजरात सरकार ने पहली बार आणंद विश्वविद्यालय में हाई थ्रूपुट जीनोम सीक्वेंसर सिस्टम लगाया है।