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Wednesday, June 1, 2011

खेती की खतरनाक खरीद


लेखक औद्योगिक विकास के नाम पर कृषि योग्य भूमि के अंधाधुंध अधिग्रहण के
गंभीर खतरे गिना रहे हैं…

1996 में विश्व बैंक के तत्कालीन उपाध्यक्ष और अंतरराष्ट्रीय कृषि अनुसंधान सलाहकार समूह के अध्यक्ष डॉ. इस्माइल सेरेगेल्डिन ने एक बयान जारी किया। उन्होंने कहा कि विश्व बैंक का आकलन है कि अगले बीस वर्षो में भारत में ग्रामीण क्षेत्र से शहरी क्षेत्रों में विस्थापन करने वालों की संख्या फ्रांस, ब्रिटेन और जर्मनी की कुल आबादी के दोगुने से भी अधिक हो जाएगी। ब्रिटेन, फ्रांस और जर्मनी की कुल आबादी करीब 20 करोड़ है। इस प्रकार विश्व बैंक का मानना था कि 2015 तक भारत में 40 करोड़ लोग गांवों से शहरों में चले जाएंगे। मैंने समझा कि यह एक चेतावनी है, किंतु जब मैंने इसके बाद की विश्व बैंक की अन्य रपटों का अध्ययन किया तो मुझे उसके असल इरादों का भान हुआ। दरअसल, विश्व बैंक इस प्रक्रिया को रोकना नहीं, तेज करना चाहता था। 2008 में जारी विश्व विकास रिपोर्ट में विश्व बैंक ने स्पष्ट रूप से उल्लेख किया कि भारत में भूमि की किरायेदारी शुरू होनी चाहिए। इसके अनुसार, भूमि बहुत ही महत्वपूर्ण संसाधन है, किंतु यह ऐसे लोगों (किसानों) के हाथों में केंद्रित है, जो इसका कुशलतापूर्वक उपयोग नहीं करते। विश्व बैंक का कहना है कि इन लोगों को इन संसाधनों से बेदखल कर देना चाहिए और भूमि उन लोगों को सौंप देनी चाहिए जो इसका कुशलता से उपयोग कर सकें और वास्तव में ये लोग कॉरपोरेट क्षेत्र के ही हो सकते हैं। किसानों को उनकी जमीन से बेदखल करने की यह प्रक्रिया लंबे समय से चल रही है और अब अपने चरम पर पहुंच गई है। जिस तेज रफ्तार से सरकार भूमि अधिग्रहण के माध्यम से किसानों को जमीन से बेदखल कर रही है इससे विश्व के सामने खाद्य सुरक्षा का संकट गहराता जा रहा है। दुर्भाग्य से हमें यह समझाने की कोशिश की जाती है कि खाद्य उत्पादन के मोर्चे पर घबराने वाली कोई बात नहीं है, क्योंकि कॉरपोरेट जगत खाद्यान्न का कुशलतापूर्वक उत्पादन कर सकता है। मुख्यत: इसी मंशा से 1995 में विश्व व्यापार संगठन के अस्तित्व में आने के बाद से विकासशील देशों में धनी देशों की ओर से अनुदानित और सस्ती दरों पर खाद्यान्न के आयात की बाढ़ आ गई है। इसी प्रकार मुक्त व्यापार समझौतों के नाम पर द्विपक्षीय समझौते और क्षेत्रीय व्यापार संधियों के माध्यम से विकासशील देशों में औद्योगिकीय उत्पादित खाद्यान्न और खाद्य उत्पादों के लिए बाजार विकसित किया जा रहा है। इस प्रकार भूमि और जीविकोपार्जन केंद्रीय मुद्दों में तब्दील हो चुके हैं। ग्रामीण भारत से 40 करोड़ लोगों के संभावित विस्थापन से भारत अब तक विश्व में हुए सबसे बड़े पर्यावरणीय विस्थापन का साक्षी बन जाएगा। यह अवधारणा केवल भारत तक ही सीमित नहीं रहेगी, बल्कि एक बड़ा क्षेत्र इसकी चपेट में आ जाएगा। मेरा अनुमान है कि आने वाले वर्षो में भारत और चीन के 80 करोड़ लोग गांवों से शहरों की ओर कूच कर जाएंगे। जिन करोड़ों लोगों को विस्थापन के लिए मजबूर किया जा रहा है उन्हें कृषि शरणार्थी कहा जा सकता है। क्या हम समझ सकते हैं कि विश्व किस दिशा में जा रहा है? क्या हम अनुमान लगा सकते हैं कि इस भयानक रफ्तार से विस्थापन के कारण कितने गंभीर सामाजिक-आर्थिक और साथ ही राजनीतिक संकट खड़े हो सकते हैं? इसके बजाय हमें बताया जा रहा है कि बढ़ता शहरीकरण वैश्वीकरण और आर्थिक संवृद्धि का अपरिहार्य परिणाम है। हमें बार-बार बताया जा रहा है कि वैश्वीकरण ने राष्ट्रीय सीमाओं का अंत कर दिया है। यह सुनने में अच्छा लग सकता है, किंतु मुझे लगता है कि आने वाले कुछ बरसों में राष्ट्रों की सीमाएं धुंधली होने के बजाए और गहरी व लंबी हो जाएंगी। विकासशील देशों में जिस रफ्तार से और जिस हद तक भूमि हड़पने का सिलसिला चल रहा है वह चिंता का विषय है। उदाहरण के लिए एक भारतीय कंपनी ने अफ्रीका और लैटिन अमेरिका में तीन हजार वर्ग किलोमीटर भूमि हासिल कर ली है। यह क्षेत्र बहुत से छोटे देशों के क्षेत्रफल से भी अधिक है। एक दिन इस भूमि के मालिक झंडा फहराकर यह घोषणा कर सकते हैं कि यह एक स्वतंत्र राष्ट्र है। आप इस संभावना को खारिज कर सकते हैं, किंतु हमें अधिक सावधानी से काम लेना होगा। देर-सबेर समाज कृषि, खाद्य सुरक्षा और भूमि संसाधन की सच्चाई से रूबरू होगा। जितना जल्द यह होगा, उतना ही बेहतर होगा। समस्या यह है कि हम इस तरह के गंभीर मुद्दों पर किसी खास नजरिये और परिप्रेक्ष्य में ही विचार करते हैं, जबकि जमीनी सच्चाई यह है कि ये मुद्दे बहुआयामी और बहुकोणीय होते हैं। जब तक हम ऐसा करने में सफल नहीं होंगे तब तक हम सही संदर्भ में विशिष्ट विचार प्रस्तुत करने में सफल नहीं होंगे। मैं जिन मंचों पर जाता हूं उनमें यह व्यापक सोच नदारद नजर आती है। शायद यही कारण है कि हम अंतरदृष्टि और सार्थकता के साथ असल मुद्दों से भटक जाते हैं। कृषि-व्यापार से यह प्रतीत होता है कि भारत और चीन जैसे देशों को अन्य देशों में अधिक खाद्य उत्पादन करना चाहिए। घरेलू आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए भारत और चीन द्वारा विदेशों में भूमि की खरीदारी को न्यायोचित ठहराया जा रहा है। अधिक खाद्यान्न उत्पादन की जरूरत के मद्देनजर भारी-भरकम कृषि भूमि की खरीदारी की वकालत की जा रही है। आज लैटिन अमेरिका, अफ्रीका और एशिया में शायद ही कोई देश हो जिसकी भूमि न हड़पी जा रही हो। भुखमरी और कुपोषण के शिकार इथियोपिया में आठ हजार से अधिक कंपनियां जमीन हथियाने के प्रयास में हैं। यह देश पहले ही 2000 कंपनियों को 27 लाख हेक्टेयर भूमि आवंटित कर चुका है, जिसमें भारत की कंपनियां भी शामिल हैं। ये कंपनियां इथियोपिया के लिए खाद्यान्न का उत्पादन नहीं करेंगी, बल्कि इसका निर्यात करेंगी। यहां से उत्पादित खाद्यान्न की पहली खेप सऊदी अरब भेजी भी जा चुकी है, जबकि इस देश की जनता दाने-दाने की मोहताज है। यह मुझे इतिहास के काले अध्याय की याद दिलाता है। कुछ दशक पहले आयरलैंड के अकाल की 150वीं वर्षगांठ के आयोजन में मैंने भाग लिया। यह अकाल 19वीं सदी के मध्य में पड़ा था। सम्मेलन का उद्घाटन करते हुए शहर के मेयर ने कहा था कि मैं हैरान हूं कि उस समय कितने बर्बर लोग थे। लोग भूख से मर रहे थे और फिर भी खाद्यान्न के बोरे के बोरे इंग्लैंड भेजे जा रहे थे। मुझे नहीं लगता कि समाज की इस बर्बर प्रकृति में कोई अंतर आया है। आने वाले समय में हम और भी बर्बर समाज में रहेंगे। इथियोपिया में जिस तरह भूमि हड़पी जा रही है, यह बर्बरता से कम नहीं है। देश में लोग भूख से मर रहे हैं और कंपनियों के पास खाद्यान्न के निर्यात की कानूनी अनुमति है। भविष्य में ऐसे और भी उदाहरण देखने को मिलेंगे। (लेखक कृषि एवं खाद्य नीतियों के विश्लेषक हैं)


Friday, April 1, 2011

खाद्य सुरक्षा की कुंजी


लेखक उत्तर प्रदेश सरकार के दो हजार मंडियों की स्थापना के फैसले में किसानों की खुशहाली देख रहे हैं …..
वाल-मार्ट और टेस्को जैसी विशाल सुपरमार्केट रिटेल चेन के भारत में काम शुरू करने पर छिड़ी बहस के बीच उत्तर प्रदेश सरकार ने मंडियों के मौजूदा तंत्र के विस्तार की रूपरेखा तैयार कर ली है। उत्तर प्रदेश में अगले चार साल में 2105 मंडियों का गठन हो जाएगा। अकेला यह कदम ही आपूर्ति की बाधाओं को दूर कर देगा जिससे किसानों को एक सुनिश्चित बाजार मिल जाएगा। मंडियों के व्यापक तंत्र और वह भी किसानों की पहुंच के भीतर होने के कारण ही आज पंजाब देश का खाद्य कटोरा बन गया है। प्रसिद्ध कृषि प्रशासक डॉ. एमएस रंधावा का एक प्रसंग मुझे याद आ रहा है। पंजाब में हरित क्रांति के बीज पड़ने के तुरंत बाद तत्कालीन मुख्यमंत्री लक्ष्मण सिंह गिल ने रंधावा से पूछा कि वह ऐसा क्या काम करें कि उनका नाम इतिहास में अमर हो जाए। रंधावा ने उन्हें सलाह दी कि मंडियों तक पक्के संपर्क मार्गो का निर्माण करा दें, ताकि किसान आसानी से वहां तक पहुंच सकें। लक्ष्मण सिंह ने खरीद केंद्रों से मंडियों तक सड़कों का जाल बिछा दिया। शेष इतिहास है। मैं यह देखकर बहुत खुश हूं कि मायावती सरकार कृषि में इसी प्रकार का विपणन निवेश कर रही हैं। मंडियों का प्रस्तावित ढांचा किसानों को मजबूरी में सस्ती दरों पर व्यापारियों को फसल बेचने से बचाएगा। मंडियों के ढांचे के अभाव में फसल का कोई ऐसा सीजन नहीं होता जब किसानों का बिचौलियों के माध्यम से शोषण न होता हो। यह देखना असामान्य नहीं है कि अपनी फसल को बेचने के लिए किसान पड़ोसी राज्यों तक पहुंचते हैं। उदाहरण के लिए, हर साल पश्चिमी उत्तर प्रदेश के बहुत से किसान गेहूं बेचने के लिए पड़ोसी हरियाणा का रुख करते हैं। उत्तर प्रदेश देश का सबसे अधिक आबादी वाला राज्य है और यही खाद्यान्न का सबसे बड़ा उत्पादक भी है। किंतु पश्चिम के कुछ क्षेत्रों को छोड़कर यहां कृषि विपणन की सुविधाएं बेहद कम हैं। इसीलिए यहां कृषि एक अभिशाप बन गई है। सुनिश्चित बाजार के अभाव में उत्पादन में सुधार के सही निवेश के लिए किसानों को कोई बढ़ावा नहीं मिलता है। न ही वे फसल का उचित दाम हासिल करते हैं। पंजाब और हरियाणा के विपरीत, जहां सरकारी खरीद केंद्र और मंडियों का मजबूत जाल है, उत्तर प्रदेश इस क्षेत्र में काफी पिछड़ा हुआ है। उत्तर प्रदेश में केवल 300 सरकारी खरीद केंद्र हैं। प्रस्ताव के अनुसार प्रदेश में हर साल पांच सौ मंडियों की स्थापना होगी। मंडियों के इस विशाल ढांचे से किसानों की निकटतम मंडी तक पहुंचने की औसत दूरी भी घटकर सात किलोमीटर रह जाएगी। इन मंडियों का संचालन निजी क्षेत्र के हाथों में सौंपने की बजाय, जैसा कि योजना आयोग सलाह दे रहा है, मुख्यमंत्री मायावती ने इनका नियंत्रण राज्य कृषि उत्पादन विपणन बोर्ड को सौंपकर बिल्कुल सही कदम उठाया है। इससे इनकार नहीं किया जा सकता कि पिछले कुछ सालों के दौरान कमीशन एजेंटों ने पूरी तरह से मंडियों पर नियंत्रण कर लिया है। यह समस्या इसलिए पैदा हुई क्योंकि राजनीतिक दलों ने मंडियों का नियंत्रण आढ़तियों के हाथों में सौंप दिया। पेशेवरों द्वारा संचालित होने के बजाए देश की अधिकांश मंडियों में प्रबंधन कमीशन एजेंटों के हाथ में है। किंतु इसका इलाज मंडियों को खत्म कर देने या इनका नियंत्रण निजी कंपनियों के हाथों में सौंपना नहीं है। राजनीतिक दखल से परे एक बेहतर नियामक मंडियों को पुनर्जीवित तथा अधिक प्रभावी कर सकता है। न ही इसका जवाब बड़े खाद्यान्न सुपरमार्केट को भारत में दुकाने खोलने की अनुमति प्रदान करने में है। वाणिज्य मंत्रालय और योजना आयोग वाल-मार्ट और टेस्को जैसी रिटेल चेन को भारत में प्रवेश दिलाने की जबरदस्त पैरवी कर रहे हैं। इनकी दलील है कि इससे किसानों को बेहतर कीमत और ग्राहकों को सस्ती दरों पर खाद्यान्न मिल सकेगा। बड़ी रिटेल चेन से यह भी अपेक्षा जताई जा रही है कि वे मध्यस्थों का खात्मा कर देंगी, जिसका लाभ किसानों को होगा। मुझे लगता है कि कृषि क्षेत्र में सुधारों के नाम पर अब निजी खिलाडि़यों को प्रवेश देने का अधिक दबाव पड़ेगा। अंतरराष्ट्रीय खाद्य नीति अनुसंधान संस्थान (आइएफपीआरआइ) का कहना है, भारत में किसानों को मंडियों में लूटा जा रहा है, और उपभोक्ता बाजार से भारी दामों में खाद्यान्न खरीद रहे हैं। यह दलील बेतुकी है। अनुभव बताता है कि बड़ी खाद्य रिटेल चेन से न तो किसानों का भला हुआ है और न ही उपभोक्ताओं का। न ही इस चेन से रोजगार के अवसर बढ़े हैं। बड़े सुपरमार्केटों का यह दावा कि वे बड़ी संख्या में नौकरियां देकर आर्थिक संवृद्धि को गति देंगे, थोथा साबित हुआ है। इंग्लैंड में, टेस्को और सेंसबरी जैसी दिग्गज रिटेल चेन हजारों नौकरियां पैदा करने के अपने दावों पर खरी नहीं उतरीं। पिछले दो सालों के दौरान, टेस्को ने एक हजार और सेंसबरी ने 13 हजार नौकरियां देने का वायदा किया था, जबकि हकीकत में टेस्को ने कुल 726 लोगों को रोजगार दिया है, जबकि सेंसबरी ने 1600 लोगों को नौकरी से निकाल दिया है। मैं हमेशा से कहता आ रहा हूं कि अगर सुपरमार्केट वास्तव में किसानों के इतने ही हितसाधक हैं तो अमेरिका किसानों को विशाल अनुदान क्यों दे रहा है। आखिरकार, विश्व की सबसे बड़ी रिटेल चेन वाल-मार्ट का जन्म अमेरिका में ही हुआ है और इसे अमेरिका के किसानों को आर्थिक रूप से इतना समर्थ बना देना चाहिए था कि उन्हें सब्सिडी की जरूरत ही न पड़ती। किंतु ऐसा नहीं हुआ। अमेरिका के किसान सरकारी सब्सिडी की बैसाखी पर खड़े हैं। 1995 से 2009 के बीच 12.50 लाख करोड़ रुपये की सब्सिडी अमेरिकी किसानों को दी गई है। इसमें प्रत्यक्ष आय सहयोग भी शामिल है। जरूरत भारत में मंडियों का राष्ट्रव्यापी ढांचा खड़ा करने की है। यह जानना जरूरी है कि अगर पंजाब में मंडियों का विकसित तंत्र खड़ा न होता, तो यह देश का खाद्यान्न कटोरा न होता। मंडियों में सुनिश्चित सरकारी खरीद के बल पर ही किसानों को अपनी पैदावार का अधिक दाम मिलता है। पंजाब में भारी संख्या में मंडियों की मौजूदगी के कारण ही वहां फसल के समय कम दामों में उपज बेचने की घटनाएं देखने में नहीं आतीं। उत्तर प्रदेश में ऐसा कोई साल नहीं है जब फसल के समय निजी व्यापारी किसानों से कम दाम में उपज खरीद कर उन्हें लूट न लेते हों। उत्तर प्रदेश में मंडियों की कम संख्या के कारण यहां के किसानों को भारी नुकसान उठाना पड़ा है। नेशनल सैंपल सर्वे ऑर्गेनाइजेशन के अनुसार, एक औसत किसान परिवार की मासिक आय उत्तर प्रदेश में सबसे कम है। (लेखक कृषि मामलों के विशेषज्ञ हैं )

Sunday, February 20, 2011

फिर उम्मीद पर टिकी कृषि


लेखक बजट में फिर किसानों के नाम पर कृषि व्यापार उद्योग को बढ़ावा मिलने की आशंका जता रहे हैं….
पिछले छह-सात साल के बजट पर निगाह डालें तो लगता है कि सरकार खाद्य और कृषि पर विशेष ध्यान दे रही है। तमाम वित्त मंत्री कृषि क्षेत्र को लेकर उदासीनता पर यह कहकर पर्दा डालते रहे हैं कि उनका बजट किसानों की आजादी लेकर आया है या फिर यह बजट कृषि क्षेत्र की जीवनरेखा है। हालांकि सच्चाई यह है कि हालिया वर्षो के तमाम बजट में किसानों की दशा में बदलाव लाने वाले निवेश से कन्नी काटकर कृषि की घोर उपेक्षा की गई है। इस साल का बजट भी पिछले बजटों का अपवाद नहीं होगा। वित्त मंत्री ने बजट पूर्व वार्ताओं में उद्योगपतियों और उद्योग जगत द्वारा प्रायोजित कृषि संगठनों से विमर्श किया है। इससे लगता है कि बजट में उन्हीं के हित सुरक्षित रखे जाएंगे। मैं आगामी बजट में कृषि क्षेत्र और किसानों के कल्याण को लेकर अधिक आशान्वित नहीं हूं। उन्हें केवल उम्मीद पर ही जिंदा रहना होगा। अतीत की तरह यह बजट भी किसानों के नाम पर कृषि व्यापार उद्योग को बढ़ावा देगा। मुझे पूरा यकीन है कि पिछले काफी समय से खाद्यान्न की बढ़ती कीमतों के कारण इस साल उद्योग जगत सरकारी खजाने से बड़ी राशि निकालने में कामयाब रहेगा। यह नहीं भूलना चाहिए कि जब भी कोई संकट खड़ा होता है या देश किसी आपदा से घिर जाता है तो उद्योग जगत इसे अवसर के रूप में भुनाता है। यदि वास्तव में वित्त मंत्री किसानों के हालात सुधारना चाहते हैं तो उन्हें कुछ महत्वपूर्ण कदम उठाने चाहिए। सबसे पहले तो सरकार को कृषि क्षेत्र में चार प्रतिशत संवृद्धि दर की रट छोड़नी चाहिए। कृषि संवृद्धि दर दो फीसदी हो या चार फीसदी, इससे मुसीबत में फंसे करोड़ों किसानों को कोई लाभ नहीं होगा। इसके बजाय वित्त मंत्री को किसानों की आय पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। नेशनल सैंपल सर्वे ऑर्गेनाइजेशन 2003-04 के अनुसार भारत में कृषक परिवार की औसत आय महज 2115 रुपये है। 2011 में हम इतना ही सोच सकते हैं कि यह आय बढ़कर 2400 हो जाए। इसका मतलब यह है कि भारत में किसान गरीबी रेखा के नीचे रह रहे हैं। मूलभूत सवाल यह है कि कृषि आय में बढ़ोतरी क्यों नहीं होती। इस संबंध में मुझे अधिक उम्मीद नजर नहीं आती। मैं बस यह आशा कर रहा हूं कि इस साल कृषि क्षेत्र के लिए ऋण की वर्तमान राशि 3.7 लाख करोड़ को बढ़ाकर चार लाख करोड़ या इससे कुछ अधिक किया जा सकता है। पिछले साल सरकार ने सूखे क्षेत्रों में साठ हजार गांवों में दाल के उत्पादन के लिए राशि आवंटित की थी। इस अवसर का उद्योग जगत, जिसमें उपकरण आपूर्तिकर्ता भी शामिल हैं, ने पूरा फायदा उठाया। उन्होंने एक गुट बनाकर 10 गांवों के लिए जारी धनराशि हड़प ली। असलियत में, दलहन उत्पादन में वृद्धि के लिए सुनिश्चित बाजार बेहद जरूरी है। यद्यपि सरकार दलहन के लिए सरकारी खरीद की दर निर्धारित करती है, लेकिन दलहन की सरकारी खरीद की कोई व्यवस्था ही नहीं है। अगर गेहूं और चावल की तर्ज पर दलहन की भी सरकारी खरीद होने लगे तो धीरे-धीरे इसका उत्पादन बढ़ जाएगा और विदेशों पर निर्भरता खत्म हो जाएगी। सब्जियों की कीमतों के आसमान छूने के कारण वित्त मंत्री इन्हें नीचे लाने पर पूरा ध्यान देंगे। अनेक वर्षो से हमें बताया जा रहा है कि 40 फीसदी फल व सब्जियां फसल के बाद होने वाले नुकसान की भेंट चढ़ जाती हैं। मैं इस नुकसान के आकलन के आधार को लेकर सुनिश्चित नहीं हूं। फल और सब्जी के क्षेत्र में निगरानी और पूर्वानुमान के आधार पर नीति बनाना बहुत जरूरी है। इसके अलावा फसल और मौसम बीमा के माध्यम से भी किसानों के हित सुरक्षित किए जा सकते हैं। दुर्भाग्य से, फसल बीमा की प्रगति प्रयोग के स्तर तक ही हुई है। प्रस्तावित खाद्य सुरक्षा बिल के आलोक में खाद्य सुरक्षा भी वित्त मंत्री का ध्यान आकर्षित करेगी। खाद्य सुरक्षा के नाम पर और यह जानते हुए कि खाद्य पदार्थो की पहुंच निम्न आय वर्ग के लोगों के हाथ से निकलती जा रही है, यह उम्मीद की जा सकती है वित्त मंत्री इसके लिए अधिक राशि का प्रावधान करेंगे। दूसरे शब्दों में भ्रष्ट सार्वजनिक वितरण प्रणाली में और धनराशि झोंकी जाएगी। आवश्यकता इस बात की है कि देश भर में ग्रामीण खाद्यान्न बैंकों की स्थापना के लिए तत्काल वित्तीय व्यवस्था की जाए। प्रत्येक राज्य में इन बैंकों को क्षेत्रीय अन्न बैंकों के साथ जोड़ा जाए। ग्रामीण विकास मंत्रालय पहले ही प्रत्येक पंचायत में पंचायत घरों के निर्माण के लिए संसाधन मुहैया करा रहा है। पंचायत घरों के निर्माण से भी अधिक जरूरी है प्रत्येक पंचायत में अन्न बैंकों का निर्माण। इससे न केवल अन्न की बर्बादी कम होगी, बल्कि क्षेत्रीय स्तर पर खाद्य सुरक्षा भी सुनिश्चित होगी। देश में करीब छह लाख गांव हैं, जिनमें से चार लाख गांवों में खाद्यान्न का उत्पादन होता है। इससे सार्वजनिक वितरण प्रणाली से बोझ कम होगा और इसे अधिक प्रभावी बनाने में सहायता मिलेगी। आजकल दूसरी हरित क्रांति के माध्यम से खाद्यान्न जरूरतों को पूरा करने की बहुत चर्चा है। पिछले बजट में सरकार ने हरित क्रांति के पूर्वोत्तर राज्यों तक विस्तार के लिए चार सौ करोड़ रुपये का प्रावधान किया था। सरकार इस बात पर कतई ध्यान नहीं दे रही है कि सघन कृषि क्षेत्रों जैसे पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश में हरित क्रांति ने खेती को कितना नुकसान पहुंचाया है। पहले ही हरित क्रांति से मिट्टी और भूमिगत जलस्तर विषैले हो चुके हैं। इसके कारण भूमिगत जलस्तर काफी गिर गया है और रासायनिक कीटनाशकों से खाद्यान्न विषैले हो गए हैं। आज परंपरागत कृषि के टिकाऊ मॉडल को अपनाने की आवश्यकता है। इसी से किसानों की दशा सुधरेगी और वे आत्महत्या करने को मजबूर नहीं होंगे। इससे पर्यावरण और प्राकृतिक संसाधनों को भी नुकसान नहीं होगा तथा ग्लोबल वार्मिग में भी कमी आएगी। इस प्रकार का मॉडल पहले ही आंध्र प्रदेश में जारी है। यहां 23 में से 21 जिलों में एक तरह से कृषि का कीटनाशक विहीन प्रबंधन चल रहा है। 28 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में किसान रासायनिक कीटनाशकों का इस्तेमाल नहीं कर रहे हैं। साथ ही चरणबद्ध तरीके से रासायनिक खाद को भी तिलांजलि दे रहे हैं। इसके बावजूद वहां फसल की पैदावार में कोई गिरावट नहीं हुई है, मिट्टी का स्वास्थ्य सुधरा है और बीमारी पर होने वाले खर्च में करीब 40 फीसदी की कमी आई है। यही नहीं, इस क्षेत्र में कृषि आमदनी बढ़ी है और खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित हुई है। यह आंध्र प्रदेश सरकार का कार्यक्रम है। प्रणब मुखर्जी को इस कार्यक्रम के देश के अन्य भागों में विस्तार के लिए धनराशि का प्रावधान करना चाहिए। इसी में खाद्य सुरक्षा और लाभदायक कृषि का भविष्य निहित है। (लेखक कृषि नीतियों के विश्लेषक हैं)