भारतीय कृषि शोध संस्थान (आइएआरआइ) के स्वर्ण जयंती समारोह को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने प्रयोगशाला से भूमि तक की कमजोर कड़ी पर गहरी चिंता व्यक्त की। उन्होंने भविष्य की चुनौतियों का सामना करने के लिए 12वीं योजना के अंत तक कृषि शोध पर होने वाले खर्च को कृषि जीडीपी के मौजूदा एक फीसदी से बढ़ाकर दो फीसदी करने का आ ान किया। देखा जाए तो कृषि शोध का बहुआयामी प्रभाव पड़ता है। विभिन्न अध्ययनों से प्रमाणित हो चुका है कि कृषि शोध क्षेत्र में खर्च किया गया हर एक रुपया अलग-अलग खाद्यान्न के हिसाब से 1.39 से लेकर 3.66 रुपये तक का प्रतिफल देता है। बागवानी फसलों में तो यह प्रतिफल और भी अधिक होता है। 11वीं योजना में केंद्र द्वारा कृषि शोध पर सार्वजनिक व्यय को 0.7 फीसदी से बढ़ाकर 0.9 फीसदी कर दिया गया। राज्यों के आवंटन को जोड़ें तो यह यह खर्च कृषि जीडीपी के एक फीसदी तक पहुंच जाता है। भले ही यह अनुपात चीन व ब्राजील की भांति न हो, लेकिन इतना भी कम नहीं है कि देश के कृषि शोध संस्थान किसानों की जरूरतों को पूरा न कर सकें। उदाहरण के लिए 2011-12 के लिए भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद का बजट 2800 करोड़ रुपये है। पिछले पांच वषरें में इसमें दो गुनी बढ़ोतरी हो चुकी है। इसके बावजूद देश के किसान बीजों, कृषि विधियों, मशीनरी आदि के लिए विदेशी कंपनियों के मोहताज बने हुए हैं। कुछ अपवादों को छोड़ दिया जाए तो देश के कृषि अनुसंधान केंद्र सफेद हाथी बन चुके हैं। यह ठीक है कि 2005-06 के बाद भारतीय कृषि अच्छा प्रदर्शन कर रही है, लेकिन इस उपलब्धि का श्रेय कृषि शोध संस्थानों के बीज व तकनीक को न होकर ऊंचे समर्थन मूल्य और लोगों की क्रय शक्ति में बढ़ोतरी को जाता है। पिछले एक दशक में आइसीएआर की एकमात्र उपलब्धि पूसा 1121 नामक बासमती धान की किस्म का विकास है, जिससे हर साल देश को 50 अरब रुपये की विदेशी मुद्रा हासिल हो रही है। इससे स्पष्ट है कि बीजों का विकास मुनाफे का सौदा है। अकेले हाइब्रिड बीज का बाजार 8,000 करोड़ रुपये सालाना तक पहुंच गया है। भले ही जीएम तकनीक के उपयोग को लेकर विवाद हो, लेकिन हाईब्रिड को पैदावार बढ़ाने का एक बेहतर उपाय माना गया है। यही कारण है कि देश में हाइब्रिड बीज का बाजार 15 से 20 फीसदी सालाना की दर से बढ़ रहा है। ये कम समय व पानी में अधिक उपज दे रहे हैं। लेकिन सार्वजनिक शोध तंत्र की निष्कि्रयता के चलते निजी क्षेत्र व बहुराष्ट्रीय कंपनियां अपने हाइब्रिड बीज बेचकर मोटा मुनाफा बटोर रही हैं। फिर सरकारी कृषि वैज्ञानिकों के खेत से जुड़ाव घटने के कारण प्रयोगशाला से निकली उपलब्धियों का एक-तिहाई ही किसानों तक पहुंच पाता है। दलहन, तिलहन क्षेत्र में भारत के लगातार पिछड़ने का सबसे बड़ा कारण यही है। गौरतलब है कि इसी आइसीएआर और राज्य कृषि विश्वविद्यालयों के प्रयासों से देश में हरित क्रांति हुई जिससे भारत न सिर्फ खाद्यान्न के मामले में आत्मनिर्भर बना बल्कि अनाज का निर्यात करने में भी सक्षम हुआ। लेकिन आज वही कृषि शोध संस्थान थक चुके हैं जिससे बहुराष्ट्रीय और निजी कंपनियों को घरेलू बीज बाजार पर आधिपत्य जमाने का मौका मिल गया। इसके विपरीत, ब्राजील और चीन के सरकारी शोध संस्थान मजबूती से खड़े हैं और घरेलू कंपनियों के साथ संयुक्त उद्यम स्थापित करके किसानों की जरूरतों के अनुरूप बीजों का उत्पादन कर रहे हैं। आइसीएआर को भी संसाधनों का रोना न रोकर देश की निजी बीज उत्पादक कंपनियों के साथ संयुक्त उद्यम स्थापित करने चाहिए। इससे वह ऊंची पैदावार वाली किस्मों का बड़े पैमाने पर उत्पादन करने में सक्षम होगा और भारतीय किसानों को बीज, तकनीक आदि के लिए बहुराष्ट्रीय कंपनियों का मोहताज नहीं होना पड़ेगा। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)
Wednesday, March 14, 2012
Saturday, February 18, 2012
फसल भंडारण संकट जल्द दूर होगा
कृषि मंत्री शरद पवार ने कहा कि इस साल बागवानी का रिकार्ड 240 मिलियन टन का रिकार्ड उत्पादन हुआ। इस दौरान 14 हजार करोड़ रुपए का निर्यात किया गया। कृषि मंत्री ने बागवानी वर्ष मनाने की घोषणा करते हुए कहा कि देश में फसल भंडारण का संकट जल्द दूर किया जाएगा। श्री पवार ने शुक्वार को यहां ‘बागवानी वषर्’ की शुरुआत करते हुए कहा, ‘सरकार ने देश में शीतगृहों के आधारभूत विकास से जुड़े मुद्दों पर गौर करने के लिये राष्ट्रीय शीतगृह श्रृंखला विकास केन्द्र स्थापित करने का फैसला किया है। उन्होंने कहा कि इसमें सरकार करीब 25 करोड़ रुपए का निवेश करेगी लेकिन ज्यादा धन उद्योग जगत से ही आएगा। एनसीसीडी शीत भंडार गृहों के लिए जरूरी मानक और नियम कायदे बनाने के साथ-साथ इनसे जुड़े सभी पक्षों के लिए उचित प्रशिक्षण कार्यक्र म चलाएगा। श्री पवार ने कहा कि मंत्रालय ने 12वीं पंचवर्षीय योजना के दौरान डेढ़ करोड़ टन शीतगृह भंडारों की अतिरिक्त क्षमता जोड़ने का फैसला किया है। पिछले योजना में 87.5 लाख टन क्षमता जोड़ने का लक्ष्य रखा गया था। शरद पवार ने इस मौके पर ‘बागवानी वषर्’ की औपचारिक घोषणा की। वर्ष के दौरान बागवानी विकास पर विशेष गौर किया जायेगा। उन्होंने इस मौके पर कहा कि देश में 2.20 करोड हेक्टेयर भूमि पर 24 करोड़ टन से अधिक का रिकार्ड उत्पादन हासिल किया गया। उन्होंने कहा कि बागवानी उत्पादन बढ़ने से फल एवं सब्जियों की प्रति व्यक्ति उपलब्धता बढ़ी है और इसके साथ ही निर्यात भी बढ़ा है जिससे देश को 14,000 करोड़ रुपए की विदेशी मुद्रा हासिल करने में भी मदद मिली है। कृषि सचिव पीके बसु ने इस अवसर पर कहा कि राज्यों को किसानों को अच्छी गुणावत्ता के बीज और दूसरे साधन उपलब्ध कराने चाहिए। बागवानी क्षेत्र में बेहतर प्रदर्शन के लिए हिमाचल प्रदेश, झारखंड, हरियाणा, आंध्र प्रदेश, छत्तीसगढ़, तमिलनाडु, ओडिशा, सिक्किम और मिजोरम को इस अवसर पर पुरस्कृत किया गया।
Tuesday, February 14, 2012
पैदावार बढ़ाने की जरूरत
दिल्ली में आयोजित राज्यों के खाद्य आपूर्ति मंत्रियों के सम्मेलन में संप्रग-2 के दो वरिष्ठ मंत्रियों ने खाद्य सुरक्षा बिल को मुश्किल आश्वासन करार दिया। जहां सब्सिडी बिल के 1.34 लाख करोड़ से 2.34 लाख करोड़ रुपये तक पहुंचने के अनुमान ने वित्तमंत्री प्रणब मुखर्जी की रातों की नींद उड़ा दी है, वहीं कृषि मंत्री शरद पवार को मौजूदा डिलीवरी सिस्टम पर भरोसा नहीं है। शरद पवार की दूसरी चिंता यह है कि सरकार द्वारा खाद्य सुरक्षा बिल को अमली जामा पहनाने की खातिर अधिक अनाज खरीदना पड़ेगा। वैसे तो वर्तमान समय में सालाना सरकारी खरीद खाद्य सुरक्षा बिल की जरूरतों के लिए पर्याप्त है, लेकिन समस्या यह है कि देश में सूखा, बाढ़ और अन्य प्राकृतिक आपदाओं को देखते हुए सरकार के बफर स्टॉक के लिए भी 2.5 करोड़ टन अनाज चाहिए। दूसरी समस्या यह है कि केंद्रीय पूल में सबसे ज्यादा योगदान करने वाले राज्यों में खरीद एजेंसियों द्वारा अब अनाज खरीद की मात्रा बढ़ाने की गुंजाइश कम है। जहां तक उत्पादन का सवाल है तो इसमें क्षेत्र विस्तार की संभावना नहीं है। ऐसे में पैदावार में बढ़ोतरी ही एकमात्र उपाय है। पैदावार में बढ़ोतरी की भरपूर संभावनाएं भी हैं क्योंकि देश की प्रति हेक्टेयर उत्पादकता अभी भी विश्व औसत से पीछे है। फिर देश के वर्षाधीन क्षेत्र विशेषकर पूर्वी भारत में पैदावार अभी भी काफी कम है। ऐसे में जरूरत इस बात की है कि सरकार अनाज उत्पादन और खरीद की धुरी को विकेंद्रित करे। गौरतलब है कि मौजूदा समय में सरकार की खरीद नीति प्रमुख फसलों के अग्रणी उत्पादक राज्यों तक ही सिमटी हुई है। जिन क्षेत्रों में भारतीय खाद्य निगम खाद्यान्न की सीधी खरीद नहीं करता, वहां के किसान अपनी उपज की बिक्री के लिए साहूकारों-महाजनों पर निर्भर हैं। पैदावार बढ़ाने के लिए सरकार पूर्वी भारत में दूसरी हरित क्रांति लाने के लिए प्रयासरत है। लेकिन यह क्रांति तभी कारगर होगी जब पहली हरित क्रांति के कटु अनुभवों से सीख लेते हुए ऐसी तकनीक अपनाई जाए जो न केवल पर्यावरण अनुकूल हो, बल्कि देश के बहुसंख्यक किसानों की पहुंच में भी हो। इस दिशा में सघन धान तकनीक ने उम्मीद की किरण दिखाई है, जिसके बल पर बिहार के नालंदा जिले ने धान उत्पादन में चीन का रिकॉर्ड तोड़ दिया। सघन धान तकनीक (सिस्टम ऑफ राइस इंटेसिफिकेशन अथवा श्री पद्धति) का आविष्कार 1983 में मेडागास्कर के हेनरी डी लौलानी ने किया था, इसलिए इसे मेडागास्कर पद्धति भी कहा जाता है। पारंपरिक धान की खेती में फसल को पानी के माध्यम से पोषण दिया जाता है। इस पद्धति में खेतों में पानी भरा होने के चलते हवा और धूप की पहुंच कम होती है, जिससे रासायनिक खाद के जरिए पौधों को ज्यादा पोषण देने की कोशिश की जाती है। दूसरी ओर श्री पद्धति के अंतर्गत पौधों को हवा, धूप और मिट्टी के माध्यम से ज्यादा पोषण पहुंचाने की कोशिश की जाती है। इसमें कंपोस्ट खाद का प्रयोग करने की सलाह दी जाती है। इस पद्धति के अंतर्गत बेहतर पोषण के कारण पौधे काफी स्वस्थ होते हैं और प्रति पौधे धान का उत्पादन काफी ज्यादा होता है। पारंपरिक खेती के अंतर्गत एक किलो धान उगाने के लिए जहां 3,000 से 5,000 लीटर पानी की जरूरत होती है वहीं श्री पद्धति में इसका करीब आधा पानी ही लगता है। इस प्रकार कम भूमि, श्रम, पूंजी और पानी लगने के बावजूद पैदावार में तीन गुना तक बढ़ोतरी हो जाती है। सबसे बड़ी बात यह है कि इसमें बीजों की प्रचलित किस्मों का ही उपयोग कर पैदावार बढ़ाई जा सकती है। धीरे-धीरे पूरे देश में लोकप्रिय हो रही इस तकनीक को अपनाकर बिहार के नालंदा जिले के दरवेशपुरा गांव के किसान सुमंत कुमार ने एक हेक्टेयर में 224 क्विंटल धान पैदा कर विश्व रिकॉर्ड बनाया। सुंमत कुमार के साथ चार अन्य किसानों ने प्रति हेक्टेयर 192 से 202 क्विंटल धान पैदा किया। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)
Friday, December 16, 2011
बिचौलियों से मुक्त नहीं फसल की खरीद
सरकार और व्यापार का खेती और किसानों को लेकर क्या नजरिया है, बीते दिनों की कुछ घटनाओं से भारत की कृषकीय दशा को समझा जा सकता है। संसद में एक प्रश्न के जवाब में सरकार ने स्वीकारा है कि अकेले विदर्भ में 2007 से लेकर 2010 तक 1118 किसानों ने आत्महत्या की है। यह संख्या उन किसानों की है जो किसी न किसी रूप से प्रधानमंत्री राहत कोष के लाभार्थी थे। यानी साफ है कि किसानों को दिये जाने वाले पैकेज का तात्कालिक या दीर्घकालिक फायदा नजर नहीं आया। ऐसे में सवाल है कि क्या वाकई सरकारी कवायद किसानों के व्यापक हित के लिए पर्याप्त है। किसानों की वर्तमान स्थिति समझने के लिए दो उदाहरण पर्याप्त हैं। पहला तमिलनाडु का है जहां सरकार ने घोषणा की है गरीबों को एक रुपए की कीमत पर चावल उपलब्ध होगा। गरीब लोगों को कम दर पर अनाज जरूर मिले लेकिन अनाज उत्पादक किसान नजरअंदाज न हों। दरअसल सस्ती दर पर अनाज देने की राजनीतिक होड़ का खमियाजा किसान उठा रहे हैं। आंकड़े बताते हैं कि जिन राज्यों में सस्ती दर पर अनाज देने की प्रक्रिया शुरू हुई है और सब्सिडी में कटौती की गई है उसी के बाद से किसानों की आत्महत्या की घटनाओं में इजाफा हुआ है। सस्ती दर पर अनाज उपलब्ध करवाने के लिए अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं ने भी सहयोग दिया है। काबिलेगौर है कि यही संस्थाए कृषि क्षेत्र को सब्सिडी दिए जाने का लगातार विरोध भी करती आई हैं। जो आलू बाजार में सामान्यत: 12 रुपये किलो के भाव मिलता है, उसे किस मजबूरी के तहत किसान एक रुपये किलो बेचने के लिए मजबूर है। बिहार उत्तर प्रदेश में आलू उत्पादक किसानों की यह बड़ी समस्या है। अकेले विदर्भ के 46 लाख कपास उत्पादक किसान, देश के लाखों आलू और गन्ना उत्पादक किसान सरकार की अनुचित खरीद पण्राली का दंश झेल रहे हैं। यह विडम्बना ही कही जाएगी कि जब भारत जैसे देश में खेती पर सब्सिडी लगातार कम की जा रही है, अमेरिका, चीन और हमसे कहीं छोटे अफ्रीकी देशों की अर्थव्यवस्थाओ में खेती पर सब्सिडी बढ़ाई जा रही है। पूंजीवादी मॉडल पर चलने वाले अमेरिका की खेती पर सब्सिडी 25 हजार करोड़ रुपए तक पहुंच गई है। खेती को लेकर सरकार की संकीर्ण सोच महाराष्ट्र के गन्ना किसानों के आंदोलन से भी तय होती है। हालांकि फ्री मार्केट के पैरोकारों द्वारा चलाए गए इस आंदोलन के पीछे शुगर मिलों की चीनी निर्यात की मांग काम कर रही थी। आंदोलन के बाद सरकार ने रिकवरी के आधार पर गन्ने के मूल्य तय किये। परिणामस्वरूप पश्चिम महाराष्ट्र, मराठवाड़ा और विदर्भ को गन्ने की रिकवरी के आधार पर 2050,1850 और 1800 रुपए का मूल्य दिया गया। तर्क दिया गया कि पश्चिम महाराष्ट्र में करीब 12 से 13 प्रतिशत शक्कर की रिकवरी होती है। यानी एक क्ंिवटल गन्ने में से 13 किलो चीनी। साथ ही इथेनॉल जैसे अन्य उत्पाद भी निकलते हैं। इसके पीछे का तर्क तकनीक रूप से सही हो सकता है लेकिन मूल्य निर्धारण करने वालों को सोचना चाहिए कि शक्कर कम निकलती है तो उसमें किसान का क्या दोष? दरअसल सरकार की ओर से अब तक समेकित कृषि योजनाएं नहीं बन सकी हैं। मूलभूत सुविधा देने की बजाए ब्यूरोक्रेट्स की लूट के लिए पैकेज बनाए जाते हैं। सब्सिडी देने की जगह सस्ती दर पर अनाज बेच कर किसान को भुखमरी के कगार पर पहुंचा दिया जाता है। बिजली की जगह बीजों के दाम बढ़ाए जाते हैं। उपज खरीद अब तक बिचौलियों से मुक्त नहीं हो पाई है। नियंताओं को विचार करना चाहिए कि आखिर गलती कहां है?
Monday, November 21, 2011
खेती की नई चुनौती
पिछले तीन साल से खाद्य महंगाई थामने में जुटी सरकार के सामने क्रॉप हालिडे ने एक नई चुनौती पैदा कर दी है। बढ़ती लागत और घटती आय की वजह से आंध्र प्रदेश के पूर्वी व पश्चिमी गोदावरी, गुंटूर, वारंगल जिलों में छोटे व सीमांत किसानों ने खेती न करने का फैसला किया। अब ये किसान खेती के बजाय मनरेगा के तहत मजदूरी करेंगे। किसानों में असंतोष की मूल वजह उर्वरक, कीटनाशक, बीज और श्रमिकों के मूल्य में बेतहाशा बढ़ोतरी है। इससे उत्पादन लागत इतनी बढ़ गई है कि किसान अब खेती छोड़कर रोजी-रोटी के वैकल्पिक साधनों की ओर रुख कर रहे हैं। देखा जाए तो 2009 में पोषक तत्व आधारित सब्सिडी (एनबीएस) अपनाने के बाद उर्वरकों के दाम तेजी से बढ़े हैं। अधिकांश फसलों में प्रयुक्त होने वाले डाई अमोनियम फास्फेट (डीएपी) की कीमतें पिछले तीन वषरें में 450 रुपये से बढ़कर 950 रुपये प्रति कट्टा (50 किग्रा) हो गईं हैं। फिर किसानों को डीएपी के एक कट्टे के लिए 1350 रुपये तक चुकाना पड़ता है क्योंकि जरूरत के समय इसकी किल्लत हो जाती। इसी प्रकार यूरिया की कीमत दोगुनी बढ़ चुकी है। पिछले पांच वषरें में श्रमिकों की लागत 300 फीसदी तक बढ़ी है। तटीय आंध्र प्रदेश के बेहद उपजाऊ इलाकों को कोनासीमा के नाम से जाना जाता है। धान की भरपूर पैदावार के चलते इसे प्रदेश का धान का कटोरा कहा जाता है। लेकिन इस साल यहां के 40,000 किसानों ने अपनी जमीन को परती रखा है यानी खेती नहीं की। इसका अर्थ है कि धान उगाने वाली 90,000 एकड़ जमीन परती रह गई और पिछले साल हुए धान के पांच लाख टन के उत्पादन के रिकार्ड को दोहराया नहीं जा सका। यह स्थिति देश के कई हिस्सों में शुरू हो चुकी है भले ही वहां के किसानों ने क्रॉप हालिडे की घोषणा न की हो। उदाहरण के लिए उड़ीसा में हजारों एकड़ जमीन परती पड़ी है क्योंकि खेती पुसाने लायक नहीं रह गई है। किसानों को सबसे बड़ी शिकायत खेती की लागत और समर्थन मूल्य के निर्धारण में कोई तालमेल नहीं होना है। यही निष्कर्ष सरकार द्वारा गठित समिति का भी है। मोहन कांडा समिति की रिपोर्ट के मुताबिक ऐसे हालात बनने की करीब एक दर्जन वजहें है। इसमें सबसे बड़ी वजह सरकार द्वारा घोषित न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) है जिसे लेकर किसानों में काफी गुस्सा है। दरअसल, एक क्विंटल धान पैदा करने की लागत 1583 रुपये हैं जबकि सरकार ने धान के लिए 1110 रुपये एमएसपी घोषित किया है। इसका मतलब यह है कि किसानों को 473 रुपये प्रति क्विंटल और प्रति एकड़ करीब 10,000 रुपये का नुकसान हो रहा है। ऐसे में धान की खेती कौन करेगा? यही कारण है कि खेत परती छोड़ने का चलन बढ़ता ही जा रहा है। एमएसपी कृषि लागत एवं मूल्य आयोग (सीएसीपी) की सिफारिशों के आधार पर तय किया जाता है और इसकी सिफारिशों को मानने के लिए केंद्र सरकार बाध्य नहीं है क्योंकि उसे महंगाई का भी ध्यान रखना पड़ता है। फिर आयोग अपनी सिफारिश करते समय स्थानीय परिस्थितियों को ध्यान में न रखकर पूरे देश के लिए एक समान मानक तय करता है जबकि असम से लेकर तमिलनाडु तक खेती की लागत में काफी अंतर है। मजदूरी में अंतर के अलावा खेती में लगने वाले अन्य संसाधनों की लागत में भी काफी अंतर है। फिर मजदूरों की कमी भी एक बड़ी समस्या बन चुकी है क्योंकि ग्रामीण क्षेत्रों में मनरेगा के कारण खेती के लिए मजदूरों का मिलना मुश्किल हो गया है। देश का दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि यहां खेती-किसानी के लिए कभी दीर्घकालिक नीति बनी ही नहीं। इसे आंध्र प्रदेश में आम के पेड़ लगाने के उदाहरण से समझा जा सकता है। खेती के घाटे का सौदा बनने पर बागवानी विकास के तहत सरकार ने आम के पेड़ लगाने के लिए भारी सब्सिडी दी। इससे आम के भंडारण, विपणन, प्रसंस्करण आदि सुविधाओं का ध्यान रखे बिना बड़े पैमाने पर आम के पेड़ लगाए गए। इसका परिणाम यह हुआ कि जैसे ही फसल मंडी में आई वैसे ही कीमतें गिर गईं और बागान मालिकों को अपनी लागत निकालना कठिन हो गया। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)
Thursday, November 17, 2011
किसान तय करें गन्ने की कीमत
आगामी विधान सभा चुनावों को देखते हुए उत्तर प्रदेश सरकार ने चालू गन्ना सीजन के लिए गन्ने के राज्य परामर्श मूल्य यानी एसएपी में 40 रुपये प्रति क्विंटल की बढ़ोतरी कर दी है। इसके चलते राज्य में गन्ने की विभिन्न किस्मों का एसएपी 235 से 250 रुपये प्रति क्विंटल हो गया। लेकिन निजी चीनी मिलों के संगठन इस्मा ने सरकार के इस फैसले का विरोध करते हुए कहा है कि यदि चीनी के दाम नहीं बढ़े तो जल्दी ही गन्ना किसानों के बकाया की स्थिति पैदा हो सकती है। दरअसल, उत्तर प्रदेश में चीनी की औसत रिकवरी (9.5 फीसदी) को देखें तो नए मूल्य पर चीनी उत्पादन की लागत 31 से 33 रुपये प्रति किलो आएगी, जबकि राज्य में इस समय चीनी का खुदरा मूल्य 31 से 32 रुपये प्रति किलो चल रहा है। इस्मा के मुताबिक जब यह मूल्य 36 रुपये प्रति किलो होगा, तभी गन्ना किसानों को भुगतान संभव हो पाएगा। इसीलिए इस्मा ने मौजूदा एसएपी पर गन्ना खरीदने में असमर्थता जताते हुए अदालत जाने की घोषणा की है। दूसरी ओर किसान संगठन गन्ने के समर्थन मूल्य में 40 रुपये की बढ़ोतरी को नाकाफी बता रहे हैं। उनका कहना है कि खाद, बीज, सिंचाई, कीटनाशक के साथ यदि मजदूरी का खर्च जोड़ दिया जाए तो गन्ना पैदा करने की लागत सरकार द्वारा घोषित समर्थन मूल्य से कहीं ज्यादा आएगी। उत्तर प्रदेश में गन्ने के एसएपी में बढ़ोतरी को देखते हुए महाराष्ट्र के किसानों ने भी गन्ने का दाम 235 रुपये प्रति क्विंटल करने की मांग को लेकर आंदोलन छेड़ दिया। पांच दिनों तक चले आंदोलन के बाद किसानों व सरकार के बीच राज्य में तीन अलग-अलग जगहों में अलग-अलग समर्थन मूल्य (एसएपी) लागू करने पर सहमति बनी। इसके तहत कोल्हापुर, सतारा, सांगली के लिए 205 रुपये, पुणे, शोलापुर, अहमदनगर जिलों के लिए 185 रुपये और मराठवाड़ा व विदर्भ के लिए 180 रुपये प्रति क्विंटल की दर से गन्ने की खरीद की जाएगी। दरअसल, चीनी के मामले में सरकारी नीतियों के पीछे जहां दूरदर्शिता का अभाव रहा है, वहीं इस मुद्दे पर लंबे समय से राजनीतिक रोटियां सेंकी जा रही हैं। जब चुनाव सिर पर होते हैं, तब सरकारों को गन्ना किसानों की याद आती है और चुनाव बीतते ही सरकारें मिल मालिकों की शुभचिंतक बन जाती हैं। देखा जाए तो उदारीकण के दो दशकों के बाद भी गन्ना और चीनी ऐसे कृषि उत्पाद हैं, जो सबसे ज्यादा नियंत्रित हैं। इनके उत्पादन और बिक्री के हर कदम पर सरकार की दखलंदाजी है। इसके चलते ही किसान और चीनी मिलों के बीच गन्ना मूल्य को लेकर एक अघोषित युद्ध चलता रहता है। इसमें जब बाजी मिलों के हाथ में होती है तो किसानों को गन्ने के वाजिब दाम के लिए जद्दोजहद करनी पड़ती है और जब किसान फायदे में होते हैं तो मिलें बीमार हो जाती हैं। चीनी उद्योग के संकट की पड़ताल की जाए तो मिल मालिकों की केवल अपने हितों के लिए की जा रही लामबंदी ही मुख्य कारण नजर आएगी, क्योंकि चीनी उद्योग यह चाहता है कि चीनी और उसके कच्चे माल गन्ने दोनों का मूल्य निर्धारित करने का अधिकार उसे मिले। गन्ने को 11 से 13 महीने तक अपने खेत में तैयार करने वाले किसान को यह हक देने के लिए चीनी उद्योग तैयार नहीं हैं। यह काम उसके लिए केंद्र व राज्य सरकारें करती हैं, लेकिन राज्यों की ओर से तय कीमत यदि उद्योग के मुताबिक नहीं होती तो उसे वे न्यायालय में चुनौती देने से नहीं चूकता। चीनी उद्योग अपने पक्ष में तर्क देता है कि ज्यादा पैदावार लेने की होड़ और रसायनों के इस्तेमाल से गन्ने में पानी की मात्रा बढ़ी है, जिससे चीनी की रिकवरी कम होती जा रही है। ऐसे में गन्ने के बढ़ते मूल्य और गिरती रिकवरी से मिल चलाना घाटे का सौदा हो गया है। दूसरी ओर किसान संगठनों का कहना है कि अब केवल चीनी ही मिलों की आय का स्त्रोत नहीं रह गई है। मिलें गन्ने व चीनी के उप-उत्पाद से अल्कोहल, कागज, बिजली आदि बना रही हैं, जिससे उनके मुनाफे में भारी बढ़ोतरी हुई है। अत: गन्ना मूल्य निर्धारित करते समय चीनी मिलों के इस मुनाफे की भी गणना की जानी चाहिए। देखा जाए तो चीनी और उप-उत्पादों की कीमतों के अनुपात में गन्ना मूल्य निर्धारण ही इस समस्या का स्थायी उपाय है। अति उत्पादन की स्थिति में किसानों का बकाया न बढ़े, इसके लिए सरकार को लाभकारी मूल्य पर चीनी निर्यात के मौकों का फायदा उठाने में नहीं चूकना चाहिए। (लेखक कृषि मामलों के जानकार हैं)
कैसे दूर होगा गन्ना किसानों का गम
महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश के गन्ना किसानों के बीच हजारों किलोमीटर का फासला भले ही हो , लेकिन दोनों की त्रासदी एक-सी है। दोनों की नियति की कमान शासन के हाथ में है। शासन हर साल सर्दियों की शुरुआत से पहले लाखों गन्ना किसानों को अपने पैमाने पर कसता है। उन्हें सड़कों पर उतरवाता है। उन पर लाठी, गोलियां चलवाता है और अंत में काफी हद तक उनकी मांग मान भी लेता है। हर साल की यही कहानी है। इस साल यह महाराष्ट्र में दोहराई जा रही है तो उत्तर प्रदेश के किसानों को इसलिए राहत है, क्योंकि कुछ ही महीनों में यहां विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। यह अजीब त्रासदी है कि महाराष्ट्र के जिन गन्ना किसानों को बीते साल 200 रुपये क्विंटल गन्ने का मिला, उन्हें इस साल एक बार फिर से इसी मूल्य 235 रुपये प्रति क्विंटल को पाने के लिए सड़कों पर उतरना पड़ रहा है। स्वाभिमानी क्षेत्रकारी संगठन के राजू शेट्टी के नेतृत्व में हजारों किसान कृषि मंत्री शरद पवार के गृह जिले में पांच दिनों तक डेरा डाले रहे। गन्ना किसानों की यह आग पूरे पश्चिमी महाराष्ट्र में फैल गई और इसकी आंच दिल्ली तक भी महसूस की गई। महाराष्ट्र में जल्द ही स्थानीय निकाय (निगम, पालिका और परिषदों) के चुनाव होने जा रहे हैं। इसलिए अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकने के लिए शिवसेना, महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना, भाजपा और यहां तक कि कांग्रेस भी राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी को एक कोने में करने के लिए कूद पड़ी है। आंदोलन राजनीतिक रंग न पकड़ ले, इसके लिए राकांपा की सांसद और शरद पवार की पुत्री सुप्रिया सुले और राज्य के सहाकारिता मंत्री हर्षवर्धन पाटील आंदोलनरत किसानों के संपर्क में हैं। बहरहाल, जो भी हो, यह मामला किसानों से जुड़ा है। राजनीतिक दल इसका फायदा अपने-अपने हिसाब से उठाना चाहते हैं तो वे जानें, लेकिन यह महाराष्ट्र के 10 लाख गन्ना किसानों के लिए रोजी-रोटी का सवाल है और इसीलिए वे सड़कों पर उतरे हुए हैं। ऐसा नहीं है कि राज्य के गन्ना किसान इसी साल गन्ने के उचित मूल्य को लेकर सड़कों पर उतरे हैं। पिछले साल भी उनकी सर्दियां महाराष्ट्र की सड़कों पर ही कटी थीं। बीते साल भी केंद्र और राज्य सरकार ने क्रमश: गन्ने का खरीद मूल्य 145 रुपये प्रति क्विंटल और 137 रुपये प्रति क्विंटल तय किया था। राज्य के गन्ना किसानों ने जब आंदोलन किया तो राज्य सरकार किसानों को 200 रुपये प्रति क्विंटल तक देने को मान गई। लेकिन इस साल एक बार केंद्र और राज्य सरकार ने गन्ना किसानों को परेशान करने की ठान ली है। जिस राज्य सरकार ने बीते साल गन्ना किसानों को 200 रुपये प्रति क्विंटल तक दिया, अब वह किसानों को 140 रुपये प्रति क्विंटल देने की बात कर रही है। इतनी महंगाई, ईधन के बढ़ते दामों और मनरेगा योजना के कारण महंगी होती मजदूरी के बीच सरकार किसानों से कह रही है कि वह अपनी फसल दो साल पुराने रेट पर उसे बेचें। सरकार और चीनी मिल मालिकों का कहना है कि किसानों की मांग 235 रुपये प्रति क्विंटल मांग के मुताबिक गन्ना खरीदा गया तो बाजार में चीनी के दामों में पांच से सात रुपये प्रति क्विंटल की बढ़ोतरी हो जाएगी। अब सवाल है कि कैसे हो जाएंगे? एक साल पहले जब चीनी 50 रुपये प्रति किलोग्राम गई थी तो क्या सरकार ने किसानों से 500 रुपये क्विंटल में गन्ना खरीदा था। नहीं तो फिर अभी-अभी क्यों चीनी की सिरदर्दी किसानों के सिर मढ़ी जा रही है। दूसरा, सरकार और चीनी मिल मालिकों की यह दलील भी सच्चाई से कोसों दूर है। केंद्र सरकार के अगर एफआरपी 145 रुपये की बात करें तो बाजार में चीनी की कीमत अधिक से अधिक 15 रुपये प्रति किलो से ज्यादा नहीं होनी चाहिए, लेकिन बाजार में आज की तारीख में चीनी औसतन 35 रुपये प्रति किलोग्राम बिक रही है। इस हिसाब से तो गन्ना किसानों को गन्ने का 350 रुपये प्रति क्विंटल मिलना चाहिए, क्योंकि एक क्विंटल गन्ने में औसतन 9.5 किलोग्राम चीनी निकलती है। चीनी की इन कीमतों पर हल्ला मचाकर भारी मुनाफा कमाने वाली चीनी मिलें यह भूल जाती हैं कि एक क्विंटल में 9.5 किलोग्राम चीनी के अलावा इन मिलों को गन्ने की इसी मात्रा से शीरा, खोई और मैली सह-उत्पाद के रूप में मिलती है। जिन्हें खुले बाजार में बेचकर ये मिलें लाखों तक कमाती हैं। इनमें से कुछ मिलें तो अब खोई से बिजली उत्पादन भी करने लगी हैं। सीरे से शराब बनाने में और इसे तेल उत्पादों में मिलाने से चीनी मिलों को हर साल कितना फायदा होता है, यहां किसी को बताने की जरूरत नहीं है। महाराष्ट्र में 168 चीनी मिलें हैं। इनमें से 121 सहकारी क्षेत्र में और 47 निजी क्षेत्र में है। देश में महाराष्ट्र ही एकमात्र ऐसा राज्य हैं, जहां गन्ने जैसी नकदी फसल में किसानों की भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए सहकारिता को अंजाम तक पहुंचाया गया है। लेकिन आज यह सहकारिता ही किसान हितों के आड़े आने लगी है। राज्य के सहकारी बैंकों ने चीनी मिलों को निर्देश दिए हैं कि अगर किसानों से 137.5 रुपये प्रति क्विंटल से ज्यादा दर में गन्ना खरीदा गया तो वे ऐसी मिलों को ऋण उपलब्ध नहीं कराएंगे। महाराष्ट्र के सहकारिता मंत्री हर्षवर्धन पाटील और इस क्षेत्र के कद्दावर नेता शरद पवार को इस दिशा में गंभीरता से सोचना होगा कि सहकारी बैंक किसानों की मदद के लिए हैं या उनकी मुश्किलें और बढ़ाने के लिए। स्वाभिमानी क्षेत्रकारी संगठन के राजू शेट्टी के साथ आंदोलन कर रहे हजारों किसानों की मांगें कल को मान भी ली जाती हैं, लेकिन यह कौन-सा तरीका है कि राज्य के गन्ना किसानों को अपनी फसल का उचित मूल्य लेने के लिए हर साल सड़कों पर उतरना पड़ता है। यह समय उसके फसल-चक्र में सबसे कीमती समय होता है, जब वह अपनी फसल को चीनी मिलों के दरवाजे तक पहुंचाता है। ठीक इसी समय अपनी फसल को खेत में ही छोड़ वह सड़कों पर उसका सही मूल्य पाने के लिए सरकार से लड़ रहा होता है। यहां एक महत्वपूर्ण सवाल उठता है कि गन्ने का क्या मूल्य हो, इसका निर्धारण केंद्र और राज्य सरकार आखिर कब तक करती रहेगी। क्यों सरकार की एजेंसी फसल उत्पादन मूल्यांकन आयोग फसलों का मूल्य निर्धारण करती हैं। क्यों नहीं यह अधिकार गन्ना किसानों को दिया जाता है कि वह अपनी फसल की उपज का निर्धारण खुद करें। जब बाजार में जूते सीने वालों, बाल काटने वालों से लेकर मोटरसाइकिल और कार बेचने वालों को यह आजादी है कि वह अपने उत्पाद का मूल्य खुद निर्धारित करें तो गन्ना किसान को यह अधिकार क्यों नहीं दिया गया है। जब तक महाराष्ट्र में ही नहीं, देशभर के गन्ना किसानों को उनकी फसल का मूल्य निर्धारण करने का अधिकार नहीं दिया जाता, तब तक गन्ने पर राजनीति चलती रहेगी। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)
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