सरकार ने केंद्रीय पूल से गेहूं निर्यात की प्रक्रिया शुरू कर दी है। स्टेट ट्रेडिंग कारपोरेशन (एसटीसी) ने केंद्रीय पूल से गेहूं निर्यात के लिए निविदा मंगाई है। इसमें विदेशी आयातक ही भाग ले सकेंगे और विपणन सीजन 2011-12 और 2012-13 का ही गेहूं निर्यात होगा। बंदरगाह पर न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) पर गेहूं उपलब्ध होगा। गेहूं निर्यात पर विचार इसलिए हो रहा है, क्योंकि खरीद में सुस्ती और विभिन्न रुकावटों के कारण कोई दो करोड़ टन गेहूं सड़ने की स्थिति में है। इस साल 9.02 करोड़ टन के रिकॉर्ड उत्पादन का अनुमान है। जहां तक सरकारी गोदामों का सवाल है, वे फिलहाल अनाज से अटे हैं। केंद्रीय पूल में 1 अप्रैल 2012 को 543.36 लाख टन खाद्यान्न का स्टॉक था। इसमें करीब 200 लाख टन गेहूं है। चालू सीजन में सरकारी खरीद का लक्ष्य 318 लाख टन है। खुले बाजार में गेहूं का दाम न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) से कम है इसीलिए सरकारी केंद्रों पर ज्यादा गेहूं जा रहा है। ऐसे में सरकारी खरीद 335 लाख टन से भी ज्यादा होने का अनुमान है। गेहूं निर्यात के प्रस्ताव को मंजूरी मिल जाने से छह साल में पहली बार भारत सरकारी गेहूं भंडार को बेचने के लिए निर्यात बाजार का सहारा ले रहा है। हालांकि गेहूं का बड़े पैमाने पर निर्यात आसान नहीं है क्योंकि वैिक अनाज बाजार में सभी प्रमुख गेहूं निर्यातक- रूस, ऑस्ट्रेलिया व यूक्रेन आदि देशों के पास भारी भरकम अनाज का भंडार है। गुणवत्ता के मामले में भी भारतीय गेहूं दूसरे निर्यातक देशों के मुकाबले कमजोर है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में भारत के मुकाबले यूक्रेन, रूस और ऑस्ट्रेलिया का गेहूं सस्ता भी है। फिर भी युगांडा, अफगानिस्तान, पाकिस्तान, बांग्लादेश, दुबई, और खाड़ी देशों को गेहूं की जरूरत है, लिहाजा इन देशों में भारतीय गेहूं के लिए बाजार हो सकता है। अब केंद्रीय पूल से गेहूं के निर्यात में भी सबसे बड़ी समस्या वित्तीय प्रबंधन की हो सकती है। क्योंकि गेहूं की खरीद व भंडारण की लागत साल 2012-13 में करीब 18.22 रु पये प्रति किलोग्राम रहने की संभावना है, वहीं अमेरिकी गेहूं की वैिक औसत कीमतें जनवरी-मार्च के दौरान 15.06 रुपये प्रति किलोग्राम थीं। यह भी उल्लेखनीय है कि सरकार ने सितम्बर, 2011 में गेहूं निर्यात पर रोक हटाई थी तथा निर्यातकों को खुले बाजार से गेहूं खरीद कर निर्यात की अनुमित दी थी, लेकिन अंतरराष्ट्रीय बाजार में भारतीय गेहूं महंगा होने के कारण सितम्बर से अब तक 7.2 लाख टन गेहूं का ही निर्यात हो पाया है। इस साल भारत के लिए गेहूं का निर्यात करना इसलिए भी जरूरी है ताकि केंद्रीय पूल में नए स्टॉक के लिए जगह बन सके। यदि गेहूं का निर्यात नहीं हुआ, तो कई परेशानियां पैदा हो सकती हैं। ज्यादातर राज्यों में भी अनाज भंडारण क्षमता के मामले में स्थिति अच्छी न होने के कारण किसान धरने-प्रदर्शन पर उतर आए हैं। वे मजबूरी में आढ़तियों को एमएसपी से कम भाव पर अपना गेहूं बेच रहे हैं। सरकार ने इस बार गेहूं का एमएसपी 1285 रु पये प्रति क्ंिवटल तय किया है। गौरतलब है कि कुल स्टॉक के मुकाबले भंडारण क्षमता काफी कम होने के कारण चालू सीजन 2012-13 में सरकार को लगभग पचास फीसद खाद्यान्न गोदामों के बाहर खुले आसमान के नीचे आधे- अधूरे तिरपालों के सहारे ही रखना होगा। निश्चित रूप से गेहूं के निर्यात से जहां भंडारण की कमी से संबंधित चुनौती से कुछ तात्कालिक बचाव होगा, वहीं किसानों को भविष्य में फसल की बिक्री और अच्छे मूल्य की आशा बंधेगी। मार्च 2012 में संसद में पहली कृषि समीक्षा में भी भंडारण की आवश्यकता पर जोर झलका है। छोटे किसानों के लिए भंडारण की और ज्यादा जरूरत है। भंडारण सुविधा के लिए बड़े पैमाने पर निवेश की आवश्यकता है। यद्यपि सरकार ने यह जरूरत पूरा करने के लिए वेयरहाउसिंग सेक्टर में 100 फीसद प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की अनुमति भी दे रखी है और विभिन्न टैक्स रियायतें देकर निवेशकों को प्रोत्साहित करने का प्रयास भी किया जा रहा है। लेकिन निवेशकों के कदम वेयरहाउसिंग सेक्टर की ओर धीमी गति से बढ़ रहे हैं। चूंकि पर्याप्त खाद्यान्न भंडारण का संबंध अच्छी विदेशी मुद्रा की कमाई से भी जुड़ गया है अत: खाद्यान्न भंडारण की अच्छी व्यवस्था से खाद्यान्न निर्यात करके खाली होते हुए विदेशी मुद्रा भंडार को भी भरा जा सकेगा। अच्छे खाद्यान्न भंडारण द्वारा यूरो और डॉलर की कमाई विदेशी मुद्रा भंडार को बढ़ाने में मददगार हो सकती है। अच्छी भंडारण क्षमता और खाद्यान्न की उत्पादकता बढ़ाकर खाद्यान्न के निर्यात को विदेश व्यापार का प्रमुख अंग भी बनाया जा सकता है। देश में खाद्यान्न उपलब्धता का वर्तमान परिदृश्य चिंताजनक है। खाद्य एवं कृषि संबंधी कुछ नए वैिक अध्ययन संदेश दे रहे हैं कि भारत में छोटे किसानों को खुशहाल बनाने पर सबसे अधिक ध्यान देना होगा। इस संदर्भ में सी रंगराजन समिति की रिपोर्ट उल्लेखनीय है जिसमें कहा गया कि देश के 4 करोड़ 60 लाख छोटे किसानों को पर्याप्त भंडारण सुविधा, आसान कर्ज और खेती के समुचित संसाधन उपलब्ध नहीं हैं। अब देश में कृषि बाजारों का आधुनिकीकरण किए जाने और उन्हें बहुवांछित बुनियादी ढांचा मुहैया कराने की भी महती आवश्यकता है। यह भी ध्यान देना होगा कि खाद्य सुरक्षा के लिए हम जिस तरह गेहूं और चावल की उत्पादकता बढ़ाने की योजना बना रहे हैं, उसी अनुपात में उन्हें रखने के लिए माकू ल भंडारण सुविधा भी स्थापित करनी होगी। इस कार्य में आने वाली अड़चनों को रोकना होगा। यह ध्यान देना होगा कि भारत से खाद्यान्न निर्यात के लिए प्रतिस्पर्धी देशों के समकक्ष निर्यात की रणनीति तैयार हो। उम्मीद की जानी चाहिए कि देश में कृषि सुधारों के तहत खाद्यान्न उत्पादकता वृद्धि, वेयरहाउसिंग सेक्टर के आधुनिकीकरण तथा भारतीय कृषि सेक्टर को मजबूत आधार दिया जाएगा और खाद्यान्न निर्यात को देश के निर्यात का एक अभिन्न अंग बनाया जाएगा। तभी खाद्यान्न सुरक्षा और किसान का सबलीकरण हो सकता है।
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Wednesday, May 23, 2012
Tuesday, April 3, 2012
किसानों के साथ वादाखिलाफी
| चुनाव के समय मतदाताओं से बड़े-बड़े वादे करने वाली सियासी पार्टियां, सत्ता में आने के बाद किस तरह उनसे वादाखिलाफी करती हैं, हाल ही में यह बात मध्यप्रदेश में सामने आई है। पिछले विधानसभा चुनाव में अपने चुनावी घोषणा-पत्र में किसानों के 50 हजार रुपए तक के कर्ज माफ करने का वादा करने वाली बीजेपी, आज अपने वादे से मुकर गई है। चार साल होने को आए, पर सूबे में यह वादा पूरा होता नहीं दिख रहा। हद तो तब हो गई, जब मध्य प्रदेश विधानसभा के अंदर बीजेपी शासन के मंत्रियों ने ऐसे किसी वादे से अपनी अनभिज्ञता जताई। सहकारिता मंत्री गौरीशंकर बिसेन और उद्योग मंत्री कैलाश विजयवर्गीय दोनों ने ही इस मुद्दे पर विधानसभा में कहा कि सरकार ने किसानों के 50 हजार रुपए की कर्ज माफी का कभी कोई औपचारिक एलान नहीं किया। यानी, अपनी ही पार्टी के चुनावी घोषणा-पत्र को अब सरकार के मंत्री झुठला रहे हैं। सहकारिता मंत्री गौरीशंकर बिसेन ने सरकार का बचाव करते हुए विधानसभा में बचकाना बयान दिया कि कर्ज माफी का वादा पार्टी ने किया था, सरकार ने नहीं। लिहाजा, सरकार जबावदेह नहीं। सहकारिता मंत्री के बयान से जाहिर है कि बीजेपी राज्य में किसानों और उनकी समस्याओं के प्रति कितनी संजीदा है? बीजेपी ने साल 2008 के विधानसभा चुनाव में अपने चुनाव घोषणा-पत्र में किसानों से वादा किया था कि यदि वह सत्ता में आई, तो उनका 50 हजार रुपए तक का कर्ज माफ कर दिया जाएगा। पार्टी ने इस वादे को बाकायदा पचरें में छपवाकर किसानोें के बीच बांटा। यहां तक कि पचरें में उस वक्त के अपने राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह तक का हवाला दिया गया। कर्ज माफी के इस वादे का बीजेपी को खूब फायदा मिला। उसके वायदे पर यकीन कर सूबे के किसानों ने उसको जमकर वोट दिए लेकिन हुकूमत में दोबारा वापिस आते ही सरकार ने अपना वादा भूल गयी। सरकार ने किसानों से तो वादाखिलाफी की ही, केन्द्र से कर्ज माफी के लिए मिले 915 करोड़ रूपए में भी सेंध मार दी। आलम यह है कि सूबे में सहकारी संस्थाओं के घोटालों के चलते किसानों के 115 करोड़ रुपए के कर्ज माफ नहीं हो पाए हैं। इस बात का इकरार खुद सरकार ने किया है। राज्य सरकार की तमाम किसानोन्मुखी योजनाओं के दावों के बीच मध्य प्रदेश में तकरीबन 32 लाख 11 हजार से ज्यादा किसान आज भी कर्ज के बोझ से दबे हैं। खुद सहकारिता मंत्री गौरीशंकर बिसेन ने विधानसभा में इस बात को माना है कि सूबे के किसान जिला सहकारी कृषि व ग्रामीण विकास बैंकों के सात हजार करोड़ रुपए से ज्यादा के कर्जदार हैं। सूबे में औसतन हर किसान पर 14 हजार 218 रुपए के कर्ज का बोझ है। जबकि कडुवी सचाई यह है कि राज्य में 30 फीसद से ज्यादा ऐसे किसान हैं, जिनके पास महज एक से लेकर तीन हेक्टेयर तक ही खेती के काबिल जमीन है। कृषि मामलों के जानकारों का मानना है कि सूबे के 50 फीसद से ज्यादा किसानों पर फिलवक्त संस्थागत कर्ज चढ़ा है। इसके अलावा किसान स्थानीय साहूकारों और बड़े व्यापारियों से भी कर्ज लेते हैं। यह कर्ज ऐसा है, जो उन्हें चैन से जीने नहीं देता। यही वजह है कि मध्य प्रदेश में बीते 10 सालों में किसानों की खुदकुशी के मामलों में लगातार इजाफा हुआ है। इन 10 सालों में यहां तकरीबन 14,155 किसान खुदकुशी कर चुके हैं। राष्ट्रीय अपराध अभिलेख ब्यूरो के आंकड़ों के मुताबिक सूबे में हर दिन चार किसान खुदकुशी करते हैं। साल 2003-04 में पड़े सूखे के बाद से तो यहां आत्महत्या का ग्राफ बढ़ता चला गया है। किसानों को बीज, खाद, पानी और बिजली जैसी खेती की बुनियादी जरूरतें भी नहीं मिल पा रहीं हैं, जिसके चलते वे हताशा में आत्महत्या की तरफ कदम बढ़ा रहे हैं। किसी भी सरकार के लिए इससे ज्यादा अफसोस की बात क्या होगी कि उसके सूबे में किसान आत्महत्याएं करते रहें और वह इस समस्या पर गंभीरता से सोचने की बजाय उसे सिरे से ही खारिज कर दे। इस बात को अभी ज्यादा दिन नहीं गुजरे हैं, जब किसानों की आत्महत्या को कृषि मंत्री रामकृष्ण कुसमरिया ने किसानों का पाप बतलाते हुए अपना पल्ला झाड़ लिया था। जबकि हकीकत यह है कि किसानों की आत्महत्याओं के पीछे प्राकृतिक कारणों से ज्यादा वे कारण जिम्मेदार थे, जिन पर सरकार आसानी से काबू पा सकती थी। घटिया खाद-बीज, नकली कीटनाशक और कर्ज इन किसानों की मौत की बड़ी वजह था। इस बात की तस्दीक हाल में आई राज्य मानवाधिकार आयोग की रिपोर्ट ने भी कर दी है। रिपोर्ट में साफ-साफ तौर पर भ्रष्ट तंत्र, कर्ज और फसल की बर्बादी को किसानों की आत्महत्या का जिम्मेदार ठहराया गया है। राज्य में आज हालत यह है कि यदि जल्द ही किसानों के कर्ज माफ नहीं किए गए तो आत्महत्याओं का ग्राफ और भी बढ़ सकता है। कुल मिलाकर, यह पहली बार नहीं है जब बीजेपी ने सूबे के किसानों के साथ धोखा किया हो। पूर्व मुख्यमंत्री सुंदरलाल पटवा के समय भी बीजेपी ने चुनाव में किसानों से पच्रे भरवाए थे और नारा दिया था, ‘भाजपा का कहना साफ, हर किसान का कर्जा माफ।’ लेकिन जब बीजेपी सरकार में आई, तो यह वादा भूल गई। दिखावे के लिए कुछ कज्रे माफ हुए और बाद में किसानों को ठेंगा दिखा दिया गया। सूबे में कमोबेश यही कहानी शिवराज सरकार, फिर दोहरा रही है। कर्ज माफी के अपने वादे पर अमल करने की बजाए उसके मंत्री हास्यास्पद दलीलें दे रहें हैं। मानो पार्टी और सरकार जुदा-जुदा हों। सरकार यह कहकर अपनी जिम्मेदारियों से नहीं बच सकती कि कर्ज माफी का वादा पार्टी ने किया था, सरकार ने नहीं। चुनाव घोषणा-पत्र पार्टी का लिखित संविधान होता है और सत्ता में आने के बाद उस पर अमल करना उसका कर्त्तव्य। जो पार्टी चुनाव घोषणा-पत्र के आधार पर सत्ता में आती है, उसका जिम्मा बनता है कि वह प्राथमिकता के आधार पर पहले अपने चुनाव घोषणा-पत्र पर अमल करे, न कि उसे खारिज कर दे। वरना, चुनाव घोषणा-पत्र पर कौन यकीन करेगा? |
Saturday, February 18, 2012
फसल भंडारण संकट जल्द दूर होगा
कृषि मंत्री शरद पवार ने कहा कि इस साल बागवानी का रिकार्ड 240 मिलियन टन का रिकार्ड उत्पादन हुआ। इस दौरान 14 हजार करोड़ रुपए का निर्यात किया गया। कृषि मंत्री ने बागवानी वर्ष मनाने की घोषणा करते हुए कहा कि देश में फसल भंडारण का संकट जल्द दूर किया जाएगा। श्री पवार ने शुक्वार को यहां ‘बागवानी वषर्’ की शुरुआत करते हुए कहा, ‘सरकार ने देश में शीतगृहों के आधारभूत विकास से जुड़े मुद्दों पर गौर करने के लिये राष्ट्रीय शीतगृह श्रृंखला विकास केन्द्र स्थापित करने का फैसला किया है। उन्होंने कहा कि इसमें सरकार करीब 25 करोड़ रुपए का निवेश करेगी लेकिन ज्यादा धन उद्योग जगत से ही आएगा। एनसीसीडी शीत भंडार गृहों के लिए जरूरी मानक और नियम कायदे बनाने के साथ-साथ इनसे जुड़े सभी पक्षों के लिए उचित प्रशिक्षण कार्यक्र म चलाएगा। श्री पवार ने कहा कि मंत्रालय ने 12वीं पंचवर्षीय योजना के दौरान डेढ़ करोड़ टन शीतगृह भंडारों की अतिरिक्त क्षमता जोड़ने का फैसला किया है। पिछले योजना में 87.5 लाख टन क्षमता जोड़ने का लक्ष्य रखा गया था। शरद पवार ने इस मौके पर ‘बागवानी वषर्’ की औपचारिक घोषणा की। वर्ष के दौरान बागवानी विकास पर विशेष गौर किया जायेगा। उन्होंने इस मौके पर कहा कि देश में 2.20 करोड हेक्टेयर भूमि पर 24 करोड़ टन से अधिक का रिकार्ड उत्पादन हासिल किया गया। उन्होंने कहा कि बागवानी उत्पादन बढ़ने से फल एवं सब्जियों की प्रति व्यक्ति उपलब्धता बढ़ी है और इसके साथ ही निर्यात भी बढ़ा है जिससे देश को 14,000 करोड़ रुपए की विदेशी मुद्रा हासिल करने में भी मदद मिली है। कृषि सचिव पीके बसु ने इस अवसर पर कहा कि राज्यों को किसानों को अच्छी गुणावत्ता के बीज और दूसरे साधन उपलब्ध कराने चाहिए। बागवानी क्षेत्र में बेहतर प्रदर्शन के लिए हिमाचल प्रदेश, झारखंड, हरियाणा, आंध्र प्रदेश, छत्तीसगढ़, तमिलनाडु, ओडिशा, सिक्किम और मिजोरम को इस अवसर पर पुरस्कृत किया गया।
Friday, December 16, 2011
बिचौलियों से मुक्त नहीं फसल की खरीद
सरकार और व्यापार का खेती और किसानों को लेकर क्या नजरिया है, बीते दिनों की कुछ घटनाओं से भारत की कृषकीय दशा को समझा जा सकता है। संसद में एक प्रश्न के जवाब में सरकार ने स्वीकारा है कि अकेले विदर्भ में 2007 से लेकर 2010 तक 1118 किसानों ने आत्महत्या की है। यह संख्या उन किसानों की है जो किसी न किसी रूप से प्रधानमंत्री राहत कोष के लाभार्थी थे। यानी साफ है कि किसानों को दिये जाने वाले पैकेज का तात्कालिक या दीर्घकालिक फायदा नजर नहीं आया। ऐसे में सवाल है कि क्या वाकई सरकारी कवायद किसानों के व्यापक हित के लिए पर्याप्त है। किसानों की वर्तमान स्थिति समझने के लिए दो उदाहरण पर्याप्त हैं। पहला तमिलनाडु का है जहां सरकार ने घोषणा की है गरीबों को एक रुपए की कीमत पर चावल उपलब्ध होगा। गरीब लोगों को कम दर पर अनाज जरूर मिले लेकिन अनाज उत्पादक किसान नजरअंदाज न हों। दरअसल सस्ती दर पर अनाज देने की राजनीतिक होड़ का खमियाजा किसान उठा रहे हैं। आंकड़े बताते हैं कि जिन राज्यों में सस्ती दर पर अनाज देने की प्रक्रिया शुरू हुई है और सब्सिडी में कटौती की गई है उसी के बाद से किसानों की आत्महत्या की घटनाओं में इजाफा हुआ है। सस्ती दर पर अनाज उपलब्ध करवाने के लिए अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं ने भी सहयोग दिया है। काबिलेगौर है कि यही संस्थाए कृषि क्षेत्र को सब्सिडी दिए जाने का लगातार विरोध भी करती आई हैं। जो आलू बाजार में सामान्यत: 12 रुपये किलो के भाव मिलता है, उसे किस मजबूरी के तहत किसान एक रुपये किलो बेचने के लिए मजबूर है। बिहार उत्तर प्रदेश में आलू उत्पादक किसानों की यह बड़ी समस्या है। अकेले विदर्भ के 46 लाख कपास उत्पादक किसान, देश के लाखों आलू और गन्ना उत्पादक किसान सरकार की अनुचित खरीद पण्राली का दंश झेल रहे हैं। यह विडम्बना ही कही जाएगी कि जब भारत जैसे देश में खेती पर सब्सिडी लगातार कम की जा रही है, अमेरिका, चीन और हमसे कहीं छोटे अफ्रीकी देशों की अर्थव्यवस्थाओ में खेती पर सब्सिडी बढ़ाई जा रही है। पूंजीवादी मॉडल पर चलने वाले अमेरिका की खेती पर सब्सिडी 25 हजार करोड़ रुपए तक पहुंच गई है। खेती को लेकर सरकार की संकीर्ण सोच महाराष्ट्र के गन्ना किसानों के आंदोलन से भी तय होती है। हालांकि फ्री मार्केट के पैरोकारों द्वारा चलाए गए इस आंदोलन के पीछे शुगर मिलों की चीनी निर्यात की मांग काम कर रही थी। आंदोलन के बाद सरकार ने रिकवरी के आधार पर गन्ने के मूल्य तय किये। परिणामस्वरूप पश्चिम महाराष्ट्र, मराठवाड़ा और विदर्भ को गन्ने की रिकवरी के आधार पर 2050,1850 और 1800 रुपए का मूल्य दिया गया। तर्क दिया गया कि पश्चिम महाराष्ट्र में करीब 12 से 13 प्रतिशत शक्कर की रिकवरी होती है। यानी एक क्ंिवटल गन्ने में से 13 किलो चीनी। साथ ही इथेनॉल जैसे अन्य उत्पाद भी निकलते हैं। इसके पीछे का तर्क तकनीक रूप से सही हो सकता है लेकिन मूल्य निर्धारण करने वालों को सोचना चाहिए कि शक्कर कम निकलती है तो उसमें किसान का क्या दोष? दरअसल सरकार की ओर से अब तक समेकित कृषि योजनाएं नहीं बन सकी हैं। मूलभूत सुविधा देने की बजाए ब्यूरोक्रेट्स की लूट के लिए पैकेज बनाए जाते हैं। सब्सिडी देने की जगह सस्ती दर पर अनाज बेच कर किसान को भुखमरी के कगार पर पहुंचा दिया जाता है। बिजली की जगह बीजों के दाम बढ़ाए जाते हैं। उपज खरीद अब तक बिचौलियों से मुक्त नहीं हो पाई है। नियंताओं को विचार करना चाहिए कि आखिर गलती कहां है?
Monday, October 17, 2011
पंजाब, केरल जैसे राज्यों में घटी खाद्यान्न पैदावार
देश में पिछले पांच साल में एक तरफ जहां पंजाब, केरल, पश्चिम बंगाल जैसे प्रमुख उत्पादक प्रदेशों की देश के कुल खाद्यान्न उत्पादन में हिस्सेदारी घटी है वहीं दूसरी तरफ राजस्थान, महाराष्ट्र, झारखंड जैसे राज्यों का योगदान बढ़ा है। उद्योग मंडल पीएचडी चैंबर के अध्ययन के अनुसार, ‘पिछले पांच साल में राजस्थान, महाराष्ट्र, झारखंड तथा कर्नाटक में कृषि उत्पादन में उच्च वृद्धि दर्ज की गई है और इनकी देश के कुल अनाज उत्पादन में हिस्सेदारी 2002-06 में 17.4 प्रतिशत से बढ़कर 2007-11 में 19 प्रतिशत हो गई।’ पीएचडी चैंबर रिसर्च ब्यूरो के अध्ययन के मुताबिक, ‘वहीं दूसरी तरफ पंजाब, केरल, पश्चिम बंगाल तथा उत्तर प्रदेश जैसे उच्च कृषि उत्पादक राज्यों की देश के कुल अनाज उत्पादन में हिस्सेदारी आलोच्य अवधि में 41 प्रतिशत से घटकर 38 फीसद रही।’
पिछले पांच वर्ष की अवधि के दौरान झारखंड में खाद्यान्न उत्पादन में 40 प्रतिशत वृद्धि दर्ज की गई। राज्य में वर्ष 2002-06 के दौरान जहां औसतन 22.8 लाख टन सालाना खाद्यान्न का उत्पादन हुआ वहीं 2007-11 में यह बढ़कर औसतन 32 लाख टन सालाना हो गया। इसी प्रकार, राजस्थान में 2007-11 के दौरान खाद्यान्न उत्पादन 21.84 प्रतिशत बढ़कर औसतन 1.54 करोड़ टन सालाना रहा जो 2002-06 के दौरान यह औसतन 1.26 करोड़ टन सालाना था। आलोच्य अवधि में महाराष्ट्र और कर्नाटक में खाद्यान उत्पादन में क्र मश: 22.3 प्रतिशत तथा 24.09 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई। महाराष्ट्र में खाद्यान्न उत्पादन 2002-06 के दौरान औसतन 1.09 करोड़ टन सालाना था जो 2007-11 के दौरान बढ़कर 1.34 करोड़ टन हो गया। कर्नाटक में खाद्यान्न उत्पादन आलोच्य अवधि में 91.8 लाख टन से बढ़कर 1.14 करोड़ टन हो गया। अध्ययन में कहा गया है, ‘‘पंजाब, केरल, पश्चिम बंगाल तथा उत्तर प्रदेश जैसे खाद्यान्न के प्रमुख उत्पादक राज्यों में अब हरित क्रांति का प्रभाव मद्धिम पड़ने लगा है। इन राज्यों में खाद्यान्न उत्पादन की वृद्धि दर अब स्थिर अवस्था में पहुंच गयी है।’
Wednesday, June 1, 2011
कृषि क्षेत्र में लुक ईस्ट नीति से उम्मीद
इसी महीने के पहले हफ्ते जब मेघालय में उमियम स्थित भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के पूर्वोत्तर पर्वतीय क्षेत्र अनुसंधान परिसर में ‘किरन’ के नाम से नई पहल आरंभ हुई तो राष्ट्रीय मीडिया का इस तरफ ध्यान नहीं गया। यह मौका क्षेत्रीय समिति की 20वीं बैठक का था जहां पूर्वोत्तर के सभी राज्यों के कृषि वैज्ञानिक और देश के कुछ अन्य विशेषज्ञ उपस्थित थे। यह मौका इसलिए खास महत्व का था कि इस माध्यम से कृषि क्षेत्र में पूरब की तरफ देखने की नीति को अमली जामा पहनाने के प्रयास को अच्छी पहल के रूप में स्थापित किया जा सकता था। देश में बढ़ती जनसंख्या और कृषि भूमि पर निरन्तर दबाव के चलते खाद्य सुरक्षा की चुनौती गंभीर है। देश की आबादी में हर साल डेढ़ करोड़ का इजाफा हो रहा है और खेती में इस्तेमाल जमीन के दूसरे उपयोगों के लिए मांग निरन्तर बढ़ रही है। लिहाजा उत्पादन वृद्धि के बावजूद कीमतों में भी वृद्धि का रुख है। अनुमान है कि 2020 तक खाद्यान्न उत्पादन को 23.58 करोड़ टन के मौजूदा स्तर से बढ़ा कर 28.5 करोड़ टन तक ले जाना होगा। प्रयासों के बावजूद अब तक उत्पादन में वांछित वृद्धि नहीं हो पाई। कृषि विकास दर अनेक सालों में दो प्रतिशत के आसपास सिमट कर रह गई। अपवादस्वरूप इस साल फसल अच्छी हुई और विकास दर चार प्रतिशत के अपेक्षित लक्ष्य से ऊपर 5.4 प्रतिशत रही। बुनियादी बात यह है कि देश के अनेक इलाके पिछली हरित क्रांति के लाभ से वंचित रह गए। इनमें पूर्वी भारत व पूर्वोत्तर के क्षेत्र शामिल हैं। कृषि मामले में अब तक उपेक्षित पूर्वोत्तर के लिए ‘किरन’ के माध्यम से सार्थक टेक्नोलॉजी और जरूरी संसाधन सुलभ करवाने की उम्मीद की जा सकती है। खाद्य सुरक्षा संबंधी चुनौतियों के संदर्भ में हरित क्रांति से वंचित इलाकों की उत्पादक क्षमता का दोहन अनिवार्यता माना जाने लगा है परन्तु देश के अन्य पूर्वी क्षेत्रों की तुलना में विशिष्ट भौगोलिक व जलवायु परिस्थितियों वाले पूर्वोत्तर के लिए वही पैकेज लागू करना संभव नहीं है जो बिहार, बंगाल, उड़ीसा या उत्तर प्रदेश के पूर्वी हिस्सों में लागू किया जा सकता है। प्राय: मांसाहार और जूम खेती के लिए चर्चित पूर्वोत्तर में खाद्यान्न क्षेत्र में आत्मनिर्भरता नहीं है। ऐसे में समूचे पूर्वोत्तर के लिए अलग से कृषि संबंधी ज्ञान, जानकारी और क्षेत्र विशेष के लिए सार्थक व सुसंगत टेक्नोलॉजी तैयार करना अत्यावश्यक हो गया है। क्षेत्र के कृषि सम्बद्ध संगठनों, किसानों और प्रसार से जुड़े लोगों के लिए साझे मंच का गठन समय की मांग है। ‘किरन’ इन जरूरतों को पूरा करने के साथ इस तरह से ज्ञान-प्रबंधन सुनिश्चित करेगी कि उत्पादन की परिस्थितियों में आने वाले तमाम बदलावों को इस प्रयास में समाहित करने के साथ ही उत्पादक गतिविधियों के लिए उत्प्रेरक की भूमिका का ठीक-ठीक निर्वहन हो सके। उम्मीद की जा सकती है कि इस पहल पर आगे मजबूती से बढ़ने पर क्षेत्र के किसानों और उनके हित साधकों को विश्वसनीय आंकड़े, उपयोगी सूचनाएं, खेती की सटीक एवं सार्थक टेक्नालॉजी एक स्थान पर सुलभ हो सकेगी। इसी साल फरवरी में जलवायु परिवर्तन से निबटने के लिए लचीली कृषि पर राष्ट्रीय पहल आरंभ करने के तीन महीने बाद ही भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद ने ‘किरन’ के रूप में जो पहल की है, वह पूर्वोत्तर की आकांक्ष और खाद्य सुरक्षा की जरूरत पूरा करने की क्षमता रखती है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के महानिदेशक डॉ. एस. अय्यप्पन ने रेखांकित किया कि ‘किरन’ को क्षेत्र में उद्यमशीलता को उत्प्रेरित करने के अलावा सहारा भी देना होगा। उन्होंने पूर्वोत्तर के युवा कृषि वैज्ञानिकों से नौकरी के बजाय उद्यमशीलता का वरण करने की जो सलाह दी। इस पर अमल हुआ तो क्षेत्र में कृषि में आत्म निर्भरता व खाद्य सुरक्षा के युग का आरंभ होगा। इस पहल में क्षेत्रीय जैव विविधता के संरक्षण, संवर्धन व संस्कार के बीज भी छिपे हैं। यह प्रयास सफल रहा तो पूरे भारत के लिए नए सोपान तक पहुंचने का मार्ग प्रशस्त होगा। पूर्वोत्तर के लिए ‘किरन’ के रूप में नए प्रयास के नतीजों पर ध्यान केन्द्रित करने के अलावा खाद्यान्न सुरक्षा को अधिक व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखना होगा। अनाज उत्पादन के साथ ही बागवानी उत्पादों और पशुधन के विकास पर भी समुचित ध्यान देना होगा। क्षेत्र में सब्जी और फलोत्पादन की अनुकूल परिस्थितियां हैं। जरूरत किसानों तक पहुंचने और उन्हें सही दिशा देने की है। भंडारण की समस्या देखते हुए प्राथमिक उत्पाद के प्रसंस्करण की जरूरत है। बागवानी उत्पादों का और क्षेत्र के जाने माने उत्पादों अदरक, हल्दी और फलों आदि के प्रसंस्करण और मूल्य संवर्धन के उपायों से किसानों की आय बढ़ाई जा सकती है। चुनिंदा उत्पादों और वनस्पति से बहुमूल्य यौगिकों जैसे एंटी वायोटिक पदाथोर्ं आदि को अलग निकालने की व्यवस्था की जा सकती है। इस प्रकार के विकास के कुछ मॉडल विकसित किये जा रहे हैं। यह जरूरी है कि कृषि उत्पादों के मूल्य संवर्धन के साथ उनकी गुणवत्ता भी सुनिश्चित की जाए। इसके लिए सभी मानकों का निर्धारण और अनुपालन सुनिश्चित करना होगा। पूर्वोत्तर राज्यों में सुअर पालन उल्लेखनीय सहायक कृषि गतिविधि है। देश में सुअरों की कुल संख्या का 28 प्रतिशत पूर्वोत्तर राज्यों में है। सुअर के मांस व इससे तैयार अन्य उत्पादों की बढ़ती मांग के चलते अधिक वैज्ञानिक ढंग से सुअर पालन को बढ़ावा दिया जा रहा है। गुवाहाटी स्थित राष्ट्रीय शूकर अनुसंधान केन्द्र ने नस्ल सुधार की दिशा में अच्छी पहल की है। नई नस्लों से उत्पादकता में वृद्धि संभव होगी। क्षेत्र के कृषि विकास के प्रयास की श्रृंखला में उमियम में हुए विचार-विमर्श को भी देखा जाना चाहिए। वहां सम्पन्न र्चचा के आलोक में 12वीं पंचवर्षीय योजना के लिए ठोस रणनीति निर्धारित की जा सकेगी। दूसरी हरित क्रांति के लक्ष्य देखते हुए ही लुक ईस्ट नीति पर जोर दिया जा रहा है। सघन और मिश्रित खेती के तरीकों पर काम चल रहा है। फसल के रोग और कटाई के बाद बर्बादी रोकने पर भी ध्यान देना होगा। कृषि-वानिकी इस क्षेत्र के लिए महत्वपूर्ण है। यहां की विशेष जरूरतें देखते हुए ‘किरन’ के माध्यम से पूर्वोत्तर के किसानों को चौबीसों घंटे आवश्यक तकनीकी जानकारी और सलाह मिल सकेगी। वहां की भौगोलिक और जलवायु संबंधी परिस्थितियां देखते हुए उच्च-मूल्य उत्पादों और बागवानी के साथ अधिक उपज देने वाली धान की किस्मों को बढ़ावा मिले। वहां जैविक खेती की अनुकूल परिस्थितियां हैं परन्तु भूमि की उर्वरा शक्ति ठीक रखने के लिए सूक्ष्म पोषक तत्वों की तरफ ध्यान देने की जरूरत है। वैसे राष्ट्रीय स्तर पर 120 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर के औसत की तुलना में पूर्वोत्तर में उर्वरकों का इस्तेमाल मात्र 30 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर के स्तर पर रहा है। यहां जैविक खेती सुदृढ़ कर भूमि की उर्वरता वर्तमान स्तर से आगे ले जाने की जरूरत है। पूर्वोत्तर की समस्याएं जटिल जरूर हैं परन्तु समन्वित प्रयासों से वांछित परिणाम निकल सकते हैं।
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