सरकार की अनदेखी से खफा लंबे समय से आंदोलनरत पान किसानों ने अब सामूहिक आत्महत्या की चेतावनी दी है। जनवरी माह में चली शीत लहर से पान की फसल चौपट हो चुकी है और किसान मुआवजे की मांग कर कर रहे हैं। प्रकृति के इस कहर का सबसे ज्यादा खमियाजा उत्तर प्रदेश के पान किसानों को भुगतना पड़ा है। पान की खेती पर आश्रित परिवार पलायन को मजबूर हैं और भुखमरी की नौबत आ गई है। आलम यह है कि उत्तर प्रदेश के किसानों को नई खेती के लिए पान की लताएं भी पश्चिम बंगाल, राजस्थान और मध्यप्रदेश से मंगवानी पड़ी हैं। उत्तर प्रदेश में पान की नई फसल मार्च के दूसरे हफ्ते से लेकर अप्रैल की शुरुआत तक लगाई जाती है। यूपी में यह चुनावी साल माना जा रहा है, ऐसे में पान किसानों की नाराजगी राजनीतिक रूप ले सकती है। कभी किसानों के चेहरे पर मुनाफे की लाली लाने वाला पान अब घाटे का पर्याय बन गया है। इसकी फसल बेहद नाजुक होती है और यह ज्यादा गरमी या ठंड सहन नहीं कर पाती। इसे गरमी के मौसम में रोजाना चार बार और ठंड के दौरान हफ्ते में दो बार सिंचाई की जरूरत होती है। नियमित सिंचाई की जरूरत के कारण ही परम्परागत रूप से पान की फसल जलाशयों के किनारे की जाती है। लेकिन पिछले कु छ सालों से पानी की कमी के कारण पान की फसल किसानों के लिए परेशानी का सबब बन गई है। कभी पाला तो कभी लू का कहर पान किसानों की नियति बन चुका है। उड़ीसा, मध्यप्रदेश और पश्चिम बंगाल में भी इस साल पान की फसल को नुकसान पहुंचा है लेकिन उत्तर प्रदेश में यह सबसे ज्यादा प्रभावित हुई है। सूबे के 17 जिलों में पान की 90 फीसद से ज्यादा फसल तबाह हो गई है। महोबा और ललितपुर जिलों में ही पान की फसल थोड़ी-बहुत बच पाई है। पश्चिम बंगाल सरकार अपने पान किसानों को राहत दे चुकी है लेकिन उत्तर प्रदेश में 85 करोड़ रुपये से ज्यादा की फसल बर्बाद होने के बावजूद किसानों की सुध लेने वाला कोई नहीं है। सरकार की बेरुखी के कारण ही सूबे में पान का रकबा घटकर आधा रह गया है। लखनऊ और महोबा में पान प्रयोग व प्रशिक्षण संस्थान खोले गए थे लेकिन अब यह संस्थान बंद किए जा चुके हैं। नई तकनीक के अभाव में किसान पुराने तरीके से खेती करते हैं लिहाजा कम मुनाफे के साथ ही जोखिम भी बढ़ जाता है। गुटखा के बढ़ते प्रचलन ने भी किसानों की कमर तोड़ने का काम किया है। आम जन-जीवन में धार्मिंक अनुष्ठानों से लेकर भोजन तक पान के महत्व को देखते हुए यह कमी शुभ संकेत नहीं है। किसी जमाने में पान की खेती का गढ़ रह चुके महोबा की पान मंडी अब वीरान हो चली है। महोबा में पान की खेती तीन हजार एकड़ से सिमटकर पांच एकड़ तक रह गई है। यहां के देसावरी पान की मांग समूचे देश में है और पाकिस्तान व अरब देशों में भी इसका निर्यात किया जाता था। घटती वर्षा और बढ़ती मंहगाई ने इसे तबाही की कगार पर पहुंचा दिया और जो थोड़ी बहुत उम्मीदें शेष हैं, उस पर सरकारी उपेक्षाएं भारी पड़ रही हैं। महोबा के पान की खासियत यह है कि देश के दूसरे हिस्सों में उपजने वाली अन्य प्रजातियों की तासीर इसके जैसी नहीं है। मुसीबत से घिरे किसानों की मदद के लिए अब तक किसी नेता ने कोई ठोस पहल नहीं की है। साल-दर-साल कुदरत का सितम सहते पान किसान हुक्मरानों की अनदेखी से निराश होकर अब पान की खेती से तौबा कर रहे हैं। विडंबना यह है कि अपना अस्तित्व बचाने के लिए जूझ रही पान की फसल खाद-बीज पर मिलने वाली सब्सिडी और फसल बीमा के दायरे से भी बाहर है। केंद्र और प्रदेश सरकार पान किसानों के दर्द से बेखबर कान में रूई डालकर सो रही हैं। पाले से पान की फसल काली होकर नष्ट हो गई है और किसानों के पास बीज के लिए भी पुरानी बेलें नहीं बची हैं। पान के पत्ते की कीमत में 300 फीसद तक की तेजी आ चुकी है और देशी बंगला पान की कीमत 600 रुपए प्रति ढोली ( एक ढोली में 150 से 200 पत्ते होते हैं) के स्तर को पार कर गई है। पिछले साल एक ढोली 150 रुपये में मिल रही थी। देश के मशहूर बनारसी पान के पत्ते की कीमतों में भी 50 फीसद तक की तेजी आ चुकी है। अगर सरकार की कुंभकर्णी नींद अब भी नहीं टूटी तो वह दिन दूर नहीं जब किसान पान की खेती से पूरी तरह मुंह मोड़ लेंगे। पान किसानों के जख्मों पर झूठे वादों का मरहम लगाने की बजाए तत्काल नकद मुआवजे की व्यवस्था की जानी चाहिए। किसानों को पान की बेलें उपलब्ध करवाने के साथ ही लखनऊ के पान प्रयोग व प्रशिक्षण केंद्र में अविलंब जान फूं कने की जरूरत है। सरकार को समय रहते पान किसानों का संकट दूर करने की कोशिश शुरू कर देनी चाहिए अन्यथा हालात बेकाबू होने में ज्यादा देर नहीं लगेगी।
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Friday, April 29, 2011
Saturday, April 16, 2011
उर्वरक नीति से बर्बाद होते किसान
गांधीजी ने एक बार अपनी दक्षिण भारत यात्रा के दौरान तमिलनाडु में एक किसान से पूछा कि आपका राजा कौन है? किसान ने आसमान की तरफ इशारा करते हुए कहा कि चाहे कोई भी हो, लेकिन सबसे बड़ा राजा तो ऊपरवाला ही है। ऐसा लगता है कि वर्षो से गांधीजी के नाम पर देश चला रही कांग्रेस ने किसानों को अंतिम राजा के भरोसे ही छोड़ दिया है। लंबे समय से चर्चा चल रही थी कि किसानों को उर्वरकों पर दी जाने वाली सब्सिडी का तरीका बदला जाएगा, मगर अब किसानों को नकद सब्सिडी का सब्जबाग दिखाया जा रहा है। अब कहा जा रहा है कि वित्त वर्ष 2012-13 से पहले किसानों को सीधे पैसा देना मुश्किल है। जाहिर है कि नकद सब्सिडी और कुछ नहीं, बल्कि किसानों को भरमाए रखने के लिए यूपीए सरकार का एक तीर है। देश में हरित क्रांति की शुरुआत के समय कहा गया था कि रासायनिक उर्वरकों के कम इस्तेमाल का कारण उत्पादन कम हो रहा है। तब न तो देश की मिट्टी की गुणवत्ता की जांच की गई और न ही यह जानने की कोशिश की गई कि किस प्रदेश की मिट्टी में कौन से पोषकतत्व की कमी है। हरित क्रांति की उस आंधी में यह मान लिया गया कि मशीनों और उर्वरकों का ज्यादा से ज्यादा उपयोग ही विकसित खेती की निशानी है। हालांकि हरित क्रांति के बाद खाद्यान्न उत्पादन में बढ़ोतरी हुई, लेकिन अब इसके अगुवा प्रदेशों मसलन हरियाणा, पंजाब और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में उत्पादन दर नकारात्मक हो गई है। बंजर में तब्दील होते खेतों से निराश किसान मौत को गले लगाते रहे, लेकिन सत्ताधीशों ने कुछ करोड़ रुपये के पैकेज देकर जनता को बरगलाते रहे। समस्या की तह में जाने का प्रयास किसी ने नहीं किया और अब बंजर होती उपजाऊ जमीन के भयंकर आंकड़े सामने आ रहे हैं। भारतीय कृषि शोध संस्थान ने पिछले दिनों विजन 2030 दस्तावेज प्रकाशित किया है, जिसके मुताबिक। खेती लायक देश की कुल 14 करोड़ हैक्टेयर में से 12 करोड़ हैक्टेयर भूमि की उत्पादकता घट चुकी है। यही नहीं 84 लाख हैक्टेयर कृषि योग्य भूमि जलप्लावन अथवा खारेपन की समस्या से ग्रसित है। तेजी से घट रहे पेड़-पौधे और खनन कार्यो में हो रही बढ़ोतरी ने भी कृषि योग्य भूमि की कब्र खोदने का काम किया है। वनावरण घटने से मिट्टी में प्राकृतिक खाद की कमी होती जा रही हैं, वहीं बढ़ते खनन से मिट्टी में उपलब्ध तत्वों का अनुपात गड़बड़ा गया है। मिट्टी में किस पोषक तत्व की कमी है यह जाने बिना ही हमारे किसान सस्ते उर्वरकों का नुकसानदायक इस्तेमाल कर रहे हैं। रासायनिक उर्वरकों के असंतुलित उपयोग के कारण ही खेती लायक भूमि बेजान हो चुकी है। रासायनिक उर्वरकों से किसानों के बर्बाद होने की कहानी को यूरिया पर मिलने वाली सब्सिडी के जरिए आसानी से समझा जा सकता है। यूरिया पर सब्सिडी देने की शुरुआत 1977 में की गई थी। यूरिया की कीमतें सरकार तय करती है और उर्वरक कंपनियां सरकारी दर पर ही यूरिया की बिक्री करती हैं। उर्वरक कंपनियों को लागत मूल्य से कम कीमत पर यूरिया बेचने से होने वाले घाटे की भरपाई के लिए सरकार सब्सिडी जारी करती है। उर्वरक कंपनियों को सब्सिडी के रूप में ज्यादा पैसा मिले इसके लिए जरूरी था कि किसानों को यूरिया के इस्तेमाल के लिए प्रोत्साहित किया जाए। उर्वरक कंपनियों के दबाव में कृषि वैज्ञानिकों और सरकार ने यूरिया के प्रचार-प्रसार में कोई कोर-कसर बाकी नहीं रखा। मिट्टी में कमी चाहे जिंक, फॉस्फेट या किसी दूसरे किसी पोषक तत्व की रही हो, लेकिन किसानों को केवल यूरिया के छिड़काव की ही सलाह दी गई । नतीजन यूरिया पर दी जाने वाली सब्सिडी का बिल साल दर साल बढ़ता गया और इसके साथ ही उर्वरक कंपनियों के थैले भी भरते रहे। इस लूट से किसान रासायनिक उर्वरकों के जाल में फंसते गए। किसानों के कल्याण के नाम पर रचे गए इस ढोंग ने यूरिया के इस्तेमाल को बढ़ावा दिया, नतीजन देश की उपजाऊ मिट्टी में पोषक तत्वों का अनुपात इस कदर बिगड़ गया कि अब उत्पादन दर नकारात्मक हो गई है। विडंबना यह है कि 2004-05 से लेकर अब तक महज पांच सालों में रासायनिक उर्वरकों की खपत में 40 से 50 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है, लेकिन इस दौरान देश में खाद्यान्न उत्पादन केवल दस फीसदी बढ़ा है। आजादी के बाद से ही जैविक उर्वरकों को हाशिये पर डालकर सरकारें रासायनिक उर्वरकों के इस्तेमाल को बढ़ावा देने में जुटी रहीं। 1950-51 में रासायनिक उर्वरकों की सालाना खपत 70 हजार टन थी वहीं 2010-11 में यह बढ़कर साढ़े ़पांच करोड़ टन हो गई है। गौर करने वाली बात यह है कि देश की कुल उर्वरक खपत में यूरिया का हिस्सा 2.7 करोड़ टन है यानी इस्तेमाल किए जाने वाले उर्वरकों में आधे से ज्यादा यूरिया है। यूरिया से इस अत्यधिक मोह के कारण मिट्टी में सूक्ष्म पोषक तत्वों मसलन जिंक, जिप्सम, कॉपर सल्फेट व कैल्शियम की भारी कमी हो गई है। यूरिया की अधिकता से कार्बनिक तत्वों की कमी हो गई है जिससे मिट्टी कड़ी होकर तेजी अनुपजाऊ मिट्टी में तब्दील होती जा रही है। गंगा के मैदानी इलाकों समेत अधिकांश जगह उत्पादन स्थिर या नकारात्मक हो गया है। रासायनिक उर्वरकों के बढ़ते दखल से कृषि की लागत में भी अप्रत्याशित बढ़ोतरी हुई है, लिहाजा छोटे किसान खेती छोड़ रहे हैं। नाइट्रोजन की अधिकता के कारण यूरिया पर्यावरण की दृष्टि से भी खतरनाक है और हमारी आसपास की आबो-हवा को भी तेजी से बिगाड़ रहा है। पर्यावरणविदों का मानना है कि महज रासायनिक उर्वरकों का निर्माण रोककर ही भारत हरित गैसों के उत्सर्जन में आठ फीसदी की कमी कर सकता है। यूरिया के बेहताशा उपयोग ने पानी की मांग को बढ़ाया है और आज राजस्थान के श्रीगंगानगर व हनुमानगढ जैसे जिलों में जल-संकट इसी का परिणाम है। ग्रीनपीस नामक स्वयंसेवी संगठन के सर्वे में यह बात सामने आई थी कि देश के 96 फीसदी किसान रासायनिक उर्वरकों का इस्तेमाल नहीं करना चाहते हैं, लेकिन सब्सिडी के चलते वह विवश हैं। यह सुखद संकेत है कि अधिकांश किसान इस सच्चाई से वाकिफ हैं कि रासायनिक उर्वरकों के कारण ही मिट्टी का उपजाऊपन घट रहा है। रासायनिक उर्वरकों के लगातार उपयोग से मिट्टी में रहने वाले उपयोगी केंचुए और कीड़े-मकोड़े मर चुके हैं। अब मिट्टी की घटती उर्वरता से बेहाल किसान आत्महत्या कर रहे हैं। नीति-निर्धारक गलत कृषि नीति पर विचार करने की बजाय सब्सिडी बचाने के फेर में उलझ रहे हैं। उर्वरकों में पोषक तत्वों की उपलब्धता के आधार पर सब्सिडी देने की योजना पिछले साल लागू की गई थी, लेकिन यूरिया को इस योजना से बाहर रखा गया। हालांकि यूरिया कंपनियों को मालामाल करने के लिए यह कदम उठाया गया, लेकिन बेवजह इसे राजनीतिक संवेदनशीलता का मसला बताकर किसान हित का रंग दे दिया गया। अब यूपीए सरकार के आर्थिक मैनेजर दावा कर रहे हैं कि यूरिया को एनबीएस योजना में शामिल करने के बाद सब्सिडी बिल में 20 फीसदी से ज्यादा की कमी आएगी। सवाल है कि सरकार सब्सिडी बिल कम करने की जुगत में है या किसानों के भले के लिए कुछ करना चाहती है|
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