यह वृंदावन नहीं, लेकिन उससे कम भी नहीं! वृंदावन में श्रीकृष्ण की बांसुरी पर पेड़-पौधे, जीव जंतु सभी झूमते थे। यहां श्रीकृष्ण तो नहीं, लेकिन संगीत की सुर लहरियों पर पेड़-पौधे झूम के फल-फूल रहे हैं। संगीत की तान पेड़-पौधों के लिए अद्भुत टॉनिक का काम कर रही है। वातावरण पर संगीत का असर देखना है तो आइए देहरादून के नजदीक थान गांव की पहाड़ी पर। चौधरी इकबाल सिंह ने व्यावहारिक प्रयोग से इस धारणा को विश्वास में तब्दील कर दिया कि पेड़-पौधों पर भी संगीत का असर पड़ता है। राजधानी से 22 किमी दूर थान गांव की पहाड़ी पर चौधरी इकबाल सिंह ने वृंदावन बसाया है। जहां संगीत की सुर-लहरियों पर मस्त झूमते उनके बागीचे के यौवन के आगे दूसरे बाग फीके नजर आ रहे हैं। सेब, अमरूद, संतरा, कीनू, नाशपाती जैसे 4500 पौधों के बाग से चार में इकबाल तीन फसलें ले चुके हैं। इसके उलट चार साल पहले दूसरे किसानों ने जो बाग लगाए थे, वे अभी फल आने का इंतजार ही कर रहे हैं। उत्तर प्रदेश के फतेहपुर से 1968 में आकर देहरादून बसे इकबाल ने चार साल पहले थानगांव में 32 बीघा भूमि खरीदी और उस पर अपना पेड़ पौधों का वृंदावन बसाया। स्नातकोत्तर तक की पढ़ाई और फिर ठेकेदारी के बाद बागवानी में उतरे इकबाल सिंह का संगीत प्रेम उनकी असली ताकत बन गया। बकौल सिंह, मैं सोचता था कि जब संगीत पर मनुष्य झूम उठता है तो पौधे भी जरूर झूमते होंगे। दो साल पहले इसके लिए म्यूजिक सिस्टम लगाया और पुराने गीत बजाने शुरू किए। तीन-चार माह बाद इसका असर भी दिखने लगा। अब पार्क में जगह-जगह 14 स्पीकरों के जरिए पेड़-पौधों को संगीत सुनाया जाता है।
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Sunday, February 20, 2011
Wednesday, February 2, 2011
उत्तराखंड जानेगा बंजरखेतों व पलायन का राज
उत्तराखंड के गांवों में लगातार खेतों के बंजर होने और बढ़ते पलायन से चिंतित राज्य के कृषि विभाग की नींद टूट गई है। राज्य के गठन के एक दशक के बाद जागे कृषि विभाग के अफसर गांवों में जाकर न सिर्फ किसानों के दर पर दस्तक देंगे, बल्कि यह पता भी लगाएंगे कि समस्या कहां आ रही है और इसका निदान भी कराएंगे। केंद्र हो या राज्य सरकार, सभी की चिंता में कृषि शामिल है। खेती-किसानी की दशा सुधारने को अनेक योजनाएं भी चल रही हैं, लेकिन किसानों के हालात जस के तस हैं। उत्तराखंड के परिप्रेक्ष्य में देखें तो यहां स्थिति ज्यादा खराब है। पहाड़, मैदान और घाटी वाले इलाकों में सिमटी कृषि वक्त की मार झेल रही है। योजनाओं का लाभ किसानों तक नहीं पहंुच पा रहा और हुक्मरानों ने भी कभी इस पर गंभीरता से गौर करने की जरूरत नहीं समझी। राज्य बनने के दस साल बाद भी कृषि नीति धरातल पर नहीं आ पाई है। सरकारी उपेक्षा का सबसे ज्यादा असर पहाड़ पर पड़ा है, जहां तमाम कारणों से लोग कृषि से विमुख हो रहे हैं। हालात का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि कृषि भूमि 7.5 लाख हेक्टेयर है, जबकि बंजर भूमि का दायरा 8.5 लाख हेक्टेयर। कृषि की इस तस्वीर ने अब राज्य की रमेश पोखरियाल निशंक की सरकार को गंभीरता से सोचने पर विवश कर दिया है। यही वजह है कि उसने अब अफसरों को किसान के द्वार पर दस्तक देने को कहा है। इसके लिए बाकायदा शेड्यूल तय किया गया है। इसके तहत सचिव से लेकर अपर व उप सचिव तक माह में एक दिन, निदेशक चार दिन, मंडल स्तर के अफसर प्रत्येक 15 दिन में, मुख्य कृषि अधिकारी हफ्ते में दो दिन और कृषि एवं भूमि संरक्षण अधिकारी 15 दिन फील्ड में रहेंगे।
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