Showing posts with label पृ.सं.६. Show all posts
Showing posts with label पृ.सं.६. Show all posts

Monday, February 14, 2011

अधिग्रहण केभय में मिट्टी बेच रहे किसान


इसे भूमि अधिग्रहण का डर कहें या दोहरी कमाई का लालच, कुरुक्षेत्र के किसान धरती की छाती चीर कर धड़ल्ले से मिट्टी बेच रहे हैं। शहर के आसपास और राजमार्ग के किनारे बसे गांवों में तीन से चार फुट गहराई तक खनन किए जाने से खेत जैसे तालाब बन गए हैं। किसानों की सोच है कि मिट्टी खनन से उनकी जमीन अधिग्रहण से बच जाएगी और यदि ऐसा नहीं भी हुआ तो अच्छी खासी कमाई तो हो रही है। अधिग्रहण के लिए तय दर से मुआवजा तो एकसमान ही मिलना है। यानि आम के आम व गुठली के दाम। पिछले कुछ सालों से शहरों के आसपास कृषि भूमि का अधिग्रहण अधिक हुआ है। सरकार कीमती जमीन अधिग्रहण कर निजी हाथों में बेच रही है। इससे किसानों को कम मुनाफा हुआ, जबकि कालोनाइजर करोड़ों में खेल रहे हैं। जिस तेजी से भूमि अधिग्रहण का हो रहा है, उससे डरे शहर के आसपास के गांवों के लोगों ने कृषि भूमि से मिट्टी का खनन कर उसे बेचना शुरू कर दिया है। किसानों को खेत से प्रति एकड़ एक फीट मिट्टी के खनन की कीमत सवा लाख रुपये तक मिल रही है। किसान खेतों से 4-4 फुट मिट्टी उठवा रहे हैं। इस तरह किसानों के संग मिट्टी का कारोबार करने वालों की भी पौबारह हो रही है। शहरों में कंक्रीट के जंगल तेज गति से बढ़ रहे हैं, इस कारण मिट्टी मुंहमांगे भाव पर बिक रही है। मिट्टी का कारोबार करने वाले ईश्वर का कहना है कि शहर में एक ट्राली मिट्टी छह सौ रुपये में बिकती है। दयालपुर समेत कई गांवों मिट्टी का खनन का काम धड़ल्ले से जारी है। इससे चार-पांच लाख रुपये प्रति एकड़ मिल रहे हैं। किसान रमेश का कहना है कि जमीन के गहरी होने के कारण अधिग्रहण की संभावना कम हो जाती है। यदि फिर भी अधिग्रहण होती है तो उन्हें तो गहराई वाली जमीन के रुपये उतरने ही मिलेंगे, जितने बिना मिट्टी उठाई गई जमीन के मिलते हैं। किसानों का कहना है कि मिट्टी उठाने के बाद भी खेती हो जाती है, हालांकि उत्पादन इतना नहीं होता। कृषि विकास अधिकारी डॉ. सुरेंद्र टामक के अनुसार, कृषि भूमि खनन को बहुत ज्यादा खतरनाक है। उन्होंने कहा कि मिट्टी उठने पर जमीन की उवर्रता शक्ति न के बराबर रह जाती है।


Thursday, February 3, 2011

झारखंड में ओबीसी परिवारों के खेतों से भी भेदभाव


झारखंड के पूर्वी सिंहभूम जिले के हजारों किसान व्यवस्था के भेदभाव का खामियाजा भुगत रहे हैं। एक ओर एससी किसानों को चिन्हित कर गांव-गांव में कुएं खोदे जा रहे है तो दूसरी ओर गरीब और निहायत जरुरतमंद अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) परिवार के खेत अब भी प्यासे है। भेदभाव से कुपित ओबीसी परिवारों ने अपना भाग्य स्वयं लिखने की ठानी है। गालूडीह क्षेत्र के बांधडीह गांव की महिलाओं ने खेतों की प्यास बुझाने के लिए हाथ में फावड़ा उठा लिया है। सरकारी नीतियों को चुनौती देने के साथ ही उन्होंने खेतों तक पानी पहुंचाने की कसम उठाई है। गालूडीह क्षेत्र के बांधडीह गांव की महिलाओं ने ओबीसी वर्ग के जरूरतमंद किसान अपने खेतों तक पानी पहुंचाने के लिए स्वयं पूरे परिवार के साथ कुंआ खोदने में जुटे हुए है। पिछले 10 दिन से खेत तक पानी पहुंचाने के लिए कुंआ खोदने में जुटी गांव की नमिता महतो, सुशीला महतो, ज्योत्सना महतो और सरस्वती महतो प्रतिदिन बच्चों की शिक्षा व दूसरे काम छोड़ अहले सुबह से ही फावड़ा लेकर निकल पड़ती है। दोपहर 11 बजे तक वे कुएं की खुदाई में जुटी रहती है। इसके बाद इन महिलाओं को ध्यान घर के दूसरे कामों की ओर जाता है। इन महिलाओं की शिकायत सरकार से है तो उनकी नीतियों को भी वे जिम्मेदारी ठहराती है। नमिता महतो ने कहा, किससे शिकवा करें और किससे शिकायत। सरकार एससी को चिन्हित कर गांव-गांव कुएं खुदवा रही है, परंतु ओबीसी को सरकार की ओर से कोई लाभ नहीं दिया जा रहा। व्यथित महिलाओं का कहना है कि वे सिर्फ जात के बड़े है। परंतु आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं कि अपने खेतों की सिंचाई के लिए डीप बोरिंग आदि की व्यवस्था कर सके। मजदूर किसानों ने खेत तक पानी पहुंचाने के लिए परिवार के साथ स्वयं कुंआ खोदने की जिम्मेदारी संभाली है। ताकि मौसम के अनुरूप फसल को बचाया जा सके। नमिता ने बताया कि खेती छोड़ उसके परिवार के पास जीवनयापन को और कोई साधन नही है। ओबीसी प परिवारों का गुस्सा नवनिर्वाचित पंचायत प्रतिनिधियों से भी कम नहीं है। इनका आरोप है कि हर योजना पर नारियल फोड़ शिलान्यास करने वाले इन जनप्रतिनिधियों का ध्यान भी इस ओर नहीं जा रहा। एक ओर खेतों तक पानी पहुंचाने के लिए सरकारी प्रयास किये जा रहे है तो दूसरी ओर चंद मीटर दूर पड़ोसियों के खेत बूंद-बूंद पानी को तरस रहे है।


Wednesday, February 2, 2011

उत्तराखंड जानेगा बंजरखेतों व पलायन का राज


उत्तराखंड के गांवों में लगातार खेतों के बंजर होने और बढ़ते पलायन से चिंतित राज्य के कृषि विभाग की नींद टूट गई है। राज्य के गठन के एक दशक के बाद जागे कृषि विभाग के अफसर गांवों में जाकर न सिर्फ किसानों के दर पर दस्तक देंगे, बल्कि यह पता भी लगाएंगे कि समस्या कहां आ रही है और इसका निदान भी कराएंगे। केंद्र हो या राज्य सरकार, सभी की चिंता में कृषि शामिल है। खेती-किसानी की दशा सुधारने को अनेक योजनाएं भी चल रही हैं, लेकिन किसानों के हालात जस के तस हैं। उत्तराखंड के परिप्रेक्ष्य में देखें तो यहां स्थिति ज्यादा खराब है। पहाड़, मैदान और घाटी वाले इलाकों में सिमटी कृषि वक्त की मार झेल रही है। योजनाओं का लाभ किसानों तक नहीं पहंुच पा रहा और हुक्मरानों ने भी कभी इस पर गंभीरता से गौर करने की जरूरत नहीं समझी। राज्य बनने के दस साल बाद भी कृषि नीति धरातल पर नहीं आ पाई है। सरकारी उपेक्षा का सबसे ज्यादा असर पहाड़ पर पड़ा है, जहां तमाम कारणों से लोग कृषि से विमुख हो रहे हैं। हालात का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि कृषि भूमि 7.5 लाख हेक्टेयर है, जबकि बंजर भूमि का दायरा 8.5 लाख हेक्टेयर। कृषि की इस तस्वीर ने अब राज्य की रमेश पोखरियाल निशंक की सरकार को गंभीरता से सोचने पर विवश कर दिया है। यही वजह है कि उसने अब अफसरों को किसान के द्वार पर दस्तक देने को कहा है। इसके लिए बाकायदा शेड्यूल तय किया गया है। इसके तहत सचिव से लेकर अपर व उप सचिव तक माह में एक दिन, निदेशक चार दिन, मंडल स्तर के अफसर प्रत्येक 15 दिन में, मुख्य कृषि अधिकारी हफ्ते में दो दिन और कृषि एवं भूमि संरक्षण अधिकारी 15 दिन फील्ड में रहेंगे।



Sunday, January 23, 2011

बंदूक के साये में प्याज की खेती


प्याज के दामों में लगी आग के कारण हरियाणा के किसान गेहूं छोड़ प्याज की खेती में लग गए हैं। किसानों के बढ़ते आकर्षण का ही नतीजा है कि प्याज की पौध के दामों में भी उछाल आ गया है। मांग बढ़ने से खेतों में खड़ी प्याज की पौध के चोरी होने को अंदेशा है। ऐसे में किसान हथियारों के साथ पौध पर दिन रात पहरा दे रहे हैं। हरियाणा में किसान रबी सीजन में गेहूं की फसल को प्रमुखता देते हैं। सूबे में करीब 25 लाख हेक्टेयर रकबे में गेहूं की बुआई होती है। इस साल देश भर में प्याज का खुदरा मूल्य सौ रुपये प्रति किलो तक जा पहुंचा। अभी भी प्याज 50 रुपये किलो से अधिक चल रहा है। ज्यादा से ज्यादा लाभ की उम्मीद में किसान प्याज की फसल लगाने की तैयारी में जुटे हैं। विभिन्न जिलों में रोपाई का काम जोरों पर है। पिछले साल कुरुक्षेत्र जिले में प्याज का रकबा साढ़े सात सौ हेक्टेयर था। बागवानी विभाग के अनुसार, इस बार इसमें कई गुणा वृद्धि होने की संभावना है। बहुत से किसानों ने गेहूं का मोह छोड़ प्याज के लिए खेत खाली छोड़ रखे हैं। आलू उखाड़ने के बाद खाली हुए रकबे में प्याज की रोपाई हो रही है।प्याज के प्रति आकर्षण देख प्याज की पौध तैयार करने वाले किसानों ने इसके दाम भी एकाएक बढ़ा दिए हैं। इस बार 50 रुपये प्रति किलो के हिसाब से पौध बिकी है। हालांकि जिन किसानों की पौध ज्यादा उम्र की होती जा रही है, वह उसे कुछ कम दाम कर बेच रहे हैं। प्याज की पौध की बढ़ी मांग के चलते इसके चोरी होने का भी डर बना हुआ है। कई जगह पौध चोरी की घटनाएं हुई। हालांकि यह मामला थाने तक नहीं पहुंचा है। ऐसे में मुख्य सड़क के आसपास तैयार प्याज की पौध पर किसान 24 घंटे पहरा दे रहे हैं। कइयों ने तो अपने लाइसेंसी हथियार भी अपने पास रखे हैं। बंदूक के साथ प्याज की फसल पर पहरा दे रहे गांव बीड सौंटी के किसान हरबंस सिंह और ध्यान सिंह का कहना है कि पौध के दाम इतने बढ़ चुके हैं कि इसकी चोरी का खतरा है। उनके खेत जंगल के पास है, यहां चोरी की संभावना ज्यादा रहती है। ऐसे में उन्हें दिन-रात निगरानी करनी पड़ रही है। सब्जी विशेषज्ञ डा. सीबी सिंह का कहना है कि प्रदेश में पहली बार प्याज के प्रति किसान इतने आकर्षित होते दिखाई दिए हैं। किसान महंगे दामों में पौध खरीदकर प्याज की रोपाई करने में जुटे हैं।

Thursday, January 20, 2011

अफ्रीका में खेती करा रहे भारतीय काश्तकार

xआने वाले दिनों में पंजाब की रसोई में अफ्रीका की आर्गेनिक (बिना रासायनिक खाद व कीटनाशक के छिड़काव से पैदा होने वाली) दालें पकती नजर आएंगी। पंजाब व हरियाणा के किसानों ने अफ्रीका में 80 हजार एकड़ जमीन 49 सालों की लीज पर ली है। इस जमीन पर वे अरहर, चना, मूंग, राजमा, सोयाबीन, मकई के साथ-साथ सब्जियों व अन्य चीजें पैदा कर रहे हैं। दोनों मुल्कों के बीच हुए समझौते के बाद अब किसान भारत को आर्गेनिक दालें व सब्जी भेजेंगे। अफ्रीका में चार हजार एकड़ जमीन लीज पर लेने वाले अमृतसर के रविंदर पाल सिंह और पवन शर्मा के मुताबिक, उन्होंने दस डॉलर प्रति एकड़ साल के दर पर जमीनें लीज पर ली गई हैं। हालांकि जमीन काफी खराब हैं, लेकिन अब धीरे-धीरे वहां पर आर्गेनिक दाल और सब्जी की अच्छी खेती होने लगी है। इसके अलावा अफ्रीका में एक डॉलर रोजाना पर श्रमिक आसानी से उपलब्ध हैं। रविंदर पाल सिंह के अनुसार भिवानी के चौधरी महिंदर सिंह, दीवान सिंह के पास सौ एकड़ से अधिक जमीन है, जहां पर वह आर्गेनिक दालों की पैदावार करते हैं। उन्होंने हरियाणा में अब दालें भेजने के लिए करार किया है। भारत से अफ्रीका में खेती करने के लिए जो भी खेती उपकरण भेजे जाते हैं, वे भी ड्यूटी फ्री हैं। ऐसे में पंजाब से अफ्रीका में खेती करने के लिए ट्रैक्टर, ट्राली के साथ-साथ कटाई की मशीनें ले जाई गई हैं। अमृतसर के ग्रीन वैली आर्गेनिक फूड लिमिटेड की डायरेक्टर पूजा मल्होत्रा कहती हैं कि जल्द ही अफ्रीका से दालें व सब्जियां पंजाब आना शुरू हो जाएंगी। खास बात यह है कि अफ्रीका से आने वाली दालें भारत की मौजूदा मार्केट से कहीं सस्ती पड़ेंगी।


Saturday, January 15, 2011

उत्तराखंड के 18 हजार किसान तीन वैज्ञानिकों के भरोसे

मुख्यमंत्री डॉ. रमेश पोखरियाल निशंक उत्तराखंड को जड़ी-बूटी प्रदेश बनाने का दावा भले ही करें, हकीकत कोसों दूर है। प्रदेश में जड़ी-बूटी की खेती में लगे करीब 18 हजार किसानों की पूरी जिम्मेदारी तीन वैज्ञानिकों पर है। सगंध पौधों की खेती में लगे हजारों काश्तकारों की समस्याओं से निपटने के लिए सिर्फ तीन वैज्ञानिक ही तैनात हैं। ऐसे में किसानों को दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। प्रदेश में जड़ी-बूटी और सगंध पौधों की खेती में लगे काश्तकार खासे परेशान हैं, क्योंकि उन्हें खेती से संबंधित विभिन्न जानकारी और सुझाव नहीं मिल रहे हैं। किसानों को जड़ी-बूटी की खेती की नई जानकारी देने और उनकी दिक्कतों को हल करने के लिए उत्तर प्रदेश सरकार ने 1993 में हर्बल रिसर्च एंड डेवलपमेंट इंस्टीट्यूट की स्थापना की। वर्तमान में इस संस्थान में पूरे प्रदेश के करीब 18 हजार किसान पंजीकृत हैं, लेकिन गत 17 साल बीतने के बाद भी यहां कार्यालय स्टाफ के केवत तीन पद ही स्थाई हैं। किसानों की समस्याओं का निराकरण करने वाले वैज्ञानिकों को संविदा पर नियुक्त किया गया है। खास बात यह है कि पैथोलॉजिस्ट, बायोकेमिस्ट, बायोटेक्नोलॉजिस्ट, एग्रोनोमिस्ट जैसे महत्वपूर्ण पद खाली हैं। ऐसे में किसानों को खेती में किसी भी तरह की समस्या होने पर उनका निराकरण नहीं हो पाता है। अधिकारियों की मानें तो हजारों की संख्या में खेती कर रहे किसानों की समस्याओं को जानना ही बहुत मुश्किल है। तकनीकी पदों के रिक्त होने से सबसे अधिक समस्या आ रही है। इसके कारण शोध कार्य भी लंबे समय से ठप पड़े हैं। प्रदेश के 95 ब्लॉकों में से 54 में मास्टर ट्रेनर भी नियुक्त किए गए हैं। साथ ही नए प्रोजेक्ट पर प्रोजेक्ट स्टॉफ भी नियुक्त किया गया है, लेकिन तकनीकी समस्याओं का निराकरण करने वालों के सभी पद रिक्त हैं। हर्बल रिसर्च एंड डेवलपमेंट इंस्टीट्यूट (एचआरडीआई) के निदेशक डॉ. आरसी सुंदरियाल का कहना है कि किसानों को बीज, पौध और तकनीकी ज्ञान देने के उद्देश्य से प्रदेश में 62 नर्सरियों की स्थापना की गई है। इस वर्ष 65 और नर्सरियों की स्थापना को स्वीकृति दी गई है। ढांचागत सुविधाएं न होने से किसानों के साथ-साथ संस्थान को भी कई तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ता है। प्रदेश मंत्रिमंडल ने कुछ प्रस्तावों को सहमति दी है। उम्मीद है कि जल्द ही सभी समस्याएं दूर हो जाएंगी।


Thursday, January 13, 2011

लखनऊ में भी सुलग रहा है किसान आंदोलन

आगरा और टप्पल के बाद अब लखनऊ में भी किसान आंदोलन सुलगने लगा है। लखनऊ विकास प्राधिकरण (एलडीए) द्वारा 500 एकड़ भूमि का अधिग्रहण किए जाने से खफा फैजुल्लागंज के घैला, दाऊद नगर, रहीमनगर डिडौली और गाजीपुर बलराम के किसानों ने संघर्ष का बिगुल बजा रखा है। 18 जनवरी को इलाहाबाद में किसान आंदोलन की जो रणनीति तय होगी, उसमें लखनऊ का भू-अधिग्रहण व किसान आंदोलन का मुद्दा अहम होगा। एलडीए ने 197 गांवों को अपनी सीमा में जोड़ा है। माना जा रहा है कि इन गांवों की जमीन पर भी प्राधिकरण की नजर रहेगी। गोमतीनगर फेस-दो में किसानों को हाईकोर्ट के आदेश के बाद भी उचित मुआवजा नहीं मिल सका। 1.60 रुपये प्रति वर्गफीट की दर एलडीए ने तय की थी, जबकि हाईकोर्ट के आदेश के बाद करीब 450 किसानों को दो रुपये प्रति फीट के हिसाब से मुआवजा मिलना बाकी है। आवास विकास परिषद के तहत 1981 में अधिग्रहीत तकरोही, मटियारी और हरदासी खेड़ा के किसानों के मुआवजे का मामला अभी तय नहीं हो पाया है। चिनहट के बाघामऊ और भरवारा के किसानों की जमीनों के कम दाम पर भी किसानों में नाराजगी है। हरदोई रोड के बसंतकुंज में 1981 में अधिग्रहीत 250 एकड़ भूमि की दरों को लेकर किसानों का आंदोलन समय-समय पर सड़कों पर दिखता है। भाकियू जिलाध्यक्ष हरनाम सिंह वर्मा का कहना है कि लखनऊ में 2687 एकड़ कृषि योग्य भूमि के अधिग्रहण की कार्यवाही चल रही है। सरकार की इस मंशा से नाराज किसान आंदोलन को तैयार हैं। 16 से 18 जनवरी के बीच इलाहाबाद में किसान आंदोलन को लेकर जो रणनीति तय होगी, उसमें लखनऊ का मुद्दा प्रमुख होगा। लखनऊ औद्योगिक विकास प्राधिकरण (लीडा) में भी जिले के 49 गांवों की करीब दो हजार एकड़ भूमि के अधिग्रहण का मामला अभी शांत है लेकिन यह तेज हो सकता है।

Sunday, January 9, 2011

1000 एकड़ में लगेंगे मलेरियारोधी पौधे

मलेरिया की दवा आर्टीइथर बनाने के लिए आर्टीमिसिनिन रसायन की विश्व की जरूरत का अस्सी फीसदी अकेले चीन पूरा करता है। चीन के इस दबदबे को टक्कर देने को अब देश के किसानों ने कमर कस ली है। उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, बिहार और गुजरात के किसानों ने सीमैप और रतलाम की दवा कंपनी के साथ हाथ मिलाया है। यूपी और उत्तराखंड के एक हजार एकड़ क्षेत्र में मलेरियारोधी पौधे आर्टीमीसिया एन्नुआ को उगाने की तैयारी है। इसके लिए सीमैप द्वारा विकसित आर्टीमीसिया एन्नुआ की आरोग्या किस्म की नर्सरी तैयार कर ली गई है और अब इन पौधों को रोपने की तैयारी है। दवा कंपनी ने पौधे लगाने को यूपी के 150 से अधिक किसानों के साथ अनुबंध किया है। इसके तहत कंपनी ने सीमैप द्वारा तैयार बेहतर किस्म के बीज किसानों को नर्सरी लगाने को दिए हैं। अब किसान 30 दिनों के भीतर खेतों में रोपाई का काम पूरा कर लेंगे। तीन माह में फसल तैयार हो जाएगी। अनुबंध के मुताबिक तैयार फसल को कंपनी सीधे खेत से उठा लेगी। बुंदेलखंड के 200 एकड़ क्षेत्र में पहली बार औषधीय पौधों की खेती की जा रही है।
हर वर्ष 60 टन आर्टीमिसिनिन की जरूरत : मलेरिया भारत और अफ्रीका जैसे विकासशील देशों की बीमारी है। मलेरियारोधी दवा तैयार करने के लिए भारत को हर साल 60 टन से अधिक आर्टीमिसिनिन की जरूरत पड़ती है। जिसकी आपूर्ति फिलहाल चीन के ऊपर निर्भर है। आर्टीमिसिनिन का अंतर्राष्ट्रीय बाजार में मूल्य 400 डॉलर प्रति किलोग्राम है। जाहिर है कि दवा कंपनियों को कच्चे माल के लिए विदेशी मुद्रा के रूप में मोटी रकम अदा करनी पड़ती है।


सिंगापुर को महकाएगी उत्तराखंड की तुलसी

उत्तराखंड के आंगन की तुलसी सिंगापुर को महकाने की तैयारी में है। यहां के किसानों ने बड़े पैमाने पर तुलसी की खेती करके विशेष चाय तैयार की है। इस चाय की चुस्कियां सिंगापुर के व्यवसायियों को काफी पसंद आई हैं। उन्होंने चाय की खरीद का बड़ा ऑर्डर दिया है। राज्य में तुलसी की खेती से जुड़े 300 कृषक विदेशी खिदमत में हाजिर होने को उत्साहित नजर आ रहे हैं। घर के खलियान से खेतों और फिर चाय के रूप में बाजार पहुंची तुलसी के पीछे रोचक कहानी छिपी है। चमोली जिले के घाट, कर्णप्रयाग और गैरसैंण के किसान इस बात से परेशान थे कि उनकी अधिकांश फसल बंदर व अन्य जानवर तबाह कर देते हैं। हिमालयन एक्शन रिसर्च सेंटर (हार्क) ने उन्हें तुलसी की खेती करने का उपाय सुझाया। साथ ही उन्हें तुलसी की चाय बनाने में तकनीकी मदद भी दी। आज यहां के 300 किसान परिवार करीब डेढ़ सौ बीघा भूमि पर तुलसी की खेती कर रहे हैं। हार्क की मदद से तुलसी की बूरे वाली चाय के साथ ही डिप वाली चाय भी तैयार की जा रही है। हार्क के संचालक महेंद्र कुंवर ने बताया कि चाय के सैंपल निर्यातकों के माध्यम से सिंगापुर भेजे गए थे। वहां से बेहतर रिस्पांस मिला है। सिंगापुर के व्यवसायियों ने बड़ी मात्रा में चाय की सप्लाई का ऑर्डर दिया है। किसान विदेशी ऑर्डर से काफी उत्साहित हैं। इस साल करीब एक करोड़ रुपए की चाय निर्यात करने का लक्ष्य रखा गया है। कुंवर ने बताया कि दुबई से भी चाय की डिमांड मिलने की उम्मीद है। वहां भेजे गए सैंपल्स को भी गुड कमेंट्स मिले हैं।
तुलसी के फायदे : तुलसी की चाय सर्दी-जुकाम के दुष्प्रभाव रोकने में मदगार है और इसकी खुशबू में लाजवाब होती है चाय। कम पानी वाली जगहों पर आसानी से उग जाते हैं तुलसी के पौधे। विशेष गंध के कारण जंगली जानवर तुलसी के पौधों को नुकसान नहीं पहुंचाते हैं। तुलसी की खेती साल भर में तीन बार की जा सकती है।