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Friday, June 17, 2011
Wednesday, June 1, 2011
खेती की खतरनाक खरीद
लेखक औद्योगिक विकास के नाम पर कृषि योग्य भूमि के अंधाधुंध अधिग्रहण के
गंभीर खतरे गिना रहे हैं…
1996 में विश्व बैंक के तत्कालीन उपाध्यक्ष और अंतरराष्ट्रीय कृषि अनुसंधान सलाहकार समूह के अध्यक्ष डॉ. इस्माइल सेरेगेल्डिन ने एक बयान जारी किया। उन्होंने कहा कि विश्व बैंक का आकलन है कि अगले बीस वर्षो में भारत में ग्रामीण क्षेत्र से शहरी क्षेत्रों में विस्थापन करने वालों की संख्या फ्रांस, ब्रिटेन और जर्मनी की कुल आबादी के दोगुने से भी अधिक हो जाएगी। ब्रिटेन, फ्रांस और जर्मनी की कुल आबादी करीब 20 करोड़ है। इस प्रकार विश्व बैंक का मानना था कि 2015 तक भारत में 40 करोड़ लोग गांवों से शहरों में चले जाएंगे। मैंने समझा कि यह एक चेतावनी है, किंतु जब मैंने इसके बाद की विश्व बैंक की अन्य रपटों का अध्ययन किया तो मुझे उसके असल इरादों का भान हुआ। दरअसल, विश्व बैंक इस प्रक्रिया को रोकना नहीं, तेज करना चाहता था। 2008 में जारी विश्व विकास रिपोर्ट में विश्व बैंक ने स्पष्ट रूप से उल्लेख किया कि भारत में भूमि की किरायेदारी शुरू होनी चाहिए। इसके अनुसार, भूमि बहुत ही महत्वपूर्ण संसाधन है, किंतु यह ऐसे लोगों (किसानों) के हाथों में केंद्रित है, जो इसका कुशलतापूर्वक उपयोग नहीं करते। विश्व बैंक का कहना है कि इन लोगों को इन संसाधनों से बेदखल कर देना चाहिए और भूमि उन लोगों को सौंप देनी चाहिए जो इसका कुशलता से उपयोग कर सकें और वास्तव में ये लोग कॉरपोरेट क्षेत्र के ही हो सकते हैं। किसानों को उनकी जमीन से बेदखल करने की यह प्रक्रिया लंबे समय से चल रही है और अब अपने चरम पर पहुंच गई है। जिस तेज रफ्तार से सरकार भूमि अधिग्रहण के माध्यम से किसानों को जमीन से बेदखल कर रही है इससे विश्व के सामने खाद्य सुरक्षा का संकट गहराता जा रहा है। दुर्भाग्य से हमें यह समझाने की कोशिश की जाती है कि खाद्य उत्पादन के मोर्चे पर घबराने वाली कोई बात नहीं है, क्योंकि कॉरपोरेट जगत खाद्यान्न का कुशलतापूर्वक उत्पादन कर सकता है। मुख्यत: इसी मंशा से 1995 में विश्व व्यापार संगठन के अस्तित्व में आने के बाद से विकासशील देशों में धनी देशों की ओर से अनुदानित और सस्ती दरों पर खाद्यान्न के आयात की बाढ़ आ गई है। इसी प्रकार मुक्त व्यापार समझौतों के नाम पर द्विपक्षीय समझौते और क्षेत्रीय व्यापार संधियों के माध्यम से विकासशील देशों में औद्योगिकीय उत्पादित खाद्यान्न और खाद्य उत्पादों के लिए बाजार विकसित किया जा रहा है। इस प्रकार भूमि और जीविकोपार्जन केंद्रीय मुद्दों में तब्दील हो चुके हैं। ग्रामीण भारत से 40 करोड़ लोगों के संभावित विस्थापन से भारत अब तक विश्व में हुए सबसे बड़े पर्यावरणीय विस्थापन का साक्षी बन जाएगा। यह अवधारणा केवल भारत तक ही सीमित नहीं रहेगी, बल्कि एक बड़ा क्षेत्र इसकी चपेट में आ जाएगा। मेरा अनुमान है कि आने वाले वर्षो में भारत और चीन के 80 करोड़ लोग गांवों से शहरों की ओर कूच कर जाएंगे। जिन करोड़ों लोगों को विस्थापन के लिए मजबूर किया जा रहा है उन्हें कृषि शरणार्थी कहा जा सकता है। क्या हम समझ सकते हैं कि विश्व किस दिशा में जा रहा है? क्या हम अनुमान लगा सकते हैं कि इस भयानक रफ्तार से विस्थापन के कारण कितने गंभीर सामाजिक-आर्थिक और साथ ही राजनीतिक संकट खड़े हो सकते हैं? इसके बजाय हमें बताया जा रहा है कि बढ़ता शहरीकरण वैश्वीकरण और आर्थिक संवृद्धि का अपरिहार्य परिणाम है। हमें बार-बार बताया जा रहा है कि वैश्वीकरण ने राष्ट्रीय सीमाओं का अंत कर दिया है। यह सुनने में अच्छा लग सकता है, किंतु मुझे लगता है कि आने वाले कुछ बरसों में राष्ट्रों की सीमाएं धुंधली होने के बजाए और गहरी व लंबी हो जाएंगी। विकासशील देशों में जिस रफ्तार से और जिस हद तक भूमि हड़पने का सिलसिला चल रहा है वह चिंता का विषय है। उदाहरण के लिए एक भारतीय कंपनी ने अफ्रीका और लैटिन अमेरिका में तीन हजार वर्ग किलोमीटर भूमि हासिल कर ली है। यह क्षेत्र बहुत से छोटे देशों के क्षेत्रफल से भी अधिक है। एक दिन इस भूमि के मालिक झंडा फहराकर यह घोषणा कर सकते हैं कि यह एक स्वतंत्र राष्ट्र है। आप इस संभावना को खारिज कर सकते हैं, किंतु हमें अधिक सावधानी से काम लेना होगा। देर-सबेर समाज कृषि, खाद्य सुरक्षा और भूमि संसाधन की सच्चाई से रूबरू होगा। जितना जल्द यह होगा, उतना ही बेहतर होगा। समस्या यह है कि हम इस तरह के गंभीर मुद्दों पर किसी खास नजरिये और परिप्रेक्ष्य में ही विचार करते हैं, जबकि जमीनी सच्चाई यह है कि ये मुद्दे बहुआयामी और बहुकोणीय होते हैं। जब तक हम ऐसा करने में सफल नहीं होंगे तब तक हम सही संदर्भ में विशिष्ट विचार प्रस्तुत करने में सफल नहीं होंगे। मैं जिन मंचों पर जाता हूं उनमें यह व्यापक सोच नदारद नजर आती है। शायद यही कारण है कि हम अंतरदृष्टि और सार्थकता के साथ असल मुद्दों से भटक जाते हैं। कृषि-व्यापार से यह प्रतीत होता है कि भारत और चीन जैसे देशों को अन्य देशों में अधिक खाद्य उत्पादन करना चाहिए। घरेलू आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए भारत और चीन द्वारा विदेशों में भूमि की खरीदारी को न्यायोचित ठहराया जा रहा है। अधिक खाद्यान्न उत्पादन की जरूरत के मद्देनजर भारी-भरकम कृषि भूमि की खरीदारी की वकालत की जा रही है। आज लैटिन अमेरिका, अफ्रीका और एशिया में शायद ही कोई देश हो जिसकी भूमि न हड़पी जा रही हो। भुखमरी और कुपोषण के शिकार इथियोपिया में आठ हजार से अधिक कंपनियां जमीन हथियाने के प्रयास में हैं। यह देश पहले ही 2000 कंपनियों को 27 लाख हेक्टेयर भूमि आवंटित कर चुका है, जिसमें भारत की कंपनियां भी शामिल हैं। ये कंपनियां इथियोपिया के लिए खाद्यान्न का उत्पादन नहीं करेंगी, बल्कि इसका निर्यात करेंगी। यहां से उत्पादित खाद्यान्न की पहली खेप सऊदी अरब भेजी भी जा चुकी है, जबकि इस देश की जनता दाने-दाने की मोहताज है। यह मुझे इतिहास के काले अध्याय की याद दिलाता है। कुछ दशक पहले आयरलैंड के अकाल की 150वीं वर्षगांठ के आयोजन में मैंने भाग लिया। यह अकाल 19वीं सदी के मध्य में पड़ा था। सम्मेलन का उद्घाटन करते हुए शहर के मेयर ने कहा था कि मैं हैरान हूं कि उस समय कितने बर्बर लोग थे। लोग भूख से मर रहे थे और फिर भी खाद्यान्न के बोरे के बोरे इंग्लैंड भेजे जा रहे थे। मुझे नहीं लगता कि समाज की इस बर्बर प्रकृति में कोई अंतर आया है। आने वाले समय में हम और भी बर्बर समाज में रहेंगे। इथियोपिया में जिस तरह भूमि हड़पी जा रही है, यह बर्बरता से कम नहीं है। देश में लोग भूख से मर रहे हैं और कंपनियों के पास खाद्यान्न के निर्यात की कानूनी अनुमति है। भविष्य में ऐसे और भी उदाहरण देखने को मिलेंगे। (लेखक कृषि एवं खाद्य नीतियों के विश्लेषक हैं)
Thursday, April 28, 2011
दोषपूर्ण खरीद-भंडारण नीति
ऊंची विकास दर, अरबपतियों की बढ़ती संख्या और सूचना प्रौद्योगिकी क्षेत्र में दुनिया भर में धाक जमाने जैसी उपलब्धियों वाला भारत भूख के मामले में अफ्रीकी उपसहारा देशों से भी गई-गुजरी स्थिति में है। गौरतलब है कि भुखमरी की यह समस्या खाद्यान्न की कमी के कारण नहीं, उसके महंगे होने के कारण है, जिससे वह गरीबों की पहुंच से दूर बना हुआ है। इसी का परिणाम है कि भरे हुए भंडारघरों और अनाज सड़ने की घटनाओं के बीच भुखमरी की फसल लहलहा रही है। इसी को देखते हुए उच्चतम न्यायालय ने सरकार को फटकार लगाते हुए कहा कि जिस देश में करोड़ों लोग भुखमरी के शिकार हों वहां अनाज का एक दाना भी बर्बाद नहीं जाना चाहिए। लेकिन इस फटकार से भी सरकार की सेहत पर कोई खास असर नहीं पड़ा है। इस समय केंद्रीय पूल में तय मानक (162 लाख टन) की तुलना में खाद्यान्न का स्टॉक दो गुना से भी अधिक (441.84 लाख टन) है। फिर चालू रबी सीजन में खाद्यान्न पैदावार 23.5 करोड़ टन से अधिक होने वाली है। इसमें अकेले गेहूं की हिस्सेदारी 8.42 करोड़ टन है, जो अब तक की सर्वाधिक है। इसे देखते हुए सरकार ने चालू खरीद सीजन में 2.62 करोड़ टन गेहूं खरीदने का लक्ष्य निर्धारित किया है। लेकिन जमीनी सच्चाई यह है कि भारतीय खाद्य निगम (एफसीआइ) के पास भंडारण के लिए जितने गोदाम हैं वे पिछले सालों के गेहूं व चावल से भरे पड़े हैं और लाखों टन अनाज अभी भी खुले में बने अस्थायी गोदामों में पड़ा है। नियमों के मुताबिक तिरपाल से ढके अस्थायी गोदामों में रखा अनाज हर हाल में साल भर के भीतर खाली करा लिया जाना चाहिए। लेकिन महंगाई से भयाक्रांत सरकार इन्हें खाली कराने से पीछे हट गई। ऐसे में अनाज का फिर सड़ना लगभग तय है। सरकार हर साल करीब 14,000 खरीद केंद्रों से 5.5 करोड़ टन गेहूं और चावल की खरीद करती है। लेकिन देश के दर्जन भर राज्य ऐसे हैं जहां एफसीआइ खरीद नहीं कर पाती, जिससे किसानों को सस्ती दरों पर अनाज खुले बाजार में बेचना पड़ता है। उदाहरण के लिए पूर्वी उत्तर प्रदेश में किसान 1000 रुपये प्रति क्विंटल पर गेहूं बेचने को मजबूर हैं जबकि गेहूं का सरकारी खरीद मूल्य 1,120 रुपये प्रति क्विंटल है और प्रति क्विंटल की सरकारी खरीद पर 50 रुपये बोनस भी मिलता है। इसी को देखते हुए कृषि लागत एवं मूल्य आयोग ने सरकार को सुझाव दिया है कि किसानों से खाद्यान्न की खरीद में एफसीआइ के साथ निजी क्षेत्र का भी सहयोग लिया जाना चाहिए। खरीद-भंडारण नीति को विकेंद्रित करने के उद्देश्य से भंडारण (विकास एवं विनियमन) अधिनियम 2007 के तहत सरकार ने 25 अक्टूबर 2010 को भंडारण विकास एवं नियामक प्राधिकरण का गठन किया है। इसका उद्देश्य अनाज के खरीद-भंडारण क्षेत्र में निजी क्षेत्र को बढ़ावा देना है। लेकिन खरीद-भंडारण को विकेंद्रित करने में सरकारी नीतियां ही बाधक हैं। उदाहरण के लिए इस साल गेहूं की सरकारी खरीद चालू होने से पहले ही भारतीय खाद्य निगम ने पंजाब और हरियाणा के गोदामों को खाली करने के लिए दूसरे राज्यों मे गेहूं व चावल का स्टॉक भेजना शुरू कर दिया। इसे लेकर उन राज्यों ने तीखा विरोध जताया जहां बिना जरूरत के अनाज की आपूर्ति शुरू कर दी गई। उच्चतम न्यायालय ने भी सरकार को सुझाव दिया कि अनाज की भंडारण व्यवस्था को विकेंद्रित किया जाए और हरेक जिले में और जरूरी होने पर तहसील या ब्लॉक स्तर पर भी गोदाम बनाए जाएं। भंडारण क्षमता में वृद्धि के लिए सरकार ने निजी-सार्वजनिक भागीदारी के तहत दस साल की गारंटी स्कीम बनाई है। इसके तहत हर राज्य में एक नोडल एजेंसी बनाई गई है। तय योजना के मुताबिक अगले दो सालों में 150 लाख टन अनाज रखने के लिए नए गोदाम उपलब्ध हो जाएंगे जिससे एफसीआई की मौजूदा भंडारण क्षमता 308 लाख टन से बढ़कर 458 लाख टन हो जाएगी। लेकिन स्कीम की प्रगति इतनी धीमी है कि लक्ष्य प्राप्त होना कठिन लगता है। फिर राज्य सरकारों का असहयोग भी भंडारण क्षमता बढ़ाने में बाधक बना हुआ है। देखा जाए तो खाद्यान्न भंडारण के लिए जगह की व्यवस्था करना एक कठिन चुनौती है। इसका कारण है कि खाद्यान्न के उत्पादन और सरकारी खरीद में वृद्धि के बावजूद सरकार भंडारण क्षमता बढ़ाने के मुद्दे पर आंख बंद किए रही। उसकी नींद तभी टूटी जब स्थिति विस्फोटक हो गई। फिर सरकार की खरीद और भंडारण नीति बेहद केंद्रीकृत रही है। अभी तक अनाज उत्पादक क्षेत्रों में ही भंडारण सुविधा बनाने की नीति रही है, अब इसे बदलकर खपत केंद्रों को आधार बनाना होगा। इससे अनाज की अचानक ढुलाई और कीमतों में उतार-चढ़ाव की समस्या से मुक्ति मिलेगी। फिर अनाज के भंडारण को गेहूं, चावल के चक्र से मुक्ति दिलाकर विकेंद्रीकृत करना होगा। यह तभी संभव है जब पीडीएस में गेहूं, चावल के साथ-साथ दाल, खाद्य तेल, मोटे अनाजों को भी शामिल किया जाए। भंडारण सुविधा में बढ़ोतरी इसलिए भी जरूरी है कि जलवायु परिवर्तन व वैश्विक तापवृद्धि के चलते खाद्यान्न उत्पादन में आकस्मिक परिवर्तन होने लगा है। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं).
Monday, April 11, 2011
Monday, April 4, 2011
तबाही के बीज
जीएम फसलों के दुष्प्रभावों पर लेखक की टिप्पणी
सरकार की जो प्रतिबद्धता किसान और खेती से जुड़े स्थानीय संसाधनों के प्रति दिखाई देनी चाहिए वह बहुराष्ट्रीय कंपनियों के प्रति दिखाई दे रही है। इस मानसिकता से उपजे हालात कालांतर में देश की बहुसंख्यक आबादी की आत्मनिर्भरता को परावलंबी बना देंगे। बीते साल फरवरी में जब पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने बीटी बैंगन की खेती के जमीनी प्रयोगों को बंद करते हुए भरोसा जताया था कि जब तक इनके मानव स्वास्थ्य से जुड़े सुरक्षात्मक पहलुओं की वैज्ञानिक पुष्टि नहीं हो जाती, इनके उत्पादन को मंजूरी नहीं दी जाएगी। इसके बावजूद गोपनीय ढंग से मक्का के संकर बीजों का प्रयोग बिहार में किया गया। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को जब यह पता चला तो उन्होंने सख्त आपत्ति जताते हुए केंद्रीय समिति में राज्य के प्रतिनिधि को भी शामिल करने की पैरवी की। नतीजतन पर्यावरण मंत्रालय ने बिहार में बीटी मक्का के परीक्षण पर रोक लगा दी। लेकिन यहां यह आशंका जरूर उठती है कि ये परीक्षण उन प्रदेशों में जारी होंगे, जहां कांग्रेस और संप्रग के सहयोगी दलों की सरकारें हैं। गुपचुप जारी इन प्रयोगों से पता चलता है कि अमेरिका परस्त मनमोहन सरकार विदेशी कंपनियों के आगे इतनी दयनीय है कि उसे जनता से किए वादे से मुकरना पड़ रहा है। भारत के कृषि और डेयरी उद्योग पर नियंत्रण करना अमेरिका की पहली प्राथमिकताओं में है। इन बीजों की नाकामी साबित हो जाने के बावजूद इनके प्रयोगों का मकसद है मोंसेंटो, माहिको वालमार्ट और सिंजेटा जैसी कंपनियों के कृषि बीज और कीटनाशकों के व्यापार को भारत में जबरन स्थापित करना। बिहार में मक्का-बीजों की पृष्ठभूमि में मोंसेंटों ही थी। इसके पहले धारवाड़ में बीटी बैंगन के बीजों के प्रयोग के साथ इसकी व्यावसायिक खेती को प्रोत्साहित करने में माहिको का हाथ था। यहां तो ये प्रयोग कुछ भारतीय वैज्ञानिकों को लालच देकर कृषि विश्वविद्यालय, धारवाड़ और तमिलनाडु कृषि विश्वविद्यालय कोयंबटूर में चल रहे थे। जीएम बैगन पहली ऐसी सब्जी थी जो भारत में ही नहीं दुनिया में पहली मर्तबा प्रयोग में लाई जाती। इसके बाद एक-एक कर कुल 56 फसलें वर्ण संकर बीजों से उगाई जानी थीं। लेकिन बीटी बैंगन खेती के देश में जबरदस्त विरोध के कारण पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने इसके प्रयोग व खेती पर प्रतिबंध लगा दिया था। दरअसल आनुवंशिक बीजों से खेती को बढ़ावा देने के लिए देश के शासन-प्रशासन को मजबूर होना पड़ रहा है। 2008 में जब परमाणु- करार का हो हल्ला संसद और संसद से बाहर चल रहा था तब अमेरिकी परस्त प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, कृषि मंत्री शरद पवार और पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश की तिगड़ी ने अमेरिका से एक ऐसा समझौता गुपचुप कर लिया था, जिस पर कतई चर्चा नहीं हुई थी। इसी समझौते के मद्देनजर बीटी बैंगन को बाजार का हिस्सा बनाने के लिए शरद पवार और जयराम रमेश ने आनुवंशिक बीजों को सही ठहराने के लिए देश के कई नगरों में जन-सुनवाई के नजरिये से मुहिम भी चलाई थी। लेकिन जनता और स्वयंसेवी संगठनों की जबरदस्त मुहिम के चलते राजनेताओं को इस जिद से तत्काल पीछे हटना पड़ा था। बीटी बैंगन मसलन संकर बीज ऐसा बीज है, जिसे साधारण बीज में एक खास जीवाणु के जीन को आनुवंशिक अभियांत्रिकी तकनीक से प्रवेश कराकर बीटी बीज तैयार किए जाते हैं। भारतीय वैज्ञानिकों का दावा है कि ये बीज स्थानीय और पारपंरिक फसलों के लिए भी खतरनाक हैं। राष्ट्रीय पोषण संस्थान, हैदराबाद के प्रसिद्ध जीव विज्ञानी रमेश भट्ट ने बीटी बैंगन के हल्ले के समय चेतावनी दी थी कि बीटी बैंगन की खेती शुरू होती है तो इसके प्रभाव से बैंगन की स्थानीय किस्म मट्टूगुल्ला प्रभावित होकर लगभग समाप्त हो जाएगी। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)
Friday, April 1, 2011
खाद्य सुरक्षा की कुंजी
लेखक उत्तर प्रदेश सरकार के दो हजार मंडियों की स्थापना के फैसले में किसानों की खुशहाली देख रहे हैं …..
वाल-मार्ट और टेस्को जैसी विशाल सुपरमार्केट रिटेल चेन के भारत में काम शुरू करने पर छिड़ी बहस के बीच उत्तर प्रदेश सरकार ने मंडियों के मौजूदा तंत्र के विस्तार की रूपरेखा तैयार कर ली है। उत्तर प्रदेश में अगले चार साल में 2105 मंडियों का गठन हो जाएगा। अकेला यह कदम ही आपूर्ति की बाधाओं को दूर कर देगा जिससे किसानों को एक सुनिश्चित बाजार मिल जाएगा। मंडियों के व्यापक तंत्र और वह भी किसानों की पहुंच के भीतर होने के कारण ही आज पंजाब देश का खाद्य कटोरा बन गया है। प्रसिद्ध कृषि प्रशासक डॉ. एमएस रंधावा का एक प्रसंग मुझे याद आ रहा है। पंजाब में हरित क्रांति के बीज पड़ने के तुरंत बाद तत्कालीन मुख्यमंत्री लक्ष्मण सिंह गिल ने रंधावा से पूछा कि वह ऐसा क्या काम करें कि उनका नाम इतिहास में अमर हो जाए। रंधावा ने उन्हें सलाह दी कि मंडियों तक पक्के संपर्क मार्गो का निर्माण करा दें, ताकि किसान आसानी से वहां तक पहुंच सकें। लक्ष्मण सिंह ने खरीद केंद्रों से मंडियों तक सड़कों का जाल बिछा दिया। शेष इतिहास है। मैं यह देखकर बहुत खुश हूं कि मायावती सरकार कृषि में इसी प्रकार का विपणन निवेश कर रही हैं। मंडियों का प्रस्तावित ढांचा किसानों को मजबूरी में सस्ती दरों पर व्यापारियों को फसल बेचने से बचाएगा। मंडियों के ढांचे के अभाव में फसल का कोई ऐसा सीजन नहीं होता जब किसानों का बिचौलियों के माध्यम से शोषण न होता हो। यह देखना असामान्य नहीं है कि अपनी फसल को बेचने के लिए किसान पड़ोसी राज्यों तक पहुंचते हैं। उदाहरण के लिए, हर साल पश्चिमी उत्तर प्रदेश के बहुत से किसान गेहूं बेचने के लिए पड़ोसी हरियाणा का रुख करते हैं। उत्तर प्रदेश देश का सबसे अधिक आबादी वाला राज्य है और यही खाद्यान्न का सबसे बड़ा उत्पादक भी है। किंतु पश्चिम के कुछ क्षेत्रों को छोड़कर यहां कृषि विपणन की सुविधाएं बेहद कम हैं। इसीलिए यहां कृषि एक अभिशाप बन गई है। सुनिश्चित बाजार के अभाव में उत्पादन में सुधार के सही निवेश के लिए किसानों को कोई बढ़ावा नहीं मिलता है। न ही वे फसल का उचित दाम हासिल करते हैं। पंजाब और हरियाणा के विपरीत, जहां सरकारी खरीद केंद्र और मंडियों का मजबूत जाल है, उत्तर प्रदेश इस क्षेत्र में काफी पिछड़ा हुआ है। उत्तर प्रदेश में केवल 300 सरकारी खरीद केंद्र हैं। प्रस्ताव के अनुसार प्रदेश में हर साल पांच सौ मंडियों की स्थापना होगी। मंडियों के इस विशाल ढांचे से किसानों की निकटतम मंडी तक पहुंचने की औसत दूरी भी घटकर सात किलोमीटर रह जाएगी। इन मंडियों का संचालन निजी क्षेत्र के हाथों में सौंपने की बजाय, जैसा कि योजना आयोग सलाह दे रहा है, मुख्यमंत्री मायावती ने इनका नियंत्रण राज्य कृषि उत्पादन विपणन बोर्ड को सौंपकर बिल्कुल सही कदम उठाया है। इससे इनकार नहीं किया जा सकता कि पिछले कुछ सालों के दौरान कमीशन एजेंटों ने पूरी तरह से मंडियों पर नियंत्रण कर लिया है। यह समस्या इसलिए पैदा हुई क्योंकि राजनीतिक दलों ने मंडियों का नियंत्रण आढ़तियों के हाथों में सौंप दिया। पेशेवरों द्वारा संचालित होने के बजाए देश की अधिकांश मंडियों में प्रबंधन कमीशन एजेंटों के हाथ में है। किंतु इसका इलाज मंडियों को खत्म कर देने या इनका नियंत्रण निजी कंपनियों के हाथों में सौंपना नहीं है। राजनीतिक दखल से परे एक बेहतर नियामक मंडियों को पुनर्जीवित तथा अधिक प्रभावी कर सकता है। न ही इसका जवाब बड़े खाद्यान्न सुपरमार्केट को भारत में दुकाने खोलने की अनुमति प्रदान करने में है। वाणिज्य मंत्रालय और योजना आयोग वाल-मार्ट और टेस्को जैसी रिटेल चेन को भारत में प्रवेश दिलाने की जबरदस्त पैरवी कर रहे हैं। इनकी दलील है कि इससे किसानों को बेहतर कीमत और ग्राहकों को सस्ती दरों पर खाद्यान्न मिल सकेगा। बड़ी रिटेल चेन से यह भी अपेक्षा जताई जा रही है कि वे मध्यस्थों का खात्मा कर देंगी, जिसका लाभ किसानों को होगा। मुझे लगता है कि कृषि क्षेत्र में सुधारों के नाम पर अब निजी खिलाडि़यों को प्रवेश देने का अधिक दबाव पड़ेगा। अंतरराष्ट्रीय खाद्य नीति अनुसंधान संस्थान (आइएफपीआरआइ) का कहना है, भारत में किसानों को मंडियों में लूटा जा रहा है, और उपभोक्ता बाजार से भारी दामों में खाद्यान्न खरीद रहे हैं। यह दलील बेतुकी है। अनुभव बताता है कि बड़ी खाद्य रिटेल चेन से न तो किसानों का भला हुआ है और न ही उपभोक्ताओं का। न ही इस चेन से रोजगार के अवसर बढ़े हैं। बड़े सुपरमार्केटों का यह दावा कि वे बड़ी संख्या में नौकरियां देकर आर्थिक संवृद्धि को गति देंगे, थोथा साबित हुआ है। इंग्लैंड में, टेस्को और सेंसबरी जैसी दिग्गज रिटेल चेन हजारों नौकरियां पैदा करने के अपने दावों पर खरी नहीं उतरीं। पिछले दो सालों के दौरान, टेस्को ने एक हजार और सेंसबरी ने 13 हजार नौकरियां देने का वायदा किया था, जबकि हकीकत में टेस्को ने कुल 726 लोगों को रोजगार दिया है, जबकि सेंसबरी ने 1600 लोगों को नौकरी से निकाल दिया है। मैं हमेशा से कहता आ रहा हूं कि अगर सुपरमार्केट वास्तव में किसानों के इतने ही हितसाधक हैं तो अमेरिका किसानों को विशाल अनुदान क्यों दे रहा है। आखिरकार, विश्व की सबसे बड़ी रिटेल चेन वाल-मार्ट का जन्म अमेरिका में ही हुआ है और इसे अमेरिका के किसानों को आर्थिक रूप से इतना समर्थ बना देना चाहिए था कि उन्हें सब्सिडी की जरूरत ही न पड़ती। किंतु ऐसा नहीं हुआ। अमेरिका के किसान सरकारी सब्सिडी की बैसाखी पर खड़े हैं। 1995 से 2009 के बीच 12.50 लाख करोड़ रुपये की सब्सिडी अमेरिकी किसानों को दी गई है। इसमें प्रत्यक्ष आय सहयोग भी शामिल है। जरूरत भारत में मंडियों का राष्ट्रव्यापी ढांचा खड़ा करने की है। यह जानना जरूरी है कि अगर पंजाब में मंडियों का विकसित तंत्र खड़ा न होता, तो यह देश का खाद्यान्न कटोरा न होता। मंडियों में सुनिश्चित सरकारी खरीद के बल पर ही किसानों को अपनी पैदावार का अधिक दाम मिलता है। पंजाब में भारी संख्या में मंडियों की मौजूदगी के कारण ही वहां फसल के समय कम दामों में उपज बेचने की घटनाएं देखने में नहीं आतीं। उत्तर प्रदेश में ऐसा कोई साल नहीं है जब फसल के समय निजी व्यापारी किसानों से कम दाम में उपज खरीद कर उन्हें लूट न लेते हों। उत्तर प्रदेश में मंडियों की कम संख्या के कारण यहां के किसानों को भारी नुकसान उठाना पड़ा है। नेशनल सैंपल सर्वे ऑर्गेनाइजेशन के अनुसार, एक औसत किसान परिवार की मासिक आय उत्तर प्रदेश में सबसे कम है। (लेखक कृषि मामलों के विशेषज्ञ हैं )
Saturday, February 19, 2011
कृषि की अनदेखी
कृषि और किसानों की दुर्दशा की ओर ध्यान खींच रहे हैं लेखक
सरकार की ओर से जारी विकास दर के आकलन के अग्रिम आंकड़ों के मुताबिक 2010-11 में कृषि उत्पादन में वृद्धि दर 5.4 फीसदी रहने की संभावना है जो पिछले साल महज 0.4 फीसदी थी। कृषि क्षेत्र के शानदार प्रदर्शन के चलते ही सकल घरेलू उत्पाद में 8.6 फीसदी बढ़ोतरी की उम्मीद है। इस प्रकार कृषि क्षेत्र के ताजा आंकड़ों ने बजट से पहले ही सरकार को मुस्कराने का मौका दे दिया है। लेकिन यहां सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या किसानों के चेहरों पर मुस्कान नजर आ रही है? कैसी विडंबना है कि एक ओर कृषि क्षेत्र में उत्साहजनक वृद्धि का अनुमान है, वहीं दूसरी ओर अनेक राज्यों से किसानों की खुदकुशी की खबरें आ रही हैं। देखा जाए तो देश में ऊंची विकास दर के साल किसानों की आत्महत्या के साल भी रहे हैं। विकास दर के संदर्भ में एक सवाल यह भी उठता है कि इससे हम रोजगार सृजन की कितनी उम्मीद कर सकते हैं। सरकार और योजना आयोग तक इस बात पर जोर देते रहे हैं कि ऊंची विकास दर सभी आर्थिक समस्याओं का रामबाण इलाज है, गरीबी और बेरोजगारी भी इसी से मिटेगी। लेकिन यह आश्वासन खोखला साबित हुआ है। ऑस्ट्रेलिया व कनाडा में बारिश, रूस व कालासागर इलाके में सूखे के अलावा अर्जेंटीना, अमेरिका में मौसम शुष्क होने के चलते विश्वस्तर पर खाद्यान्न की स्थिति नाजुक बनी हुई है। लेकिन भारत में अनाज के गोदाम ठसाठस भरे हैं। इसमें किसानों के पसीने की भूमिका को भुलाया नहीं जा सकता। इसके बावजूद सरकार न तो यह सुनिश्चित कर पा रही है कि किसानों को उनकी उपज की लाभकारी मूल्य मिले और न ही यह कि आम जनता को उचित दर पर खाने-पीने का सामान मिले। इसलिए यह सवाल उठता है कि इस बढ़ी हुई उपज दर के लाभ को बीच में कौन हड़प ले रहा है? पैदावार बढ़ने पर सरकार निर्यात करके पैसा बनाने की सोचती है और फिर कमी होने पर उसी जिंस का आयात करने लगती है जैसा चीनी के मामले में हुआ और दो साल पहले गेहूं के मामले में। अर्थव्यवस्था को मुसीबत में सहारा देने वाले कृषि क्षेत्र में निवेश लगातार घट रहा है। कृषि उत्पादकता बढ़ाने की योजनाएं सब्सिडी, ऋण माफी, मुफ्त बिजली जैसी रेवडि़यां बांटने तक सिमटी हुई हैं। ग्रामीण इलाकों में आय का प्रमुख श्चोत होने के बावजूद कृषि क्षेत्र में ढांचागत सुधारों को लेकर कुछ नहीं हो रहा है। बिजली की सुचारू आपूर्ति नहीं है। भूजल दोहन को छोड़कर सिंचाई सुविधा विकसित करने पर सरकारों का जोर नहीं है। उर्वरक नीति पर भी लचर रवैया अपनाया जा रहा है। सहकारिता का ढांचा दरक रहा है। सरकार ने भले ही कृषि ऋणों की मात्रा बढ़ा दी हो, लेकिन लाभार्थियों का दायरा बढ़ा दिए जाने से छोटे व सीमांत किसान उससे लाभान्वित नहीं हुए। देश के कृषि अनुसंधान संस्थानों में शोध व विकास की स्थिति अच्छी नहीं है। भारी अनुदानों और सरकारी सहायता के बावजूद हम उन्नत बीजों के लिए बहुराष्ट्रीय कंपनियों पर निर्भर होते जा रहे हैं। यही कारण है कि खेती आज भी मानसून का जुआ बनी हुई है और जीडीपी में उसकी हिस्सेदारी लगातार घट रही है। भले ही देश में औद्योगिक रफ्तार तेज हो लेकिन खेती अभी भी सबसे ज्यादा रोजगार देने वाला क्षेत्र है। देश में कुल रोजगार का करीब आधा हिस्से की पूर्ति कृषि ही कर रही है। लेकिन ऊंची विकास दर का हवाला देते हुए अर्थव्यवस्था की गुलाबी तस्वीर पेश करते समय कृषि व सहायक क्षेत्रों की दयनीय हालत नजरअंदाज कर दी जाती है। बात सिर्फ कृषि क्षेत्र और किसानों की नहीं है बल्कि छोटे शहरों, कस्बों और गांवों को जोड़कर बनने वाली बहुसंख्यक आबादी की भी है। जो लोग आर्थिक विकास की मुख्यधारा में पीछे छूट गए है, उनको केंद्र में रखकर योजना बनाने की जरूरत है। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)
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