प्याज की कीमत में आई तेजी के बावजूद किसानों के चेहरे पर खुशी नहीं देखी जा रही है क्योंकि सारा मुनाफा बिचौलिये कमा रहे हैं। आजादपुर मंडी पहुंचे किसानों का कहना है कि कीमत में आई तेजी का लाभ उन्हें नहीं मिल रहा है। किसानों को मंडी में प्याज 15 से 20 रुपये प्रति किलो के भाव से बेचनी पड़ रही है। कारोबारी थोक भाव में प्याज अधिकतम 35 रुपये किलो तक बेच कर 55 फीसदी तक मुनाफा कमा रहे हैं। ऐसे में प्याज की खेती में जो लागत आई है, वह भी निकल जाए तो उनके लिए काफी होगा। शनिवार को प्याज लेकर मंडी पहुंचे अलवर, राजस्थान के माचा गांव के किसान अख्तर इमाम ने बताया कि वह लगभग 1020 किलो प्याज लेकर आए हैं। इसे उन्होंने प्रति चालीस किलो 575 रुपये से 600 रुपये तक में बेचा। प्याज की एक बीघे की खेती में खाद, बीज, सिंचाई की लागत करीब तीस हजार रुपये तक लग रही है। फसलों में कीट लग जाने के कारण प्याज का आकार में वृद्धि नहीं होने से प्रति बीघा उत्पादन में तीस से चालीस फीसदी तक की कमी आई है। इससे नुकसान उठाना पड़ रहा है। मंडी में करीब 3600 किलो प्याज लेकर आए अलवर के किसान नसीरुद्दीन कहते हैं कि प्याज की कीमत में भले ही तेजी आई है, लेकिन इस साल प्याज की खेती उनके लिए घाटे का सौदा साबित हुआ। वह कहते हैं कि इस तेजी में भी उन्हें प्याज 20 रुपये प्रति किलो तक बेचनी पड़ रही है। सारा मुनाफा बिचौलिया खा रहे हैं। किसानों को इस तेजी का कोई लाभ नहीं मिल रहा है। राजस्थान के किसान सिरूद्दीन व सादाल की भी यही पीड़ा है। वे कहते हैं कि किसानों को प्याज जब तीन से चार रूपये प्रति किलो के दर से बेचना पड़ रहा था, तब किसी ने भी हाय तौबा नहीं मचाई। अब तक न तो सरकार को ही किसानों का ध्यान आया और न ही मीडिया ने ही इस ओर ध्यान दिया। किसान कर्ज में डूबे हैं।
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Sunday, December 26, 2010
हरियाणा ने खोजीं तीन फसलों की चार नयी किस्म
बीस करोड़ का बैंगन, चौंकिए मत, यह सच्चाई है। बैंगन की नई किस्म को हासिल करने के लिए हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय को बीस करोड़ रुपये की भारी भरकम राशि खर्च करनी पड़ी है। यहीं नहीं अगर शोध में जुटे वैज्ञानिक व इसके लिए तैनात अधिकारियों के वेतन व उन्हें मिलने वाली सुविधाओं का खर्चा भी इसमें जोड़ दिया जाए तो यह आंकड़ा 30 करोड़ से अधिक पर आता है। हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय ने इस वर्ष कृषि क्षेत्र में किए गए गहन शोध के बाद तीन फसलों की चार नई किस्में इजाद की हैं। इसमें गेहूं की दो किस्में एक ब्रेड के लिए दूसरी चपाती के लिए, लहसुन की 17-व्हाइट बर्ल व लांग ब्रिंजल की एचएलबी-25 यानी बैंगन शामिल हैं। शोध के लिए विवि को मिलने वाले कुल बजट का लगभग 38 प्रतिशत बजट खर्च किया जाता है जो लगभग 80 करोड़ रुपये बैठता है। चालू वित्त वर्ष विवि को करीब दो सौ करोड़ रुपये का बजट प्राप्त हुआ है। इसमें अखिल भारतीय कृषि परिषद, राष्ट्रीय किसान विज्ञान योजना व प्रदेश सरकार की ओर से आई राशि शामिल है। वहीं अगर शोध निदेशालय के चार और नई किस्में जल्द ही विकसित करने के दावे को मान भी लिया जाए तो बैंगन के शोध पर खर्च हुई राशि कम होती दिखाई नहीं दे रही है। 200 वैज्ञानिक 12 अधिकारी : विवि ने शोध कार्यो के लिए शोध निदेशालय की स्थापना की है, जिसमें निदेशक के साथ-साथ करीब 11 अन्य अधिकारियों को तैनात किया हुआ है। कृषि महाविद्यालय में लगभग 200 कृषि वैज्ञानिक शोध के लिए जी तोड़ मेहनत करने का दावा करते रहते हैं। इन वैज्ञानिकों व अधिकारियों के मातहत काम करने वाले गैर शिक्षक कर्मचारियों की भी लंबी-चौड़ी फौज है।
अधिक खर्च के बाद भी कम हुआ फसलों का उत्पादन
लखनऊ, भूमि संरक्षण के जरिए उत्पादन बढ़ाने के लिए उस पर खर्च किए गए 16 अरब रुपये भी फसलों के लिए खाद का काम नहीं कर सके। उत्तर प्रदेश में वर्षो तक कृषि विभाग के बजट का आधा हिस्सा भूमि संरक्षण पर खर्च होता रहा बावजूद इसके तमाम फसलों का उत्पादन घट गया है। पिछले पांच साल में गेहूं के उत्पादन में वृद्धि के कारण प्रदेश रोटी में तो आगे हो गया लेकिन चावल खदबदाता रहा और दाल तो और भी पतली होती रही। 2005-06 में कृषि विभाग की योजनाओं के कुल खर्च 260.28 करोड़ में 114.78 करोड़ रुपया यानी कुल बजट की करीब 44 फीसदी राशि भूमि संरक्षण पर खर्च की गई। 2006-07 में विभाग के कुल खर्च 346.49 करोड़ में 184.17 करोड़ यानी 53 फीसदी राशि, 2007-08 में योजनाओं पर खर्च होने वाले 752.22 करोड़ में 418.75 करोड़ यानी 55 फीसदी राशि, 2008-09 में बजट का 43 फीसदी हिस्सा तथा 2009-10 में बजट का 40 फीसदी हिस्सा भूमि संरक्षण पर खर्च किया गया। केंद्र की दो बड़ी योजनाओं, राष्ट्रीय कृषि विकास योजना और राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन में खाद्यान्न उत्पादन बढ़ाने को पिछले 3 वर्र्षो में केंद्र सरकार ने 12 अरब रुपये दिए हैं। शासन में उपलब्ध 2005-06 और वर्ष 2009-10 में अनाज उत्पादन के आंकड़े भी गेहूं के उत्पादन में वृद्धि और चावल व दालों के उत्पादन में कमी को दर्शाते हैं। 2005-06 में प्रदेश में गेहूं का उत्पादन 240.90 लाख मीट्रिक टन था जो 2009-10 में बढ़कर 275.18 लाख मीट्रिक टन हो गया। 2005-06 में धान उत्पादन से 117.07 लाख मीट्रिक टन चावल बना लेकिन 2009-10 में उत्पादन घटने से 10 लाख मीट्रिक टन चावल कम हो गया। मक्का का उत्पादन 10.58 लाख मीट्रिक टन से 9.82 लाख मीट्रिक टन, चना का उत्पादन 5.94 लाख मीट्रिक टन से 5.09 लाख मीट्रिक टन, मटर का उत्पादन 5.40 लाख मीट्रिक टन से 4 लाख मीट्रिक टन रह गया। 2005-06 में प्रदेश में 3.87 लाख मीट्रिक टन अरहर का उत्पादन था लेकिन 2009-10 में यह घटकर 2.02 लाख मीट्रिक टन ही रह गया है।
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