पिछले दिनों राजस्थान की राजधानी जयपुर में वाजिब दाम नहीं मिलने के कारण दुग्ध उत्पादकों ने सड़क पर दूध बहाया और तीन दिन तक हड़ताल पर बैठे रहे। जयपुर में दूध की किल्लत बढ़ने और मामला गरमाता देख प्रदेश की सतारूढ़ कांग्रेस सरकार ने दुग्ध उत्पादकों की मांग का फौरी समाधान किया है। दुग्ध उत्पादक कालाडेरा में पशु आहार संयंत्र शुरू करने और दूध संकलन 500 रुपये प्रति किलोग्राम फैट की दर से किए जाने की मांग कर रहे थे। बेशक अस्थायी तौर पर जयपुर के दुग्ध उत्पादकों की हड़ताल समाप्त हो गई है, लेकिन समूचे देश का डेयरी उद्योग इस संकट से दो-चार हो रहा है। अमूल और मदर डेयरी जैसे संगठित क्षेत्र के दुग्ध उत्पादक अप्रैल की शुरुआत में दूध की कीमतें एक रुपये प्रति लीटर बढ़ा चुके हैं। वहीं असंगठित क्षेत्र के उत्पादक भी दूध की कीमतों में छह रुपये प्रति लीटर का इजाफा कर चुके हैं। मांग और लागत में बढ़ोतरी और कम उत्पादन के चलते आगे भी दूध की कीमतों में उफान आने वाला है। भारत में श्वेत क्रांति लाने वाले डॉ. वर्गीज कुरियन ने कुछ समय पहले कहा था कि ऑपरेशन फ्लड के बाद लोगों को पानी के मोल दूध उपलब्ध था। यह बात काफी हद तक सही है, क्योंकि 1908 के दशक में दिल्ली और मुंबई जैसे महानगरों में बोतलबंद पानी और दूध की कीमतें एक ही स्तर पर थीं। मगर भटकी हुई सरकारी नीतियों की वजह से श्वेत क्रांति का आधार ही बिखर गया है। नतीजन अब दूध की बढ़ती मांग के सामने डेयरी सेक्टर की सांस उखड़ती जा रही हैं। 1950 से 1960 के बीच डेयरी उद्योग की सालाना विकास दर 1.2 फीसदी थी और 2009-10 में डेयरी उद्योग की विकास दर चार फीसदी रही है। दूसरी ओर शहरी लोगों के खाने के खर्च में दूध की हिस्सेदारी 1971-72 में 14.47 फीसदी और ग्रामीण लोगों के खाने में दूध की हिस्सेदारी 10.01 फीसदी थी। अब ग्रामीण और शहरी लोगों के खाने में दूध की हिस्सेदारी बढकर क्रमश: 14.88 और 18.31 फीसदी हो गई है। जाहिर है कि लोगों की आमदनी बढ़ने के साथ दूध की मांग में तो इजाफा हुआ है, लेकिन इसी अनुपात में दूध का उत्पादन नहीं बढ़ा है। देश की बढ़ती दूध की मांग पूरी करने के लिए 1970 में ऑपरेशन फ्लड की शुरुआत की गई थी। व्यावसायिक रूप से सफल गुजरात के आनंद मिल्क यूनियन लिमिटेड यानी अमूल की तर्ज पर देश भर में डेयरी संघ बनाए गए और केंद्रीय स्तर पर राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड का गठन किया गया। देश के 700 शहरों और कस्बों को जोड़कर राष्ट्रीय दूध जाल बनाया गया और इसके सकारात्मक परिणाम भी देखने को मिले। 1951 में प्रति व्यक्ति 132 ग्राम दूध उपलब्ध था। वहीं, 1991 में प्रति व्यक्ति दूध की उपलब्धता बढ़कर 220 ग्राम हो गई। असल में श्वेत क्रांति के समय दूध के उत्पादन में कोई खास बढ़ोतरी नहीं हुई, बल्कि उस समय दूध के संग्रहण, शीतलीकरण और विपणन तंत्र में सुधार किया गया था। सीधे शब्दों में कहें तो ऑपरेशन फ्लड के तहत ग्रामीण इलाकों के दूध को शहरी बाजार तक पहंुचाने का तंत्र खड़ा किया गया था। समय बीतने के साथ डेयरी संघों पर छुटभैये नेताओं का कब्जा होता गया और अब दूध विपणन का यह तंत्र दरक गया है। दूध उत्पादन में बढ़ोतरी नहीं होने का एक कारण इस क्षेत्र में शोध और तकनीक का अभाव भी है। विश्व के कुल मवेशियों में से 12 फीसदी भारत में हैं और वैश्विक उत्पादन का 16 फीसदी दूध उत्पादित किया जाता है। अमेरिका में मवेशियों की संख्या विश्व की मात्र 4-5 फीसदी है, जबकि वहां विश्व के 11 फीसदी दूध का उत्पादन होता है। हमारे देश में प्रति दुधारू पशु 1,000 लीटर सालाना दूध का उत्पादन होता है, जबकि वैश्विक औसत 8,000 से 10,000 लीटर सालाना का है। किसानों में पशुपालन की वैज्ञानिक जानकारी का अभाव है और संक्रामक रोगों के कारण हर साल बड़े पैमाने पर दुधारू पशुओं की मौत हो जाती है। श्वेत क्रांति के शोरगुल में गाय-भैंसों की देसी नस्लों की जमकर उपेक्षा की गई और विदेशी नस्ल के पशुओं को बढ़ावा दिया गया। विदेशी नस्ल के पशुओं का रख-रखाव महंगा है और कृत्रिम गर्भाधान के आधे-अधूरे ज्ञान से पैदा की गई संकर नस्लों ने किसानों की कब्र खोदने का काम किया है। यह अजीब संकर नस्ल के पशु न तो दूध देते हैं और खेती के काम भी नहीं आते हैं। सदियों से सम्मान पाती आई देसी गाय घरों से बेदखल होकर सड़कों पर घूम रही हैं। दोषपूर्ण सरकारी नीतियों के कारण देश में बूचड़खानों की संख्या तो बढ़ती जा रही है, लेकिन इससे पशुओं की संख्या में तेजी से गिरावट आई है। मांस और चमड़े के लालच में पशु-वध की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है और 120 करोड़ लोगों के इस देश महज 16 करोड़ पशु बचे हैं। मोटे अनुमान के अनुसार, गौधन की रक्षा के लिए 25,000 गौशालाओं की जरूरत है, लेकिन फिलहाल यह संख्या 6,000 ही है। दुधारू पशुओं के वध पर रोक के बावजूद इंदौर और बुंदेलखंड गाय समेत दूसरे पशुओं के कटान के अड्डों में तब्दील हो गए हैं। सबसे बड़ी बात यह है कि देशभर में केवल 40 फीसदी पशुओं के लिए ही पौष्टिक चारा उपलब्ध है, लेकिन सरकार खली के निर्यात में लगी हुई है। चारागाह सिकुड़ते जा रहे हैं और मवेशियों को पौष्टिक चारा मुहैया करवाए बगैर दूध उत्पादन में बढ़ोतरी का दावा खोखला ही कहा जाएगा। हमारे देश में 70 फीसदी दूध का उत्पादन छोटे, सीमांत और भूमिहीन किसान करते हैं और किसानों की आय का यह बेहतरीन जरिया है। राष्ट्रीय अपराध ब्यूरो के आंकड़े इस बात के गवाह हैं कि डेयरी सेक्टर के फैलाव वाले इलाकों में किसान आत्महत्या नहीं कर रहे हैं। गुजरात में अमूल की वलसाड यूनियन अपना 80 फीसदी दूध जनजातीय इलाकों से इकट्ठा करती है। डेयरी की मार्फत किसानों के विकास की यह कहानी मध्य प्रदेश, छतीसगढ़ और दूसरे नक्सल प्रभावित इलाकों में भी दोहराई जा सकती है। गुजरात का डेयरी सेक्टर सफल है, क्योंकि अमूल के नफे-नुकसान में किसानों की सीधी भागीदारी है। पिछले दिनों सरकार ने दूध की ऊंची कीमतों से राहत देने के नाम पर डेयरी उत्पादों के आयात शुल्क में कमी की थी। सवाल है कि भारतीय खली का निर्यात करके विदेशी मिल्क पाउडर मंगाने की बजाए सरकार किसानों को प्रोत्साहन क्यों नहीं देती है। संसद में पेश आर्थिक समीक्षा में सरकार ने स्वीकार किया है कि 2021-22 तक दूध की मांग 18 करोड़ टन हो जाएगी। दूध का मौजूदा उत्पादन 11.2 करोड़ टन है और मांग को पूरा करने के लिए सालाना 5.5 फीसदी की रफ्तार से दुग्ध उत्पादन में बढ़ोतरी करनी होगी। कोई दोराय नहीं है कि चॉकलेट और मिठाई की बढ़ती मांग के चलते दूध की कीमतें और ऊपर जाएंगी। अगर नीति-निर्धारक देश में दूसरी श्वेत क्रांति लाना चाहते हैं तो डेयरी संघों पर नेताओं का कब्जा हटाकर किसानों के हित में बुनियादी कदम उठाने होंगे। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं).
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Thursday, May 5, 2011
Thursday, April 28, 2011
महिला किसानों ने दिखाई राह
संकट के दौर में महिला किसानों के कई प्रेरणादायक उदाहरण सामने आ रहे हैं, जिनमें इस संकट से बाहर निकलने की उम्मीद भी नजर आती है। कई स्थानों पर यह देखा गया है कि यदि प्रोत्साहन और सहायता मिले तो सस्ती, टिकाऊ व पर्यावरण की रक्षा के अनुकूल खेती में महिला किसान विशेष तौर पर आगे आ सकती हैं। जालौन जिले की कोंच तहसील में समर्पण संस्था और लघु सीमांत किसान मोर्चे ने ऐसी ही तकनीक फैलाने का प्रयास किया है। डांग खजूरी गांव में एक-एक बूंद पानी को बचाने और उसका उपयोग खेतों को हरा-भरा करने का सराहनीय प्रयास देखा जा सकता है। यहां के कुंओं के पानी को बचाने का प्रयास गांववासियों ने अपने सीमित साधनों से किया है। यहां के छोटे स्तर के किसान जैविक खेती के लिए कंपोस्ट और वर्मीकंपोस्ट बनाने में आगे हैं। इसमें महिला किसानों की अग्रणी भूमिका है। वे अपने छोटे-छोटे खेतों और बगीचों में लगभग 35 तरह की फसलें उगा रही हैं। जैव विविधता और पर्यावरण रक्षा पर आधारित इस खेती को सरकार से बेहतर सहायता मिलनी चाहिए। गांववासियों ने बताया कि सरकार तीन लाख रुपये भी खर्च करे तो लगभग 24 पातालतोड़ कुंओं का बेहतर उपयोग हो सकता है। जुगराजपुर गांव की रंजना शर्मा जैविक खेती के प्रयोगों के लिए चर्चित रही हैं, उन्होंने बताया कि रेडियो, पुस्तकों व प्रशिक्षण शिविर से उन्होंने जैविक खेती की जानकारी प्राप्त कर पिता को प्रेरित किया कि 25 बीघा खेत में कम से कम पांच बीघा जमीन पर बिना रासायनिक खाद व कीटनाशक दवा के खेती करें। यह प्रयोग सफल रहा तो धीरे-धीरे रंजना ने अपने परिवार की पूरी जमीन पर जैविक खेती को सफल कर दिखाया।। समर्पण के निदेशक राधेकृष्ण ने कहा कि पहले हमें भी डर था कि जैविक खेती से बाद में कितने ही लाभ हों पर रासायनिक खाद छोड़ने से आरंभ में उत्पादन कम हो सकता है। पर महिला किसानों ने अपनी मेहनत व निष्ठा से उत्पादन भी बढ़ाया और पर्यावरण की भी रक्षा की। जैविक फसलों के लिए व्यापारी बेहतर कीमत दे रहे हैं। गोरखपुर जिले में भी गोरखपुर एनवायर्नमेंट एक्शन ग्रुप जीईएजी के प्रयासों से कई महिलाओं ने टिकाऊ व पर्यावरण के अनुकूल खेती को अपनाया है। गोरखपुर की ही प्रभावती दुधई जानी-मानी महिला किसान हैं। वह अपने दस सदस्यों के परिवार के साथ अपने खेतों के बीच बने आवास में रहती हैं। गांव में उनका एक पक्का घर भी है जहां उनके बेटे और बहू प्राय: रहते हैं पर प्रभावती को अपने डेढ़ एकड़ के खेत के पास रहना ही अच्छा लगता है। 55 वर्षीय प्रभावती ने लगभग 12 वर्ष पहले गोरखपुर एनवायर्नमेंट एक्शन गु्रप के संपर्क में आने के बाद जैविक खेती की राह अपनाई। उनकी खेती की एक विशेषता यह है कि वह मिश्रित खेती का बहुत अच्छा उपयोग करती हैं और विविध किस्म की फसलों की खेती करती हैं। प्रभावती के खेत में चावल, गेहूं, मक्का व महुवा आदि के अतिरिक्त विविध किस्म की सब्जियां उगाई जाती हैं जैसे तोरई, लौकी, लोबिया, सेम, बैंगन, अरबी, आलू, प्याज, टमाटर, शकरकंद, करेला, चौलाई, मूली, मिर्च, खीरा, भिंडी, फूलगोभी, गांठगोभी, गाजर, मटर, अदरक, लहसुन आदि। तिलहन में वे सरसों उगाती हैं। अधिया पर एक बीघा अतिरिक्त जमीन लेकर वह मूंगफली की खेती भी करती हैं। दलहन में वे मूंग, उड़द उगाती हैं। मसालों में वह हल्दी, लौंग, धनिया, सौंफ उगाती हैं। प्रभावती के खेत व बगीचे में अनेक फलदार पेड़ हैं जैसे अमरूद, आम, केला, कटहल, बेल, पपीता, शहतूत, शहजन, नींबू, चकोतरा, महुआ, अनार आदि। इसके अतिरिक्त बांस भी उगाया जाता है, इनमें नीम व सागौन के भी पेड़ हैं। हानिकारक कीड़ों को दूर भगाने के लिए नीम, धतूरा, मदार, कनैल, गेंदे आदि के जिन पौधों की जरूरत होती है उन्हें भी प्रभावती ने अपने खेत में ही उगा लिया है ताकि जरूरत होने पर इसके लिए भटकना न पड़े। प्रभावती के खेत में तीन भैंस व चार बकरियां भी हैं। पहले वह मुर्गियां भी पालती थीं। अपने खेत में प्रभावती कंपोस्ट व जैविक खाद बनाती हैं। इसके अलावा मटका खाद, केंचुओं की खाद वर्मीकंपोस्ट आदि भी वह बनाती हैं। खेतों में वह वर्षा का पानी रोकने के लिए अच्छी तरह मेड़बंदी करती हैं। इस तरह पौष्टिक गुणों से भरपूर वर्ष भर जैविक अनाज व सब्जी प्रभावती के दस सदस्य के परिवार को मिल जाता है। दलहन व तिलहन की भी जरूरत मुख्य रूप से अपने खेत से ही पूरी हो जाती है। अधिकांश मसाले व कई तरह की औषधि भी खेत से ही मिल जाती हैं। जलावन व अन्य तरह की लकड़ी, बांस भी खेत से मिल जाती है। खाद व कीड़ों की दवा भी खेत पर ही तैयार हो जाते हैं। साथ ही वर्ष भर बिक्री के लिए कुछ न कुछ मिलता रहता है। जुताई-बुवाई के लिए ट्रैक्टर या बैल किराए पर लेने व बोरिंग के लिए डीजल का खर्च प्रभावती को अभी करना पड़ता है। नादेप खाद का टैंक बनाते समय प्रभावती को सीमेंट उपलब्ध नहीं था तो उन्होंने बांस व टहनियों से काम चला लिया। प्रभावती का खेत बलुवा मिट्टी का है जो उपजाऊ नहीं मानी जाती है। पर जैविक खाद के उपयोग से प्रभावती ने इस बलुवा मिट्टी के खेत को ही उपजाऊ बना दिया है। इस तरह प्रभावती ने स्वयं प्रेरणादायक कृषि तो की ही साथ में कई स्थानों पर जैविक खेती का प्रशिक्षण भी दिया है। इसी तरह गोरखपुर की रामरति रासायनिक खाद व कीटनाशक दवा का उपयोग किए बिना इतनी बढि़या खेती करती हैं कि उन्हें दूर-दूर तक जैविक खेती के आदर्श किसान की पहचान मिली है। मात्र एक एकड़ के अपने खेत पर विविधता भरी अनेक फसलों को उगाते हुए रामरति अपने पति रामबहल व परिवार के अन्य सदस्यों के सहयोग से न केवल पूरे परिवार के लिए पौष्टिक अनाज, सब्जी, फल, दलहन, तिलहन आदि का पर्याप्त उत्पादन कर लेती हैं अपितु औसतन प्रतिमाह 3000 रुपये की नकद आय भी विभिन्न फसलों से प्राप्त कर लेती हैं। पिछले वर्ष की बिक्री को याद करते हुए रामरति ने बताया कि 5,000 रुपये के तो केले ही बेच दिए व गेंहू तथा चावल भी कुल 10,000 रुपये का बेचा। इसके अतिरिक्त आलू व विभिन्न सब्जियों की अच्छी बिक्री हुई। रामरति अपने खेत पर ही कंपोस्ट और वर्मीकंपोस्ट खाद तैयार करती हैं। नीम, गोमूत्र आदि से कीड़ों से रक्षा की दवा भी बनाती हैं। कभी विशेषकर धान की रोपाई में परिवार से बाहर के मजदूर की जरूरत पड़ती भी है तो इसके बदले में वह भी मजदूरी कर लेते हैं। इससे नकद खर्च बच जाता है। इस तरह खर्च को न्यूनतम रखते हुए रामरति ने खर्च और उत्पादन में 1:13 का अनुपात प्राप्त किया यानी एक रुपये के खर्च पर 13 रुपये का उत्पादन प्राप्त किया। लगभग दस वर्ष पहले जीईएजी के कार्यकर्ताओं का संदेश सुनने के बाद रामरति ने जैविक खेती की यह राह पकड़ने का निर्णय लिया था। रासायनिक खाद और कीटनाशक दवा की खेती को धीरे-धीरे लगभग तीन वर्ष के समय में पूरी तरह छोड़ दिया। तब से वह जैविक खेती के लिए बहुत निष्ठा से मेहनत से करती हंै और इससे संतुष्ट हैं। वह बताती हैं कि इससे उनकी आय भी बढ़ी है और उत्पादन भी। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं).
Sunday, March 6, 2011
कृषि रसायन उद्योग की रफ्तार होगी तेज
भारतीय कृषि रसायन उद्योग वर्ष 2012 तक 7.5 फीसदी की सालाना बढ़ोतरी के साथ 170 करोड़ डॉलर (करीब 7,650 करोड़ रुपये) तक पहुंच सकता है। कैमसन बायोटेक्नोलॉजी लिमिटेड के संस्थापक एवं प्रबंध निदेशक धीरेन्द्र कुमार ने यह उम्मीद जताई। उन्होंने कहा कि बढ़ती आबादी, खाद्यान्नों के मामले में आत्मनिर्भरता हासिल करने पर अधिक जोर, प्रति एकड़ उपज बढ़ाने के दबाव के साथ-साथ कृषि भूमि की सीमित उपलब्धता और पुष्पों की खेती एवं बागवानी में हुए विकास के कारण भविष्य में कृषि रसायनों का इस्तेमाल बढ़ने की उम्मीद है। बकौल कुमार कंपनियां किसानों को कृषि रसायनों के सही मात्रा में इस्तेमाल के बारे में प्रशिक्षित करने के अपने प्रयासों में तेजी ला रही हैं। बढ़ती जागरूकता के कारण भी इन रसायनों के इस्तेमाल में तेजी आएगी। मौजूदा समय में कीटनाशकों का इस्तेमाल न किए जाने के कारण हर साल करीब 17 अरब डॉलर की फसल बर्बाद होती है। उन्होंने बताया कि पिछले तीन साल में भारत का पुष्प उत्पादन उद्योग 50 प्रतिशत बढ़ा है। राष्ट्रीय बागवानी मिशन ने वर्ष 2012 तक उत्पादन दोगुना करने का लक्ष्य रखा है। ऐसे में बागवानी व पुष्प उत्पादन क्षेत्र को बड़ी मात्रा में रसायनों की जरूरत होगी। भारत का कृषि रसायनों का बाजार वर्ष 2009 के 1.22 अरब डॉलर से बढ़कर वर्ष 2011 में 1.36 अरब डॉलर का हो गया। कुमार के मुताबिक अमेरिका, जापान और चीन के बाद भारत दुनिया में कृषि रसायनों का चौथा सबसे बड़ा उत्पादक देश है। जैव उवर्रक और बायोसाइड्स रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों का सबसे अच्छा विकल्प हैं। जैव उवर्रक कंपनियां रासायनिक उवर्रकों के स्थान पर प्राकृतिक बायोसाइड्स के इस्तेमाल को प्रोत्साहित करने का प्रयास कर रही हैं। बायोपेस्टीसाइड्स वे कीटनाशक होते हैं, जिन्हें जानवरों या पौधों के बैक्टीरिया और कुछ निश्चित खनिजों जैसे प्राकृतिक सामग्रियों से तैयार किया जाता है। बायोसाइड्स काफी प्रभावी, पर्यावरण अनुकूल और गैर टॉक्सिक हैं। रासायनिक उवर्रकों के लंबे समय तक इस्तेमाल करने से जमीन की गुणवत्ता और उवर्रता प्रभावित होती है, लेकिन जैव उवर्रकों का ऐसा कोई दुष्प्रभाव नहीं होता। जो किसान अपनी जमीन की गुणवत्ता के क्षरण का सामना कर रहे हंै, वे अब अपने पांरपरिक तौर-तरीके को बदलने के लिए बाध्य हो रहे हैं। कुमार ने कहा कि रासायनिक उवर्रकों के प्रभावों के बारे में जागरूकता के साथ-साथ भारत से फलों और सब्जियों के निर्यात में भारी बढ़ोतरी ने भी रासायनिक कीटनाशक व्यवसाय और इसके विकास को काफी प्रभावित किया है। भारत के कीटनाशकों का बाजार करीब आठ हजार करोड़ रुपये का है और यह पांच से सात फीसदी सालाना की दर से बढ़ रहा है। रासायनिक उवर्रकों के मामले में एशिया में भारत का चीन के बाद दूसरा स्थान है और वैश्विक स्तर पर देश 12वें स्थान पर है। वैश्विक कृषि रसायन उद्योग 2003 के 9.3 प्रतिशत के संचयी वार्षिक विकास दर से बढ़कर वर्ष 2008 में 41.7 अरब डॉलर तक पहुंच गया|
Thursday, February 10, 2011
Sunday, January 23, 2011
दाने-दाने को मोहताज अन्नदाता
कर्ज के बोझ तले किसानों की आत्महत्याओं और गरीबी के कारण लाखों लोगों के भूखे सो जाने की खबरें बताती हैं कि आज हालात किस तरह बिगड़े हुए हैं। ऐसे समय में किसानों और गरीबों को संबल देना समाज व सरकार दोनों की ही जिम्मेदारी है। जिंदगी में मुसीबतें आती हैं किंतु उनसे लड़ने का हौसला खत्म हो जाए तो क्या बचता है? ऐसे में सरकारी तंत्र को ज्यादा संवेदना दिखाने की जरूरत है। उसे यह प्रदर्शित करना होगा कि वह किसानों के दर्द में शामिल है। कर्ज लेने और न चुका पाने का जो भंवर हमने शुरू किया है, उसकी परिणति तो यही होनी थी। भारतीय खेती का चेहरा, चाल और चरित्र सब कुछ बदल रहा है। खेती अपने परंपरागत तरीकों से हट रही है और नए रूप ले रही है। आज सरकारी तंत्र के लिए यह गंभीर चिंता का विषय है कि इतनी सारी किसान समर्थक योजनाओं के बावजूद क्यों किसान आत्महत्या के लिए मजबूर हैं। किसान इस जाल में लगातार फंस रहे हैं और कर्ज का बोझ लगातार बढ़ रहा है। बाजार की नीतियों के चलते उन्हें सही बीज, खाद और कीटनाशक घटिया मिलते हैं। जाहिर तौर पर इसने भी फसलों के उत्पादन पर विपरीत प्रभाव डाला है। इसके चलते आज खेती हानि का व्यवसाय बन गई है। अन्नदाता खुद एक कर्ज के चक्र में फंस जाता है। मौसम की मार अलग है। सिंचाई सुविधाओं के सवाल तो जुड़े ही हैं। किसान के लिए खेती आज लाभ का धंधा नहीं रही। वह एक ऐसा कुचक्र बन रही है जिसमें फंसकर वह कहीं का नहीं रह पा रहा है। उसके सामने परिवार को पालने से लेकर आज के समय की तमाम चुनौतियों से जूझने और संसाधन जुटाने का साहस नहीं है। वह अपने परिवार की जरूरतों को पूरा नहीं कर पा रहा है। कर्ज में डूबा किसान आज मौसम की मार, खराब खाद और बीज जैसी चुनौतियों के कारण अगर हताश और निराश है तो उसे इस हताशा से निकालने की जिम्मेदारी आखिर किसकी है? आज सरकार, समाज और मीडिया को मिलकर एक वातावरण बनाना होगा कि समाज में गरीबों और किसानों के प्रति आदर बढे़ और उसे दो जून की रोटी की उपलब्धता सुनिश्चित हो ताकि वह मौत को गले न लगाएं। मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने हालांकि तुरंत इस विषय में धोषणा करते हुए कहा कि किसानों को फसल का पूरा मुआवजा मिलेगा और किसानों को आठ घंटे बिजली भी मिलने लगेगी। निश्चय ही मुख्यमंत्री की यह घोषणा कि किसानों को हुए नुकसान के बराबर मुआवजा मिलेगा एक संवेदशील घोषणा है। सरकार को भी इन घटनाओं के अन्य कारण तलाशने में समय गंवाने की बजाय किसानों को आश्वस्त करना चाहिए। मूल चिंता यह है कि किसानों की स्थिति को देखते हुए जिस तरह बैंक कर्ज बांट रहे हैं और किसानों को लुभा रहे हैं वह कहीं न कहीं किसानों के लिए घातक साबित हो रहा है। कर्ज लेने से किसान उसे समय पर चुका न पाने कारण अनेक प्रकार से प्रताडि़त हो रहा है और उसके चलते उस पर दबाव बन रहा है। सरकार में भी इस बात को लेकर चिंता है कि कैसे हालात संभाले जाएं? इस संदर्भ में सरकार खाद्य सुरक्षा के अधिकार विधेयक को पारित करके देश की एक बड़ी आबादी के रूप में रह रहे किसानों की बड़ी मदद कर सकती है। सरकार के तंत्र को सिर्फ संवेदनशीलता के बल पर इस विषय से जूझना चाहिए। उम्मीद की जानी चाहिए अन्नदाताओं के मनोबल को बढ़ाने के लिए सरकार कुछ ऐसे कदम उठाएगी जिससे वे आत्महत्या जैसे कदम उठाने के लिए विवश न हों। व्यावसायिक लाबियों के दबाव में हमारे केंद्रीय कृषि मंत्री किस तरह की बयानबाजी कर रहे हैं, यह सारे देश ने देखा है। एक तरफ बर्बाद फसल तो दूसरी ओर बढ़ती महंगाई, आखिर आम आदमी के लिए इस गणतंत्र में आखिर क्यों नहीं जगह हो सकती है? यह सब एक संवेदनशील समाज को झकझोरकर जगाने के लिए पर्याप्त हैं, लेकिन इसके बावजूद हमारे सत्ताधीशों की कुंभकर्णी निद्रा जारी है। ऐसे में क्या हम दिल पर हाथ रखकर यह दावा कर सकते हैं कि हम एक लोककल्याणकारी राज्य की शर्तो को पूरा कर रहे हैं। नौकरशाही किसानों की आत्महत्याओं को एक अलग रंग देने में लगी है। सत्ता में बैठे नेता जनता को गुमराह जरूर कर सकते हैं, लेकिन किसानों की आह लेकर कोई भी राजसत्ता लंबे समय तक सिंहासन पर नहीं रह सकती है। इस बारे में समय रहते हमें सोचना होगा और यथोचित कदम उठाने होंगे।
Saturday, December 25, 2010
फसलों की होगी डिजिटल मैपिंग
प्याज संकट के बाद सरकार चेती
फसल के नुकसान का हो सकेगा आकलन कृषि मंत्रालय ने इस दिशा में शुरू की तैयारी
नई दिल्ली। प्याज जैसा संकट किसी और फसल के लिए न हो, इसके लिए कृषि मंत्रालय अब फसलों के खराब होने का आकलन डिजिटल मैपिंग से कराएगा। मंत्रालय इसके लिए तैयारी कर रहा है ताकि फसलों के खराब होने की जानकारी लगातार डिजिटल मैपिंग से हो सके। इस संबंध में एक सूत्र का कहना है कि सेटेलाइट से मिलनेवाली डिजिटल मैपिंग में एग्रीकल्चर के लिए अलग से अध्ययन की व्यवस्था की जाएगी ताकि राज्यवार इस बात की देखरेख की जा सके कि फसल कहीं खराब तो नहीं हो रही। अभी तक सरकार के पास जल की उपलब्धतता और वन स्थिति की देखरेख के अध्ययन की व्यवस्था थी, लेकिन सरकार अब एग्रीकल्चर इनपुट के लिए भी गौर करेगी। सूत्र का कहना है कि पश्चिम बंगाल के गांव अरापांच में खेती की स्थिति और फसल को लेकर डिजिटल मैपिंग अध्ययन कराया गया था जिसे नेशनल ब्यूरो आफ साइल सव्रे एंड लैंड यूज प्लानिंग ने पूरा कराया। अब तक सरकार ने सेटेलाइट आईआरएस-आई डी से मिलनेवाली फोटो से जमीन की स्थिति और फर्टिलाइजर्स उपयोग पर ही काम किया है। नेशनल ब्यूरो आफ सोइल सव्रे एंड लैंड यूज प्लानिंग द्वारा नागपुर में भी इसी पर काम हो रहा है, लेकिन अभी तक फसल की उपलब्धतता कैसी है और फसल कहां खराब हो रही है इसके अध्ययन पर काम नहीं हो रहा था, इसलिए सरकार ने अब प्याज-जैसे संकट से बचने के लिए फसल उत्पादन के आंकड़े जुटाने के लिए भी कहा है। बहरहाल, रिमोट सेंसिंग एंड जीआईएस की टेक्निक से हाल में सारे राज्यों की मिट्टी की मैपिंग हुई है और साल्ट प्रभावित क्षेत्रों की मैपिंग पूरी हो चुकी है। कृषि मंत्रालय ने देश के राज्यों के कई गांवों और शहरों में अलग-अलग मैपिंग के माध्यम से आंकड़े जुटाए हैं जिनको काफी लाभकारी माना जा रहा है। सूत्र का कहना है कि अब यह आसान हो जाएगा और फसल खराब होने का अंदाजा भी आसानी से लगाया जा सकेगा।
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