सावन में भी यूपी के किसान बारिश को तरसते रहे। सूबे के छह जिलों के अलावा बाकी सभी जिलों में मानसून की नाराजगी बनी रही। इनमें सामान्य से कम बारिश रिकार्ड की गई। इससे सीधा नुकसान खरीफ की बुआई पर पड़ा है। मौसम विभाग के आंकड़े के अनुसार सूबे के उन 26 जिलों में सामान्य से आधी बारिश हुई जिनको धान की बेहतर उपज देने वाला जिला माना जाता है। मेरठ, बागपत, महाराजगंज, कुशीनगर, गौतमबुद्धनगर, रामपुर, गाजियाबाद, हाथरस व हापुड़ में सबसे कम बारिश हुई। केवल छह जिलों ललितपुर, कांशीराम नगर, चित्रकूट, बलरामपुर, अंबेडकर नगर व कानपुर देहात पर ही इंद्रदेव मेहरबान रहे। इन जिलों में सामान्य से थोड़ा अधिक पानी बरसा। सावन के बादलों की रुसवाई ने धान उत्पादक किसानों की हिम्मत तोड़ दी है। जिसके चलते धान की रोपाई लक्ष्य से करीब 25 फीसद कम रही। दलहनी फसलों, मक्का, ज्वार व बाजरा की बुआई की स्थिति भी कमोबेश ऐसी ही है। बुंदेलखंड और पश्चिमी यूपी के जिलों में हालात अधिक नाजुक है। पश्चिमी जिलों में खरीफ फसलों के आच्छादन क्षेत्र में तीस प्रतिशत से अधिक कमी आई है। बुंदेलखंड में 55,840 हेक्टयर धान रोपाई के विपरीत साढ़े 12 हजार हेक्टेयर में आच्छादन हो सका है। कृषि वैज्ञानिक डॉ. एसके सिंह का कहना कि खरीफ फसलों की बुआई का आदर्श समय 15 जुलाई तक माना जाता है। इसके बाद बुआई में देरी से प्रति सप्ताह उत्पादन दस से 15 फीसद घटता है। जुलाई में अपेक्षित वर्षा न होने से उत्पादन का लक्ष्य पूरा करना मुश्किल हो गया है। इस बार प्रदेश में अब तक सामान्य से 23 प्रतिशत कम वर्षा हुई है। यदि अगस्त में भी इंद्रदेव की विशेष कृपा नहीं होती है तो वर्ष 2007 व 2002 के सूखे जैसी परिस्थितियां पैदा हो सकती है। सेंट्रल रिसर्च इंस्टीट्यूट फार ड्राईलैंड एग्रीकल्चर (सीआरआइडीए) के आंकड़ों के मुताबिक 2002 में 19 प्रतिशत वर्षा सामान्य से कम होने पर देश का खाद्यान्न उत्पादन 2.40 लाख टन गिरा था। 2007 में वर्षा 23 प्रतिशत कम हुई परंतु खरीफ की फसलों का उत्पादन वर्ष 2002 के सापेक्ष कम ही गिरा था। मानसून का आधे से अधिक समय बीतने और वर्षा सामान्य से कम होने से कृषि विभाग डैमेज कंट्रोल की कोशिशों में लगा जरूर है परंतु ग्रामीण क्षेत्रों में बिजली संकट एवं नहरों में पानी न पहुंचना किसानों की मुसीबतें बढ़ा रही है। हालात में सुधार बादलों की मेहरबानी पर ही निर्भर है। हालात बेकाबू नहीं : डीएम सिंह नवनियुक्त कृषि निदेशक डीएम सिंह का कहना है कि प्रदेश में औसत से कम वर्षा भले ही हो परंतु पिछले तीन चार दिनों में पश्चिमी यूपी में वर्षा होने से राहत मिली है। वर्षा की स्थिति और किसानों की जरूरतों को पूरा करने पर कड़ी निगरानी रखी जा रही है। निदेशालय में कंट्रोल रूम की स्थापना कर दी है। किसान अपनी समस्या 0522-2206925 फोन नंबर पर दर्ज करा सकते हैं। कंट्रोल रूम में प्रात: दस से शाम पांच बजे तक सक्षम अधिकारी मौजूद रहेंगे।
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Saturday, August 4, 2012
पंजाब ने केंद्र से मांगे 2380 करोड़
कमजोर मानसून के कारण धान की फसल पर पड़ रहे नकारात्मक असर और किसानों की बदहाली को ध्यान में रखते हुए पंजाब के मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल ने केंद्र से 2380 करोड़ का पैकेज मांगा है। इस संबंध में प्रधानमंत्री को भेजे एक मांग पत्र में मुख्यमंत्री ने कहा है कि अब तक के सबसे बुरे मानसून से बुरी तरह प्रभावित हुए पंजाब के किसानों को तुरंत इस पैकेज की दरकार है। पंजाब में 27.80 लाख हेक्टेयर में धान और खरीफ की अन्य फसलों जैसे कि नरमा और मक्की आदि की बिजाई की गई है। मानसून में 65 फीसदी कम बारिश होने के कारण किसानों को सिंचाई के लिए डीजल से चलने वाले पंप सेटों का प्रयोग करना पड़ रहा है। जिसकी वजह से किसानों की आर्थिक स्थिति बदहाल होती जा रही है। बादल ने कहा कि 1960 के बाद एक बार फिर भारत विशेषकर पंजाब और उत्तरी पश्चिमी राज्यों में पुन: गंभीर सूखे वाली स्थिति पैदा हो गई है। मानसून के शेष रहते समय के दौरान भी बारिश होने के आसार नहीं दिख रहे। उन्होंने कहा कि पंप सेटों से सिंचाई के लिए 550 करोड़ रुपये का अधिक खर्चा करना पड़ेगा। इस तरह मोनो ब्लॉक पंपों को सबमर्सिबल ट्यूबवेलों में बदलने के लिए किसानों को 300 करोड़ रुपये का अधिक खर्च करने होंगे। इसके अतिरिक्त पंजाब राज बिजली निगम लिमिटेड को भी 1530 करोड़ रुपये का अधिक बोझ बर्दाश्त करना पड़ेगा।
Tuesday, April 3, 2012
किसानों के साथ वादाखिलाफी
| चुनाव के समय मतदाताओं से बड़े-बड़े वादे करने वाली सियासी पार्टियां, सत्ता में आने के बाद किस तरह उनसे वादाखिलाफी करती हैं, हाल ही में यह बात मध्यप्रदेश में सामने आई है। पिछले विधानसभा चुनाव में अपने चुनावी घोषणा-पत्र में किसानों के 50 हजार रुपए तक के कर्ज माफ करने का वादा करने वाली बीजेपी, आज अपने वादे से मुकर गई है। चार साल होने को आए, पर सूबे में यह वादा पूरा होता नहीं दिख रहा। हद तो तब हो गई, जब मध्य प्रदेश विधानसभा के अंदर बीजेपी शासन के मंत्रियों ने ऐसे किसी वादे से अपनी अनभिज्ञता जताई। सहकारिता मंत्री गौरीशंकर बिसेन और उद्योग मंत्री कैलाश विजयवर्गीय दोनों ने ही इस मुद्दे पर विधानसभा में कहा कि सरकार ने किसानों के 50 हजार रुपए की कर्ज माफी का कभी कोई औपचारिक एलान नहीं किया। यानी, अपनी ही पार्टी के चुनावी घोषणा-पत्र को अब सरकार के मंत्री झुठला रहे हैं। सहकारिता मंत्री गौरीशंकर बिसेन ने सरकार का बचाव करते हुए विधानसभा में बचकाना बयान दिया कि कर्ज माफी का वादा पार्टी ने किया था, सरकार ने नहीं। लिहाजा, सरकार जबावदेह नहीं। सहकारिता मंत्री के बयान से जाहिर है कि बीजेपी राज्य में किसानों और उनकी समस्याओं के प्रति कितनी संजीदा है? बीजेपी ने साल 2008 के विधानसभा चुनाव में अपने चुनाव घोषणा-पत्र में किसानों से वादा किया था कि यदि वह सत्ता में आई, तो उनका 50 हजार रुपए तक का कर्ज माफ कर दिया जाएगा। पार्टी ने इस वादे को बाकायदा पचरें में छपवाकर किसानोें के बीच बांटा। यहां तक कि पचरें में उस वक्त के अपने राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह तक का हवाला दिया गया। कर्ज माफी के इस वादे का बीजेपी को खूब फायदा मिला। उसके वायदे पर यकीन कर सूबे के किसानों ने उसको जमकर वोट दिए लेकिन हुकूमत में दोबारा वापिस आते ही सरकार ने अपना वादा भूल गयी। सरकार ने किसानों से तो वादाखिलाफी की ही, केन्द्र से कर्ज माफी के लिए मिले 915 करोड़ रूपए में भी सेंध मार दी। आलम यह है कि सूबे में सहकारी संस्थाओं के घोटालों के चलते किसानों के 115 करोड़ रुपए के कर्ज माफ नहीं हो पाए हैं। इस बात का इकरार खुद सरकार ने किया है। राज्य सरकार की तमाम किसानोन्मुखी योजनाओं के दावों के बीच मध्य प्रदेश में तकरीबन 32 लाख 11 हजार से ज्यादा किसान आज भी कर्ज के बोझ से दबे हैं। खुद सहकारिता मंत्री गौरीशंकर बिसेन ने विधानसभा में इस बात को माना है कि सूबे के किसान जिला सहकारी कृषि व ग्रामीण विकास बैंकों के सात हजार करोड़ रुपए से ज्यादा के कर्जदार हैं। सूबे में औसतन हर किसान पर 14 हजार 218 रुपए के कर्ज का बोझ है। जबकि कडुवी सचाई यह है कि राज्य में 30 फीसद से ज्यादा ऐसे किसान हैं, जिनके पास महज एक से लेकर तीन हेक्टेयर तक ही खेती के काबिल जमीन है। कृषि मामलों के जानकारों का मानना है कि सूबे के 50 फीसद से ज्यादा किसानों पर फिलवक्त संस्थागत कर्ज चढ़ा है। इसके अलावा किसान स्थानीय साहूकारों और बड़े व्यापारियों से भी कर्ज लेते हैं। यह कर्ज ऐसा है, जो उन्हें चैन से जीने नहीं देता। यही वजह है कि मध्य प्रदेश में बीते 10 सालों में किसानों की खुदकुशी के मामलों में लगातार इजाफा हुआ है। इन 10 सालों में यहां तकरीबन 14,155 किसान खुदकुशी कर चुके हैं। राष्ट्रीय अपराध अभिलेख ब्यूरो के आंकड़ों के मुताबिक सूबे में हर दिन चार किसान खुदकुशी करते हैं। साल 2003-04 में पड़े सूखे के बाद से तो यहां आत्महत्या का ग्राफ बढ़ता चला गया है। किसानों को बीज, खाद, पानी और बिजली जैसी खेती की बुनियादी जरूरतें भी नहीं मिल पा रहीं हैं, जिसके चलते वे हताशा में आत्महत्या की तरफ कदम बढ़ा रहे हैं। किसी भी सरकार के लिए इससे ज्यादा अफसोस की बात क्या होगी कि उसके सूबे में किसान आत्महत्याएं करते रहें और वह इस समस्या पर गंभीरता से सोचने की बजाय उसे सिरे से ही खारिज कर दे। इस बात को अभी ज्यादा दिन नहीं गुजरे हैं, जब किसानों की आत्महत्या को कृषि मंत्री रामकृष्ण कुसमरिया ने किसानों का पाप बतलाते हुए अपना पल्ला झाड़ लिया था। जबकि हकीकत यह है कि किसानों की आत्महत्याओं के पीछे प्राकृतिक कारणों से ज्यादा वे कारण जिम्मेदार थे, जिन पर सरकार आसानी से काबू पा सकती थी। घटिया खाद-बीज, नकली कीटनाशक और कर्ज इन किसानों की मौत की बड़ी वजह था। इस बात की तस्दीक हाल में आई राज्य मानवाधिकार आयोग की रिपोर्ट ने भी कर दी है। रिपोर्ट में साफ-साफ तौर पर भ्रष्ट तंत्र, कर्ज और फसल की बर्बादी को किसानों की आत्महत्या का जिम्मेदार ठहराया गया है। राज्य में आज हालत यह है कि यदि जल्द ही किसानों के कर्ज माफ नहीं किए गए तो आत्महत्याओं का ग्राफ और भी बढ़ सकता है। कुल मिलाकर, यह पहली बार नहीं है जब बीजेपी ने सूबे के किसानों के साथ धोखा किया हो। पूर्व मुख्यमंत्री सुंदरलाल पटवा के समय भी बीजेपी ने चुनाव में किसानों से पच्रे भरवाए थे और नारा दिया था, ‘भाजपा का कहना साफ, हर किसान का कर्जा माफ।’ लेकिन जब बीजेपी सरकार में आई, तो यह वादा भूल गई। दिखावे के लिए कुछ कज्रे माफ हुए और बाद में किसानों को ठेंगा दिखा दिया गया। सूबे में कमोबेश यही कहानी शिवराज सरकार, फिर दोहरा रही है। कर्ज माफी के अपने वादे पर अमल करने की बजाए उसके मंत्री हास्यास्पद दलीलें दे रहें हैं। मानो पार्टी और सरकार जुदा-जुदा हों। सरकार यह कहकर अपनी जिम्मेदारियों से नहीं बच सकती कि कर्ज माफी का वादा पार्टी ने किया था, सरकार ने नहीं। चुनाव घोषणा-पत्र पार्टी का लिखित संविधान होता है और सत्ता में आने के बाद उस पर अमल करना उसका कर्त्तव्य। जो पार्टी चुनाव घोषणा-पत्र के आधार पर सत्ता में आती है, उसका जिम्मा बनता है कि वह प्राथमिकता के आधार पर पहले अपने चुनाव घोषणा-पत्र पर अमल करे, न कि उसे खारिज कर दे। वरना, चुनाव घोषणा-पत्र पर कौन यकीन करेगा? |
बुंदेलखंड ने गेहूं उत्पादन में पंजाब को पछाड़ा
डेढ़ दशक से सूखे से जूझ रहे बुंदेलखंड के चित्रकूट से राहत देने वाली खबर है। इंद्रदेव के मेहरबान होने से गेहूं के उत्पादन में प्रति हेक्टेयर इतना उछाल आया कि पंजाब भी पीछे हो गया है। गेहूं, चना, अरहर, सरसों और मसूर का इस साल रिकार्ड उत्पादन हुआ है। उम्मीद है कि खरीफ के मौसम में वह किसान भी खेती-बारी फिर शुरू कर देंगे, जो कृषि से तौबा कर चुके थे। दस साल से जिले में सामान्य वर्षा 830 मिलीमीटर से कम हो रही थी, जिससे किसानों के खेत बंजर पड़े रहते थे। 2009 में तो इतना जबर्दस्त सूखा पड़ा कि किसानों ने खेतों में जो बीज डाला था, वह भी वापस नहीं आया था। इसके बाद जिले के किसानों ने खेती से तौबा कर ली। हालांकि इस साल इंद्रदेव बुंदेलखंड में ऐसे मेहरबान हुए कि कई साल की वर्षा का रिकार्ड टूट गया। जिले में 960 मिमी वर्षा हुई, जबकि इसके पूर्व में मात्र 437 मिलीलीटर वर्षा हुई थी। इससे किसानों का हौसला बढ़ा। उन्होंने कई साल से परती पड़े खेतों में रबी और दलहनी फसलों की बुआई कर डाली। इसका अच्छा परिणाम भी देखने को मिला। जिले के खेतों में गेहूं, चना, सरसों, अरहर और मसूर की फसल लहलहाती रही। कृषि विभाग की मानें तो जिला बनने के बाद चित्रकूट में पहली बार रिकार्ड फसल का उत्पादन हुआ है। आंकड़े बताते हैं कि गेहूं के प्रति हेक्टेयर उत्पादन के मामले में तो पंजाब भी पीछे हो गया है। उप कृषि निदेशक मोहम्मद आरिफ सिद्दीकी ने बताया कि जिले में गेहूं उत्पादन प्रति हेक्टेयर 30 से 32 क्विंटल आया है, जबकि पंजाब में पिछले साल 28 क्विंटल प्रति हेक्टेयर उत्पादन हुआ था। जिले में पिछले साल 17.84 क्विंटल प्रति हेक्टेयर उत्पादन हुआ था। उन्होंने बताया कि चना का भी रिकार्ड उत्पादन होने की संभावना है। क्राफ्ट कटिंग में 16 से 18 क्विंटल प्रति हेक्टेयर का उत्पादन सामने आया है। पिछले साल चना का उत्पादन मात्र 6.08 क्विंटल प्रति हेक्टेयर था। सरसों उत्पादन में भी जबर्दस्त उछाल देखा गया है। उन्होंने 12 क्विंटल प्रति हेक्टेयर के उत्पादन की संभावना व्यक्त की, जो पिछले साल के मुकाबले लगभग सात क्विंटल अधिक है। अरहर उत्पादन भी काफी अधिक हुआ है। सिद्दीकी ने बताया कि उनके अलावा जिलाधिकारी डॉ. आदर्श सिंह ने खुद देखा कि प्रति हेक्टेयर उत्पादन 32 क्विंटल निकला है।
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