आगरा और टप्पल के बाद अब लखनऊ में भी किसान आंदोलन सुलगने लगा है। लखनऊ विकास प्राधिकरण (एलडीए) द्वारा 500 एकड़ भूमि का अधिग्रहण किए जाने से खफा फैजुल्लागंज के घैला, दाऊद नगर, रहीमनगर डिडौली और गाजीपुर बलराम के किसानों ने संघर्ष का बिगुल बजा रखा है। 18 जनवरी को इलाहाबाद में किसान आंदोलन की जो रणनीति तय होगी, उसमें लखनऊ का भू-अधिग्रहण व किसान आंदोलन का मुद्दा अहम होगा। एलडीए ने 197 गांवों को अपनी सीमा में जोड़ा है। माना जा रहा है कि इन गांवों की जमीन पर भी प्राधिकरण की नजर रहेगी। गोमतीनगर फेस-दो में किसानों को हाईकोर्ट के आदेश के बाद भी उचित मुआवजा नहीं मिल सका। 1.60 रुपये प्रति वर्गफीट की दर एलडीए ने तय की थी, जबकि हाईकोर्ट के आदेश के बाद करीब 450 किसानों को दो रुपये प्रति फीट के हिसाब से मुआवजा मिलना बाकी है। आवास विकास परिषद के तहत 1981 में अधिग्रहीत तकरोही, मटियारी और हरदासी खेड़ा के किसानों के मुआवजे का मामला अभी तय नहीं हो पाया है। चिनहट के बाघामऊ और भरवारा के किसानों की जमीनों के कम दाम पर भी किसानों में नाराजगी है। हरदोई रोड के बसंतकुंज में 1981 में अधिग्रहीत 250 एकड़ भूमि की दरों को लेकर किसानों का आंदोलन समय-समय पर सड़कों पर दिखता है। भाकियू जिलाध्यक्ष हरनाम सिंह वर्मा का कहना है कि लखनऊ में 2687 एकड़ कृषि योग्य भूमि के अधिग्रहण की कार्यवाही चल रही है। सरकार की इस मंशा से नाराज किसान आंदोलन को तैयार हैं। 16 से 18 जनवरी के बीच इलाहाबाद में किसान आंदोलन को लेकर जो रणनीति तय होगी, उसमें लखनऊ का मुद्दा प्रमुख होगा। लखनऊ औद्योगिक विकास प्राधिकरण (लीडा) में भी जिले के 49 गांवों की करीब दो हजार एकड़ भूमि के अधिग्रहण का मामला अभी शांत है लेकिन यह तेज हो सकता है।
Showing posts with label १२ जनवरी २०११. Show all posts
Showing posts with label १२ जनवरी २०११. Show all posts
Thursday, January 13, 2011
आलू की फसल पर शराब का छिड़काव
अलीगढ़ के इगलास क्षेत्र में किसान आलू की फसल पर दारू का छिड़काव करते हैं। वह ऐसा किसी टोटके के लिए नहीं बल्कि फसल की गुणवत्ता को बरकरार रखने और उपज बढ़ाने के लिए ऐसा करते हैं। वहीं, कृषि विशेषज्ञ किसानों की इस हरकत पर अपना माथा पीट रहे है। उनका मानना है कि ऐसा करने से जमीन की उर्वरा शक्ति ही चौपट हो जाएगी। खेती में यह विचित्र किन्तु सत्य प्रयोग इगलास क्षेत्र के किसान कर रहे है। आलू की फसल को पाला व रोगों से बचाने के लिए इस नायाब प्रयोग का आइडिया कहां से आया, ये तो नहीं पता लेकिन बड़ी संख्या में किसान कीटनाशक के रूप में देशी शराब का छिड़काव कर रहे है। कुछ किसान तो शराब के साथ ऑक्सीटोसिन भी मिलाकर छिड़क रहे है। आलू की पैदावार के लिए इगलास क्षेत्र का आसपास के जिलों में खासा नाम है। खूब पैदावार होती है। जाड़े में फसल में पाला गिरने और रोग लगने का डर रहता है। इसके लिए अब तक किसान जल्दी-जल्दी सिंचाई और कीटनाशकों का छिड़काव करते रहे हैं। इस बार ठंड खूब पड़ रही है और पाला मार जाने का डर सता रहा है। इससे बचाव के लिए यहां के किसानों ने नया तरीका खोज निकाला। क्षेत्र के ज्यादातर किसान फसल में देशी शराब व ऑक्सीटोसिन का घोल बनाकर छिड़क रहे हैं। किसानों का कहना है कि शराब में अल्कोहल होता है। अल्कोहल के छिड़काव से फसल में पाला नहीं पड़ता। रोगों से भी बचाव होता है। रामकुमार और फूल सिंह नामक किसान का कहना है कि शराब के छिड़काव से पैदावार बंपर होती है। आलू की गुणवत्ता भी अच्छी होती है, जिसकी बाजार में अच्छी कीमत मिलती है। इस बारे में बात करने पर क्षेत्रीय कृषि सुरक्षा पर्यवेक्षक बनवारी लाल ने कहा, मैं हैरान हूं और चिंतित भी। किसान अज्ञानतावश फसल में शराब का छिड़काव कर रहे हैं। इससे खेत की उर्वरा शक्ति खत्म होती जाएगी। आलू भी अंदर से गल जाएगा। खुदाई के समय काला आलू निकलेगा, जिसे खाने वाले भी बीमार पड़ सकते है।
तबाही की तरफदारी
लेखक जैव संविर्द्धत अर्थात जीएम फसलों के कृषि और मानव जीवन पर खतरों के प्रति आगाह कर रहे हैं…
जैव संविर्द्धत (जीएम) फसलें एक बार फिर चर्चा में हैं। मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) ने अपनी पूर्ववर्ती नीति से पलटी मारकर अब सार्वजनिक रूप से जीएम फसलों को समर्थन देना शुरू कर दिया है। बहस गरमा रही है। यह उसी लाइन पर जा रही है, जिस पर शरद पवार जोर दे रहे हैं। इसमें हैरत की बात नहीं है। मैं देर-सबेर इसकी उम्मीद कर रहा था। आखिरकार, विकिलीक्स पहले ही खुलासा कर चुका है कि भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार शिवशंकर मेनन जीएम फसलों के पक्ष में राय व्यक्त कर चुके हैं। विकिलीक्स के एक और खुलासे में, पेरिस में अमेरिकी दूतावास ने जीएम फसलों का विरोध कर रहे यूरोप के खिलाफ वाशिंगटन को सैन्य व्यापार युद्ध छेड़ने की सलाह दी थी। 2008 में अमेरिका और स्पेन ने यूरोप में खाद्यान्न की कीमतें बढ़ने पर जीएम खाद्यान्न फसलों की आवश्यकता को उचित ठहराया था। यूरोप अब भी जीएम फसलों को स्वीकार नहीं कर रहा है, ऐसे में केवल भारत ही निशाने पर है। 2010 के शुरू में भारत के पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने बीटी बैंगन के व्यावसायीकरण को स्थगित कर दिया था। इसके बाद भारत पर अमेरिका ने कूटनीतिक और राजनीतिक दबाव बढ़ा दिया था। बहुराष्ट्रीय बीज उद्योग ने तेजी से कदम उठाते हुए बड़ी संख्या में पत्रकारों को अमेरिका की शैक्षिक यात्रा कराई और भारत में भी जीएम फसलों के पक्ष में मीडिया अभियान छेड़ दिया। उसी समय, विशाल बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने जीएम फसलों के पक्ष में राजनीतिक दृष्टिकोण को प्रभावित करने के प्रयास तेज कर दिए थे। माकपा के दृष्टिकोण में बदलाव इन्हीं प्रयासों का नतीजा है। हमें कुछ ऐसे मुद्दों की पड़ताल करना बेहद जरूरी है, जो जीएम फसलों को बढ़ावा देने के शोरशराबे में गुम हो गए हैं। पहली और सबसे महत्वपूर्ण दलील यह दी जाती है कि एक अरब से अधिक की आबादी वाले देश का पेट जीएम फसलें ही भर सकती हैं। इससे खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित होगी। सच्चाई इसके उलटी है। विश्व में कोई ऐसी जीएम फसल नहीं है, जो उत्पादकता को बढ़ा सके। वास्तव में, अधिकांश जीएम फसलों ने असलियत में उत्पादकता को घटाया ही है। अमेरिकी कृषि विभाग भी स्वीकार करता है कि जीएम मक्का और जीएम सोया की उत्पादकता सामान्य प्रजातियों से कम है। अगर जीएम फसलों की उत्पादकता सामान्य फसलों से भी कम है तो आश्चर्य है कि हमारे राजनेता जीएम फसलों से खाद्य सुरक्षा बढ़ने की बात क्यों कर रहे हैं! सच्चाई यह है कि विश्व में खाद्यान्न की कमी ही नहीं है। पृथ्वी पर 6.5 अरब लोग रहते हैं, जबकि खाद्यान्न का उत्पादन 11.5 अरब लोगों के लिए हो रहा है। अगर विश्व में रोजाना एक अरब से अधिक लोग भूखे पेट सोने को मजबूर हैं तो इसका कारण खाद्यान्न की अनुपलब्धता न होकर दोषपूर्ण वितरण प्रणाली है। यही बात भारत पर भी लागू होती है, जहां एक-तिहाई आबादी उपलब्ध भोजन खरीदने की स्थिति में नहीं है, जिसे गोदामों में चूहे चट कर रहे हैं। अब तक विकसित करीब सभी जीएम फसलों की विशेषता कीटरोधी होना बताया जाता है। उदाहरण के लिए बीटी कॉटन पिंक बॉलवर्म जैसे कीटों के मारने के लिए विकसित की गई, जिससे कीटनाशकों का इस्तेमाल घट जाए। यह लंबे समय तक सही सिद्ध नहीं हुआ। चीन में, बीटी कॉटन उगाने वाले किसान अब दस फीसदी अधिक कीटनाशकों का इस्तेमाल कर रहे हैं। भारत में भी, बीटी कॉटन की पैदावार में अधिक कीटनाशकों का इस्तेमाल होने लगा है। सेंट्रल इंस्टीट्यूट ऑफ कॉटन रिसर्च, नागपुर की रिपोर्ट के अनुसार, 2006 में, 640 करोड़ रुपये के कीटनाशकों का कॉटन पर छिड़काव किया गया। 2008 में यह राशि 800 करोड़ से अधिक हो गई। यहां तक कि अमेरिका में भी, जहां जीएम फसलों का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल हो रहा है, कीटनाशकों पर खर्च 30 करोड़ डॉलर बढ़ गया है। जीएम फसलें अपनी जड़ों के माध्यम से मिट्टी में जहरीले तत्व छोड़ती हैं। भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान के शोध के अनुसार इससे मिट्टी के लिए लाभदायक माइक्रोफ्लोरा को नुकसान पहुंचता है। किसानों की शिकायतें बढ़ती जा रही हैं कि बीटी कॉटन की हर अगली पैदावार पहले से कम हो रही है। इसके अलावा आंध्र प्रदेश और हरियाणा में बीटी फसल की पत्तियां खाने से पशु मर रहे हैं। आंध्र प्रदेश पशुपालन विभाग ने किसानों को चेतावनी जारी की है कि वे पशुओं को बीटी कॉटन के खेत में न चरने दें। जीएम फसल कुछ ऐसे कीट (सुपरकीट) भी पैदा करती हैं, जो किसी भी कीटनाशक से नहीं मरते। अमेरिका में, 1.5 करोड़ एकड़ जमीन पर सुपरकीट फैल चुके हैं। इन कीटों के फैलने से अमेरिका का जार्जिया प्रांत तेजी से बंजर होता जा रहा है। उत्तरी अमेरिका में कम से कम 30 सुपरकीट विकसित हो गए हैं, जो किसी भी रसायन से खत्म नहीं होते। दुनिया भर में अनेक उदाहरण हैं जिनसे पता चलता है कि जीएम फसल स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हैं। यहां तक कि बहुराष्ट्रीय कंपनी मोंसेंटो के खुद के अध्ययन भी बताते हैं कि इसके कारण यूरोप में चूहों को किडनी, लिवर, पैंक्रियाज और खून की गंभीर बीमारियां हो गई हैं। ऑस्टि्रया में कुछ हालिया अध्ययनों से पता चला है कि जीएम फसलों से नपुंसकता भी होती है। जिन भी वैज्ञानिकों ने जीएम फसलों के मानव शरीर पर पड़ने वाले प्रभाव पर सवाल उठाने की हिम्मत दिखाई है, उन्हें जीएम उद्योग के इशारे पर नौकरी से निकाल दिया गया। अगर हम लोगों के हाथ में नुकसानदायक प्रौद्योगिकी सौंप देंगे तो देर-सबेर विश्व की अप्राकृतिक मौत हो जाएगी। उदाहरण के लिए सिगरेट के हर पैकेट पर स्वास्थ्य के लिए खतरनाक होने की चेतावनी छपी रहती है, फिर भी इसकी बिक्री बढ़ रही है। चूंकि यह स्वास्थ्य के लिए खतरनाक है इसलिए सरकार ने सार्वजनिक स्थानों पर इसके इस्तेमाल को प्रतिबंधित कर दिया है। क्या यह गलत फैसला है? इसी प्रकार जीएम फसलों के इस्तेमाल करने या न करने का फैसला किसानों पर नहीं छोड़ा जा सकता। किसान ताकतवर कंपनियों के आक्रामक मार्केटिंग हथकंडों के जाल में फंस जाते हैं। पूरा सरकारी तंत्र, कृषि विश्वविद्यालय, कंपनियां और मीडिया का एक बड़ा हिस्सा जीएम फसलों को प्रोत्साहन देने में जुटा है। किसान इनका मुकाबला नहीं कर सकते। किसानों पर दोषपूर्ण प्रौद्योगिकियां थोपने पर वे पहले ही आत्महत्या कर रहे हैं। हत्यारी प्रौद्योगिकियों का इस्तेमाल न रोक कर हम और कितने किसानों की हत्या करना चाहते हैं? (लेखक कृषि नीतियों के विश्लेषक हैं)
Subscribe to:
Posts (Atom)