केंद्र और राज्य सरकारों की सुस्ती के कारण किसानों को अधिक अन्न उपजाने की सजा मिलने के आसार बनते दिख रहे हैं। खून-पसीना बहाकर पैदा किया अन्न अब किसान आंखों के सामने सड़ते देखेंगे। यही नहीं साढ़े आठ करोड़ टन से ज्यादा रिकार्डतोड़ फसल पैदा करने के बाद भी किसानों की जेब खाली रहेगी और गरीबों के पेट पहले की तरह ही भूखे। चूहे-कीड़े-मकोड़े खुले में सड़ता अनाज पहले जमकर छकेंगे और उसके बाद चांदी होगी तो शराब निर्माताओं की, क्योंकि किसानों के नाम पर कसमें खाने वाली सरकारों के पास उसकी फसल को रखने के इंतजाम ही नहीं हैं। इसके कारण दो करोड़ टन गेहूं बर्बाद होना तय है। केंद्रीय खाद्य मंत्री केवी थॉमस ने स्वीकार किया कि अन्न की ज्यादा पैदावार और भंडारण क्षमता में भारी अंतर बन गया है। उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों को खाद्यान्न भंडारण का अनुभव न होने से स्थितियां और खराब हो सकती हैं। अस्थायी व पक्के गोदामों में छंटाकभर अनाज रखने की जगह नहीं है। देश की बड़ी मंडियों में लाखों टन गेहूं खुले में जमा हो चुका है। उसे तिरपाल तक से ढकने की सुविधा नहीं है। एक जून तक 3.18 करोड़ टन गेहूं भंडारण का लक्ष्य है, लेकिन केंद्र ने हाथ खड़े कर भंडारण की जिम्मेदारी गेहूं उत्पादक राज्यों पर डाल दी है। सरकारी गोदामों में गुरुवार तक 7.80 करोड़ टन खाद्यान्न जमा हो चुका है। इसमें 3.00 करोड़ टन चावल और बाकी 2.30 करोड़ टन गेहूं है। उनमें पिछले सालों का लगभग 70 लाख टन पुराना अनाज भी भरा पड़ा है। देश में कुल 6.38 करोड़ टन खाद्यान्न भंडारण की क्षमता है। पंजाब, हरियाणा, उप्र और मप्र में रोजाना 10 लाख टन गेहूं आ रहा है। मंत्रालय के अनुमान के मुताबिक 1 जून 2012 तक इस क्षमता के मुकाबले दो करोड़ टन अनाज अधिक हो जाएगा। आशंका है कि मानसून की पहली बौछार के साथ बर्बादी की शुरुआत हो जाएगी। जिन राज्यों ने जितना बढ़-चढ़कर बंपर पैदावार की उन्हीं का अनाज सबसे ज्यादा सड़ेगा।
Saturday, May 19, 2012
Tuesday, April 3, 2012
किसानों के साथ वादाखिलाफी
| चुनाव के समय मतदाताओं से बड़े-बड़े वादे करने वाली सियासी पार्टियां, सत्ता में आने के बाद किस तरह उनसे वादाखिलाफी करती हैं, हाल ही में यह बात मध्यप्रदेश में सामने आई है। पिछले विधानसभा चुनाव में अपने चुनावी घोषणा-पत्र में किसानों के 50 हजार रुपए तक के कर्ज माफ करने का वादा करने वाली बीजेपी, आज अपने वादे से मुकर गई है। चार साल होने को आए, पर सूबे में यह वादा पूरा होता नहीं दिख रहा। हद तो तब हो गई, जब मध्य प्रदेश विधानसभा के अंदर बीजेपी शासन के मंत्रियों ने ऐसे किसी वादे से अपनी अनभिज्ञता जताई। सहकारिता मंत्री गौरीशंकर बिसेन और उद्योग मंत्री कैलाश विजयवर्गीय दोनों ने ही इस मुद्दे पर विधानसभा में कहा कि सरकार ने किसानों के 50 हजार रुपए की कर्ज माफी का कभी कोई औपचारिक एलान नहीं किया। यानी, अपनी ही पार्टी के चुनावी घोषणा-पत्र को अब सरकार के मंत्री झुठला रहे हैं। सहकारिता मंत्री गौरीशंकर बिसेन ने सरकार का बचाव करते हुए विधानसभा में बचकाना बयान दिया कि कर्ज माफी का वादा पार्टी ने किया था, सरकार ने नहीं। लिहाजा, सरकार जबावदेह नहीं। सहकारिता मंत्री के बयान से जाहिर है कि बीजेपी राज्य में किसानों और उनकी समस्याओं के प्रति कितनी संजीदा है? बीजेपी ने साल 2008 के विधानसभा चुनाव में अपने चुनाव घोषणा-पत्र में किसानों से वादा किया था कि यदि वह सत्ता में आई, तो उनका 50 हजार रुपए तक का कर्ज माफ कर दिया जाएगा। पार्टी ने इस वादे को बाकायदा पचरें में छपवाकर किसानोें के बीच बांटा। यहां तक कि पचरें में उस वक्त के अपने राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह तक का हवाला दिया गया। कर्ज माफी के इस वादे का बीजेपी को खूब फायदा मिला। उसके वायदे पर यकीन कर सूबे के किसानों ने उसको जमकर वोट दिए लेकिन हुकूमत में दोबारा वापिस आते ही सरकार ने अपना वादा भूल गयी। सरकार ने किसानों से तो वादाखिलाफी की ही, केन्द्र से कर्ज माफी के लिए मिले 915 करोड़ रूपए में भी सेंध मार दी। आलम यह है कि सूबे में सहकारी संस्थाओं के घोटालों के चलते किसानों के 115 करोड़ रुपए के कर्ज माफ नहीं हो पाए हैं। इस बात का इकरार खुद सरकार ने किया है। राज्य सरकार की तमाम किसानोन्मुखी योजनाओं के दावों के बीच मध्य प्रदेश में तकरीबन 32 लाख 11 हजार से ज्यादा किसान आज भी कर्ज के बोझ से दबे हैं। खुद सहकारिता मंत्री गौरीशंकर बिसेन ने विधानसभा में इस बात को माना है कि सूबे के किसान जिला सहकारी कृषि व ग्रामीण विकास बैंकों के सात हजार करोड़ रुपए से ज्यादा के कर्जदार हैं। सूबे में औसतन हर किसान पर 14 हजार 218 रुपए के कर्ज का बोझ है। जबकि कडुवी सचाई यह है कि राज्य में 30 फीसद से ज्यादा ऐसे किसान हैं, जिनके पास महज एक से लेकर तीन हेक्टेयर तक ही खेती के काबिल जमीन है। कृषि मामलों के जानकारों का मानना है कि सूबे के 50 फीसद से ज्यादा किसानों पर फिलवक्त संस्थागत कर्ज चढ़ा है। इसके अलावा किसान स्थानीय साहूकारों और बड़े व्यापारियों से भी कर्ज लेते हैं। यह कर्ज ऐसा है, जो उन्हें चैन से जीने नहीं देता। यही वजह है कि मध्य प्रदेश में बीते 10 सालों में किसानों की खुदकुशी के मामलों में लगातार इजाफा हुआ है। इन 10 सालों में यहां तकरीबन 14,155 किसान खुदकुशी कर चुके हैं। राष्ट्रीय अपराध अभिलेख ब्यूरो के आंकड़ों के मुताबिक सूबे में हर दिन चार किसान खुदकुशी करते हैं। साल 2003-04 में पड़े सूखे के बाद से तो यहां आत्महत्या का ग्राफ बढ़ता चला गया है। किसानों को बीज, खाद, पानी और बिजली जैसी खेती की बुनियादी जरूरतें भी नहीं मिल पा रहीं हैं, जिसके चलते वे हताशा में आत्महत्या की तरफ कदम बढ़ा रहे हैं। किसी भी सरकार के लिए इससे ज्यादा अफसोस की बात क्या होगी कि उसके सूबे में किसान आत्महत्याएं करते रहें और वह इस समस्या पर गंभीरता से सोचने की बजाय उसे सिरे से ही खारिज कर दे। इस बात को अभी ज्यादा दिन नहीं गुजरे हैं, जब किसानों की आत्महत्या को कृषि मंत्री रामकृष्ण कुसमरिया ने किसानों का पाप बतलाते हुए अपना पल्ला झाड़ लिया था। जबकि हकीकत यह है कि किसानों की आत्महत्याओं के पीछे प्राकृतिक कारणों से ज्यादा वे कारण जिम्मेदार थे, जिन पर सरकार आसानी से काबू पा सकती थी। घटिया खाद-बीज, नकली कीटनाशक और कर्ज इन किसानों की मौत की बड़ी वजह था। इस बात की तस्दीक हाल में आई राज्य मानवाधिकार आयोग की रिपोर्ट ने भी कर दी है। रिपोर्ट में साफ-साफ तौर पर भ्रष्ट तंत्र, कर्ज और फसल की बर्बादी को किसानों की आत्महत्या का जिम्मेदार ठहराया गया है। राज्य में आज हालत यह है कि यदि जल्द ही किसानों के कर्ज माफ नहीं किए गए तो आत्महत्याओं का ग्राफ और भी बढ़ सकता है। कुल मिलाकर, यह पहली बार नहीं है जब बीजेपी ने सूबे के किसानों के साथ धोखा किया हो। पूर्व मुख्यमंत्री सुंदरलाल पटवा के समय भी बीजेपी ने चुनाव में किसानों से पच्रे भरवाए थे और नारा दिया था, ‘भाजपा का कहना साफ, हर किसान का कर्जा माफ।’ लेकिन जब बीजेपी सरकार में आई, तो यह वादा भूल गई। दिखावे के लिए कुछ कज्रे माफ हुए और बाद में किसानों को ठेंगा दिखा दिया गया। सूबे में कमोबेश यही कहानी शिवराज सरकार, फिर दोहरा रही है। कर्ज माफी के अपने वादे पर अमल करने की बजाए उसके मंत्री हास्यास्पद दलीलें दे रहें हैं। मानो पार्टी और सरकार जुदा-जुदा हों। सरकार यह कहकर अपनी जिम्मेदारियों से नहीं बच सकती कि कर्ज माफी का वादा पार्टी ने किया था, सरकार ने नहीं। चुनाव घोषणा-पत्र पार्टी का लिखित संविधान होता है और सत्ता में आने के बाद उस पर अमल करना उसका कर्त्तव्य। जो पार्टी चुनाव घोषणा-पत्र के आधार पर सत्ता में आती है, उसका जिम्मा बनता है कि वह प्राथमिकता के आधार पर पहले अपने चुनाव घोषणा-पत्र पर अमल करे, न कि उसे खारिज कर दे। वरना, चुनाव घोषणा-पत्र पर कौन यकीन करेगा? |
बुंदेलखंड ने गेहूं उत्पादन में पंजाब को पछाड़ा
डेढ़ दशक से सूखे से जूझ रहे बुंदेलखंड के चित्रकूट से राहत देने वाली खबर है। इंद्रदेव के मेहरबान होने से गेहूं के उत्पादन में प्रति हेक्टेयर इतना उछाल आया कि पंजाब भी पीछे हो गया है। गेहूं, चना, अरहर, सरसों और मसूर का इस साल रिकार्ड उत्पादन हुआ है। उम्मीद है कि खरीफ के मौसम में वह किसान भी खेती-बारी फिर शुरू कर देंगे, जो कृषि से तौबा कर चुके थे। दस साल से जिले में सामान्य वर्षा 830 मिलीमीटर से कम हो रही थी, जिससे किसानों के खेत बंजर पड़े रहते थे। 2009 में तो इतना जबर्दस्त सूखा पड़ा कि किसानों ने खेतों में जो बीज डाला था, वह भी वापस नहीं आया था। इसके बाद जिले के किसानों ने खेती से तौबा कर ली। हालांकि इस साल इंद्रदेव बुंदेलखंड में ऐसे मेहरबान हुए कि कई साल की वर्षा का रिकार्ड टूट गया। जिले में 960 मिमी वर्षा हुई, जबकि इसके पूर्व में मात्र 437 मिलीलीटर वर्षा हुई थी। इससे किसानों का हौसला बढ़ा। उन्होंने कई साल से परती पड़े खेतों में रबी और दलहनी फसलों की बुआई कर डाली। इसका अच्छा परिणाम भी देखने को मिला। जिले के खेतों में गेहूं, चना, सरसों, अरहर और मसूर की फसल लहलहाती रही। कृषि विभाग की मानें तो जिला बनने के बाद चित्रकूट में पहली बार रिकार्ड फसल का उत्पादन हुआ है। आंकड़े बताते हैं कि गेहूं के प्रति हेक्टेयर उत्पादन के मामले में तो पंजाब भी पीछे हो गया है। उप कृषि निदेशक मोहम्मद आरिफ सिद्दीकी ने बताया कि जिले में गेहूं उत्पादन प्रति हेक्टेयर 30 से 32 क्विंटल आया है, जबकि पंजाब में पिछले साल 28 क्विंटल प्रति हेक्टेयर उत्पादन हुआ था। जिले में पिछले साल 17.84 क्विंटल प्रति हेक्टेयर उत्पादन हुआ था। उन्होंने बताया कि चना का भी रिकार्ड उत्पादन होने की संभावना है। क्राफ्ट कटिंग में 16 से 18 क्विंटल प्रति हेक्टेयर का उत्पादन सामने आया है। पिछले साल चना का उत्पादन मात्र 6.08 क्विंटल प्रति हेक्टेयर था। सरसों उत्पादन में भी जबर्दस्त उछाल देखा गया है। उन्होंने 12 क्विंटल प्रति हेक्टेयर के उत्पादन की संभावना व्यक्त की, जो पिछले साल के मुकाबले लगभग सात क्विंटल अधिक है। अरहर उत्पादन भी काफी अधिक हुआ है। सिद्दीकी ने बताया कि उनके अलावा जिलाधिकारी डॉ. आदर्श सिंह ने खुद देखा कि प्रति हेक्टेयर उत्पादन 32 क्विंटल निकला है।
Wednesday, March 14, 2012
कृषि शोध का पिछड़ापन
भारतीय कृषि शोध संस्थान (आइएआरआइ) के स्वर्ण जयंती समारोह को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने प्रयोगशाला से भूमि तक की कमजोर कड़ी पर गहरी चिंता व्यक्त की। उन्होंने भविष्य की चुनौतियों का सामना करने के लिए 12वीं योजना के अंत तक कृषि शोध पर होने वाले खर्च को कृषि जीडीपी के मौजूदा एक फीसदी से बढ़ाकर दो फीसदी करने का आ ान किया। देखा जाए तो कृषि शोध का बहुआयामी प्रभाव पड़ता है। विभिन्न अध्ययनों से प्रमाणित हो चुका है कि कृषि शोध क्षेत्र में खर्च किया गया हर एक रुपया अलग-अलग खाद्यान्न के हिसाब से 1.39 से लेकर 3.66 रुपये तक का प्रतिफल देता है। बागवानी फसलों में तो यह प्रतिफल और भी अधिक होता है। 11वीं योजना में केंद्र द्वारा कृषि शोध पर सार्वजनिक व्यय को 0.7 फीसदी से बढ़ाकर 0.9 फीसदी कर दिया गया। राज्यों के आवंटन को जोड़ें तो यह यह खर्च कृषि जीडीपी के एक फीसदी तक पहुंच जाता है। भले ही यह अनुपात चीन व ब्राजील की भांति न हो, लेकिन इतना भी कम नहीं है कि देश के कृषि शोध संस्थान किसानों की जरूरतों को पूरा न कर सकें। उदाहरण के लिए 2011-12 के लिए भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद का बजट 2800 करोड़ रुपये है। पिछले पांच वषरें में इसमें दो गुनी बढ़ोतरी हो चुकी है। इसके बावजूद देश के किसान बीजों, कृषि विधियों, मशीनरी आदि के लिए विदेशी कंपनियों के मोहताज बने हुए हैं। कुछ अपवादों को छोड़ दिया जाए तो देश के कृषि अनुसंधान केंद्र सफेद हाथी बन चुके हैं। यह ठीक है कि 2005-06 के बाद भारतीय कृषि अच्छा प्रदर्शन कर रही है, लेकिन इस उपलब्धि का श्रेय कृषि शोध संस्थानों के बीज व तकनीक को न होकर ऊंचे समर्थन मूल्य और लोगों की क्रय शक्ति में बढ़ोतरी को जाता है। पिछले एक दशक में आइसीएआर की एकमात्र उपलब्धि पूसा 1121 नामक बासमती धान की किस्म का विकास है, जिससे हर साल देश को 50 अरब रुपये की विदेशी मुद्रा हासिल हो रही है। इससे स्पष्ट है कि बीजों का विकास मुनाफे का सौदा है। अकेले हाइब्रिड बीज का बाजार 8,000 करोड़ रुपये सालाना तक पहुंच गया है। भले ही जीएम तकनीक के उपयोग को लेकर विवाद हो, लेकिन हाईब्रिड को पैदावार बढ़ाने का एक बेहतर उपाय माना गया है। यही कारण है कि देश में हाइब्रिड बीज का बाजार 15 से 20 फीसदी सालाना की दर से बढ़ रहा है। ये कम समय व पानी में अधिक उपज दे रहे हैं। लेकिन सार्वजनिक शोध तंत्र की निष्कि्रयता के चलते निजी क्षेत्र व बहुराष्ट्रीय कंपनियां अपने हाइब्रिड बीज बेचकर मोटा मुनाफा बटोर रही हैं। फिर सरकारी कृषि वैज्ञानिकों के खेत से जुड़ाव घटने के कारण प्रयोगशाला से निकली उपलब्धियों का एक-तिहाई ही किसानों तक पहुंच पाता है। दलहन, तिलहन क्षेत्र में भारत के लगातार पिछड़ने का सबसे बड़ा कारण यही है। गौरतलब है कि इसी आइसीएआर और राज्य कृषि विश्वविद्यालयों के प्रयासों से देश में हरित क्रांति हुई जिससे भारत न सिर्फ खाद्यान्न के मामले में आत्मनिर्भर बना बल्कि अनाज का निर्यात करने में भी सक्षम हुआ। लेकिन आज वही कृषि शोध संस्थान थक चुके हैं जिससे बहुराष्ट्रीय और निजी कंपनियों को घरेलू बीज बाजार पर आधिपत्य जमाने का मौका मिल गया। इसके विपरीत, ब्राजील और चीन के सरकारी शोध संस्थान मजबूती से खड़े हैं और घरेलू कंपनियों के साथ संयुक्त उद्यम स्थापित करके किसानों की जरूरतों के अनुरूप बीजों का उत्पादन कर रहे हैं। आइसीएआर को भी संसाधनों का रोना न रोकर देश की निजी बीज उत्पादक कंपनियों के साथ संयुक्त उद्यम स्थापित करने चाहिए। इससे वह ऊंची पैदावार वाली किस्मों का बड़े पैमाने पर उत्पादन करने में सक्षम होगा और भारतीय किसानों को बीज, तकनीक आदि के लिए बहुराष्ट्रीय कंपनियों का मोहताज नहीं होना पड़ेगा। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)
Saturday, February 18, 2012
फसल भंडारण संकट जल्द दूर होगा
कृषि मंत्री शरद पवार ने कहा कि इस साल बागवानी का रिकार्ड 240 मिलियन टन का रिकार्ड उत्पादन हुआ। इस दौरान 14 हजार करोड़ रुपए का निर्यात किया गया। कृषि मंत्री ने बागवानी वर्ष मनाने की घोषणा करते हुए कहा कि देश में फसल भंडारण का संकट जल्द दूर किया जाएगा। श्री पवार ने शुक्वार को यहां ‘बागवानी वषर्’ की शुरुआत करते हुए कहा, ‘सरकार ने देश में शीतगृहों के आधारभूत विकास से जुड़े मुद्दों पर गौर करने के लिये राष्ट्रीय शीतगृह श्रृंखला विकास केन्द्र स्थापित करने का फैसला किया है। उन्होंने कहा कि इसमें सरकार करीब 25 करोड़ रुपए का निवेश करेगी लेकिन ज्यादा धन उद्योग जगत से ही आएगा। एनसीसीडी शीत भंडार गृहों के लिए जरूरी मानक और नियम कायदे बनाने के साथ-साथ इनसे जुड़े सभी पक्षों के लिए उचित प्रशिक्षण कार्यक्र म चलाएगा। श्री पवार ने कहा कि मंत्रालय ने 12वीं पंचवर्षीय योजना के दौरान डेढ़ करोड़ टन शीतगृह भंडारों की अतिरिक्त क्षमता जोड़ने का फैसला किया है। पिछले योजना में 87.5 लाख टन क्षमता जोड़ने का लक्ष्य रखा गया था। शरद पवार ने इस मौके पर ‘बागवानी वषर्’ की औपचारिक घोषणा की। वर्ष के दौरान बागवानी विकास पर विशेष गौर किया जायेगा। उन्होंने इस मौके पर कहा कि देश में 2.20 करोड हेक्टेयर भूमि पर 24 करोड़ टन से अधिक का रिकार्ड उत्पादन हासिल किया गया। उन्होंने कहा कि बागवानी उत्पादन बढ़ने से फल एवं सब्जियों की प्रति व्यक्ति उपलब्धता बढ़ी है और इसके साथ ही निर्यात भी बढ़ा है जिससे देश को 14,000 करोड़ रुपए की विदेशी मुद्रा हासिल करने में भी मदद मिली है। कृषि सचिव पीके बसु ने इस अवसर पर कहा कि राज्यों को किसानों को अच्छी गुणावत्ता के बीज और दूसरे साधन उपलब्ध कराने चाहिए। बागवानी क्षेत्र में बेहतर प्रदर्शन के लिए हिमाचल प्रदेश, झारखंड, हरियाणा, आंध्र प्रदेश, छत्तीसगढ़, तमिलनाडु, ओडिशा, सिक्किम और मिजोरम को इस अवसर पर पुरस्कृत किया गया।
Tuesday, February 14, 2012
पैदावार बढ़ाने की जरूरत
दिल्ली में आयोजित राज्यों के खाद्य आपूर्ति मंत्रियों के सम्मेलन में संप्रग-2 के दो वरिष्ठ मंत्रियों ने खाद्य सुरक्षा बिल को मुश्किल आश्वासन करार दिया। जहां सब्सिडी बिल के 1.34 लाख करोड़ से 2.34 लाख करोड़ रुपये तक पहुंचने के अनुमान ने वित्तमंत्री प्रणब मुखर्जी की रातों की नींद उड़ा दी है, वहीं कृषि मंत्री शरद पवार को मौजूदा डिलीवरी सिस्टम पर भरोसा नहीं है। शरद पवार की दूसरी चिंता यह है कि सरकार द्वारा खाद्य सुरक्षा बिल को अमली जामा पहनाने की खातिर अधिक अनाज खरीदना पड़ेगा। वैसे तो वर्तमान समय में सालाना सरकारी खरीद खाद्य सुरक्षा बिल की जरूरतों के लिए पर्याप्त है, लेकिन समस्या यह है कि देश में सूखा, बाढ़ और अन्य प्राकृतिक आपदाओं को देखते हुए सरकार के बफर स्टॉक के लिए भी 2.5 करोड़ टन अनाज चाहिए। दूसरी समस्या यह है कि केंद्रीय पूल में सबसे ज्यादा योगदान करने वाले राज्यों में खरीद एजेंसियों द्वारा अब अनाज खरीद की मात्रा बढ़ाने की गुंजाइश कम है। जहां तक उत्पादन का सवाल है तो इसमें क्षेत्र विस्तार की संभावना नहीं है। ऐसे में पैदावार में बढ़ोतरी ही एकमात्र उपाय है। पैदावार में बढ़ोतरी की भरपूर संभावनाएं भी हैं क्योंकि देश की प्रति हेक्टेयर उत्पादकता अभी भी विश्व औसत से पीछे है। फिर देश के वर्षाधीन क्षेत्र विशेषकर पूर्वी भारत में पैदावार अभी भी काफी कम है। ऐसे में जरूरत इस बात की है कि सरकार अनाज उत्पादन और खरीद की धुरी को विकेंद्रित करे। गौरतलब है कि मौजूदा समय में सरकार की खरीद नीति प्रमुख फसलों के अग्रणी उत्पादक राज्यों तक ही सिमटी हुई है। जिन क्षेत्रों में भारतीय खाद्य निगम खाद्यान्न की सीधी खरीद नहीं करता, वहां के किसान अपनी उपज की बिक्री के लिए साहूकारों-महाजनों पर निर्भर हैं। पैदावार बढ़ाने के लिए सरकार पूर्वी भारत में दूसरी हरित क्रांति लाने के लिए प्रयासरत है। लेकिन यह क्रांति तभी कारगर होगी जब पहली हरित क्रांति के कटु अनुभवों से सीख लेते हुए ऐसी तकनीक अपनाई जाए जो न केवल पर्यावरण अनुकूल हो, बल्कि देश के बहुसंख्यक किसानों की पहुंच में भी हो। इस दिशा में सघन धान तकनीक ने उम्मीद की किरण दिखाई है, जिसके बल पर बिहार के नालंदा जिले ने धान उत्पादन में चीन का रिकॉर्ड तोड़ दिया। सघन धान तकनीक (सिस्टम ऑफ राइस इंटेसिफिकेशन अथवा श्री पद्धति) का आविष्कार 1983 में मेडागास्कर के हेनरी डी लौलानी ने किया था, इसलिए इसे मेडागास्कर पद्धति भी कहा जाता है। पारंपरिक धान की खेती में फसल को पानी के माध्यम से पोषण दिया जाता है। इस पद्धति में खेतों में पानी भरा होने के चलते हवा और धूप की पहुंच कम होती है, जिससे रासायनिक खाद के जरिए पौधों को ज्यादा पोषण देने की कोशिश की जाती है। दूसरी ओर श्री पद्धति के अंतर्गत पौधों को हवा, धूप और मिट्टी के माध्यम से ज्यादा पोषण पहुंचाने की कोशिश की जाती है। इसमें कंपोस्ट खाद का प्रयोग करने की सलाह दी जाती है। इस पद्धति के अंतर्गत बेहतर पोषण के कारण पौधे काफी स्वस्थ होते हैं और प्रति पौधे धान का उत्पादन काफी ज्यादा होता है। पारंपरिक खेती के अंतर्गत एक किलो धान उगाने के लिए जहां 3,000 से 5,000 लीटर पानी की जरूरत होती है वहीं श्री पद्धति में इसका करीब आधा पानी ही लगता है। इस प्रकार कम भूमि, श्रम, पूंजी और पानी लगने के बावजूद पैदावार में तीन गुना तक बढ़ोतरी हो जाती है। सबसे बड़ी बात यह है कि इसमें बीजों की प्रचलित किस्मों का ही उपयोग कर पैदावार बढ़ाई जा सकती है। धीरे-धीरे पूरे देश में लोकप्रिय हो रही इस तकनीक को अपनाकर बिहार के नालंदा जिले के दरवेशपुरा गांव के किसान सुमंत कुमार ने एक हेक्टेयर में 224 क्विंटल धान पैदा कर विश्व रिकॉर्ड बनाया। सुंमत कुमार के साथ चार अन्य किसानों ने प्रति हेक्टेयर 192 से 202 क्विंटल धान पैदा किया। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)
Friday, December 16, 2011
बिचौलियों से मुक्त नहीं फसल की खरीद
सरकार और व्यापार का खेती और किसानों को लेकर क्या नजरिया है, बीते दिनों की कुछ घटनाओं से भारत की कृषकीय दशा को समझा जा सकता है। संसद में एक प्रश्न के जवाब में सरकार ने स्वीकारा है कि अकेले विदर्भ में 2007 से लेकर 2010 तक 1118 किसानों ने आत्महत्या की है। यह संख्या उन किसानों की है जो किसी न किसी रूप से प्रधानमंत्री राहत कोष के लाभार्थी थे। यानी साफ है कि किसानों को दिये जाने वाले पैकेज का तात्कालिक या दीर्घकालिक फायदा नजर नहीं आया। ऐसे में सवाल है कि क्या वाकई सरकारी कवायद किसानों के व्यापक हित के लिए पर्याप्त है। किसानों की वर्तमान स्थिति समझने के लिए दो उदाहरण पर्याप्त हैं। पहला तमिलनाडु का है जहां सरकार ने घोषणा की है गरीबों को एक रुपए की कीमत पर चावल उपलब्ध होगा। गरीब लोगों को कम दर पर अनाज जरूर मिले लेकिन अनाज उत्पादक किसान नजरअंदाज न हों। दरअसल सस्ती दर पर अनाज देने की राजनीतिक होड़ का खमियाजा किसान उठा रहे हैं। आंकड़े बताते हैं कि जिन राज्यों में सस्ती दर पर अनाज देने की प्रक्रिया शुरू हुई है और सब्सिडी में कटौती की गई है उसी के बाद से किसानों की आत्महत्या की घटनाओं में इजाफा हुआ है। सस्ती दर पर अनाज उपलब्ध करवाने के लिए अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं ने भी सहयोग दिया है। काबिलेगौर है कि यही संस्थाए कृषि क्षेत्र को सब्सिडी दिए जाने का लगातार विरोध भी करती आई हैं। जो आलू बाजार में सामान्यत: 12 रुपये किलो के भाव मिलता है, उसे किस मजबूरी के तहत किसान एक रुपये किलो बेचने के लिए मजबूर है। बिहार उत्तर प्रदेश में आलू उत्पादक किसानों की यह बड़ी समस्या है। अकेले विदर्भ के 46 लाख कपास उत्पादक किसान, देश के लाखों आलू और गन्ना उत्पादक किसान सरकार की अनुचित खरीद पण्राली का दंश झेल रहे हैं। यह विडम्बना ही कही जाएगी कि जब भारत जैसे देश में खेती पर सब्सिडी लगातार कम की जा रही है, अमेरिका, चीन और हमसे कहीं छोटे अफ्रीकी देशों की अर्थव्यवस्थाओ में खेती पर सब्सिडी बढ़ाई जा रही है। पूंजीवादी मॉडल पर चलने वाले अमेरिका की खेती पर सब्सिडी 25 हजार करोड़ रुपए तक पहुंच गई है। खेती को लेकर सरकार की संकीर्ण सोच महाराष्ट्र के गन्ना किसानों के आंदोलन से भी तय होती है। हालांकि फ्री मार्केट के पैरोकारों द्वारा चलाए गए इस आंदोलन के पीछे शुगर मिलों की चीनी निर्यात की मांग काम कर रही थी। आंदोलन के बाद सरकार ने रिकवरी के आधार पर गन्ने के मूल्य तय किये। परिणामस्वरूप पश्चिम महाराष्ट्र, मराठवाड़ा और विदर्भ को गन्ने की रिकवरी के आधार पर 2050,1850 और 1800 रुपए का मूल्य दिया गया। तर्क दिया गया कि पश्चिम महाराष्ट्र में करीब 12 से 13 प्रतिशत शक्कर की रिकवरी होती है। यानी एक क्ंिवटल गन्ने में से 13 किलो चीनी। साथ ही इथेनॉल जैसे अन्य उत्पाद भी निकलते हैं। इसके पीछे का तर्क तकनीक रूप से सही हो सकता है लेकिन मूल्य निर्धारण करने वालों को सोचना चाहिए कि शक्कर कम निकलती है तो उसमें किसान का क्या दोष? दरअसल सरकार की ओर से अब तक समेकित कृषि योजनाएं नहीं बन सकी हैं। मूलभूत सुविधा देने की बजाए ब्यूरोक्रेट्स की लूट के लिए पैकेज बनाए जाते हैं। सब्सिडी देने की जगह सस्ती दर पर अनाज बेच कर किसान को भुखमरी के कगार पर पहुंचा दिया जाता है। बिजली की जगह बीजों के दाम बढ़ाए जाते हैं। उपज खरीद अब तक बिचौलियों से मुक्त नहीं हो पाई है। नियंताओं को विचार करना चाहिए कि आखिर गलती कहां है?
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