Wednesday, June 20, 2012

सवा करोड़ टन अनाज बर्बादी के कगार पर


गेहूं-धान को लेकर समस्या बढ़ती जा रही है। गोदाम भरे हुए हैं और बंपर पैदावार ने सरकारी खरीद केंद्रों के मैदानों को भी भर दिया है। अकेले हरियाणा में 44 लाख टन गेहूं खुले में हैं और सरकार ने भंडारण में हाथ खड़े कर दिए हैं। अनुमान के अनुसार, देश में करीब एक करोड़ टन खाद्यान्न खुले में पड़ा है। मानसून पूर्व की बारिश ने एक लाख टन खाद्यान्न बर्बाद भी कर दिया है, भारी बर्बादी तय मानी जा रही है। यूपी में हजारों क्विंटल गेहूं खुले आसमान के नीचे भगवान भरोसे पड़ा है। सोमवार की मामूली बारिश से कई जिलों में करीब एक लाख टन गेहूं भीग गया। गाजीपुर में दस हजार क्विंटल, जौनपुर में 45 हजार, फतेहपुर में 10 हजार टन, लखीमपुर खीरी, मैनपुरी में हजारों क्विंटल गेहूं भीग चुका है। कौशांबी में क्रय केंद्रों के बाहर पड़ा पांच हजार क्विंटल गेहूं आगाह किए जाने के बाद भी गीला हो गया। प्रतापगढ़ में गेहूं को भीगने से बचाने का फरमान पहली बरसात में ही बह गया। अलीगढ़, आगरा, मुरादाबाद, इलाहाबाद कानपुर, गोरखपुर, हाथरस, नोएडा, कुशीनगर, संत कबीरनगर, महराजगंज, देवरिया, हरदोई, इटावा, औरैया, फर्रुखाबाद, बांदा, बाराबंकी, सीतापुर, में लाखों क्विंटल गेहूं खुले में रखा है। पूरे प्रदेश में इस समय करीब 20 लाख टन अनाज खुले में पड़ा है। हरियाणा में 84 लाख टन की खरीद : गेहूं के केंद्रीय पूल में सर्वाधिक योगदान देने वाले हरियाणा में इस बार गेहूं की बड़े पैमाने पर बर्बादी की आशंका हैं। मंडियां अटी पड़ी हैं और गेहूं की 84 लाख टन रिकॉर्ड खरीद हो चुकी है। भंडारण क्षमता 40 लाख टन की है। 44 लाख टन खाद्यान्न खुले में रखा है। पूरे गेहूं के भंडारण में सरकार ने हाथ खड़े कर दिए हैं। पंजाब में 30 लाख टन खुले में : पंजाब में भंडारण का उचित इंतजाम न होने से करीब 30 लाख टन गेहूं खुले में पड़ा है। चालू वर्ष में सूबे में 13 लाख टन गेहूं की खरीद हुई है। पिछले वर्ष करीब 52 लाख टन गेहूं खुले में रखा था। इसे हटवाने के बाद इस साल नई खरीद हुई थी। बंद पड़े गोदामों में पहले ही लाखों टन गेहूं सड़ चुका है। बिहार, झारखंड में लाखों टन खुले में : बिहार में आरा, औरंगाबाद, बेगूसराय, दरभंगा, भभुआ, बिहारशरीफ, बक्सर, छपरा, गया, गोपालगंज, हाजीपुर, जहानाबाद, नवादा, सासाराम, सीतामढ़ी और सिवान में भी गेहूं व धान खुले में पड़ा है। सीतामढ़ी में रखा हजारों क्विंटल धान सड़ भी चुका है। झारखंड के सरकारी खरीद केंद्रों का भी बुरा हाल है। धनबाद में शुरुआती बारिश में ही धान की भारी बर्बादी हो चुकी है। मप्र व राजस्थान में बुरा हाल : राजस्थान में भी पांच सौ टन से ज्यादा अनाज बर्बाद हो चुका है। बर्बादी की सूचना मध्य प्रदेश से भी है। दोनों प्रदेशों में करीब 15 लाख टन खाद्यान्न खुले में पड़ा है।

Wednesday, May 23, 2012

गेहूं-निर्यात में बढ़ते कदम

सरकार ने केंद्रीय पूल से गेहूं निर्यात की प्रक्रिया शुरू कर दी है। स्टेट ट्रेडिंग कारपोरेशन (एसटीसी) ने केंद्रीय पूल से गेहूं निर्यात के लिए निविदा मंगाई है। इसमें विदेशी आयातक ही भाग ले सकेंगे और विपणन सीजन 2011-12 और 2012-13 का ही गेहूं निर्यात होगा। बंदरगाह पर न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) पर गेहूं उपलब्ध होगा। गेहूं निर्यात पर विचार इसलिए हो रहा है, क्योंकि खरीद में सुस्ती और विभिन्न रुकावटों के कारण कोई दो करोड़ टन गेहूं सड़ने की स्थिति में है। इस साल 9.02 करोड़ टन के रिकॉर्ड उत्पादन का अनुमान है। जहां तक सरकारी गोदामों का सवाल है, वे फिलहाल अनाज से अटे हैं। केंद्रीय पूल में 1 अप्रैल 2012 को 543.36 लाख टन खाद्यान्न का स्टॉक था। इसमें करीब 200 लाख टन गेहूं है। चालू सीजन में सरकारी खरीद का लक्ष्य 318 लाख टन है। खुले बाजार में गेहूं का दाम न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) से कम है इसीलिए सरकारी केंद्रों पर ज्यादा गेहूं जा रहा है। ऐसे में सरकारी खरीद 335 लाख टन से भी ज्यादा होने का अनुमान है। गेहूं निर्यात के प्रस्ताव को मंजूरी मिल जाने से छह साल में पहली बार भारत सरकारी गेहूं भंडार को बेचने के लिए निर्यात बाजार का सहारा ले रहा है। हालांकि गेहूं का बड़े पैमाने पर निर्यात आसान नहीं है क्योंकि वैिक अनाज बाजार में सभी प्रमुख गेहूं निर्यातक- रूस, ऑस्ट्रेलिया व यूक्रेन आदि देशों के पास भारी भरकम अनाज का भंडार है। गुणवत्ता के मामले में भी भारतीय गेहूं दूसरे निर्यातक देशों के मुकाबले कमजोर है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में भारत के मुकाबले यूक्रेन, रूस और ऑस्ट्रेलिया का गेहूं सस्ता भी है। फिर भी युगांडा, अफगानिस्तान, पाकिस्तान, बांग्लादेश, दुबई, और खाड़ी देशों को गेहूं की जरूरत है, लिहाजा इन देशों में भारतीय गेहूं के लिए बाजार हो सकता है। अब केंद्रीय पूल से गेहूं के निर्यात में भी सबसे बड़ी समस्या वित्तीय प्रबंधन की हो सकती है। क्योंकि गेहूं की खरीद व भंडारण की लागत साल 2012-13 में करीब 18.22 रु पये प्रति किलोग्राम रहने की संभावना है, वहीं अमेरिकी गेहूं की वैिक औसत कीमतें जनवरी-मार्च के दौरान 15.06 रुपये प्रति किलोग्राम थीं। यह भी उल्लेखनीय है कि सरकार ने सितम्बर, 2011 में गेहूं निर्यात पर रोक हटाई थी तथा निर्यातकों को खुले बाजार से गेहूं खरीद कर निर्यात की अनुमित दी थी, लेकिन अंतरराष्ट्रीय बाजार में भारतीय गेहूं महंगा होने के कारण सितम्बर से अब तक 7.2 लाख टन गेहूं का ही निर्यात हो पाया है। इस साल भारत के लिए गेहूं का निर्यात करना इसलिए भी जरूरी है ताकि केंद्रीय पूल में नए स्टॉक के लिए जगह बन सके। यदि गेहूं का निर्यात नहीं हुआ, तो कई परेशानियां पैदा हो सकती हैं। ज्यादातर राज्यों में भी अनाज भंडारण क्षमता के मामले में स्थिति अच्छी न होने के कारण किसान धरने-प्रदर्शन पर उतर आए हैं। वे मजबूरी में आढ़तियों को एमएसपी से कम भाव पर अपना गेहूं बेच रहे हैं। सरकार ने इस बार गेहूं का एमएसपी 1285 रु पये प्रति क्ंिवटल तय किया है। गौरतलब है कि कुल स्टॉक के मुकाबले भंडारण क्षमता काफी कम होने के कारण चालू सीजन 2012-13 में सरकार को लगभग पचास फीसद खाद्यान्न गोदामों के बाहर खुले आसमान के नीचे आधे- अधूरे तिरपालों के सहारे ही रखना होगा। निश्चित रूप से गेहूं के निर्यात से जहां भंडारण की कमी से संबंधित चुनौती से कुछ तात्कालिक बचाव होगा, वहीं किसानों को भविष्य में फसल की बिक्री और अच्छे मूल्य की आशा बंधेगी। मार्च 2012 में संसद में पहली कृषि समीक्षा में भी भंडारण की आवश्यकता पर जोर झलका है। छोटे किसानों के लिए भंडारण की और ज्यादा जरूरत है। भंडारण सुविधा के लिए बड़े पैमाने पर निवेश की आवश्यकता है। यद्यपि सरकार ने यह जरूरत पूरा करने के लिए वेयरहाउसिंग सेक्टर में 100 फीसद प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की अनुमति भी दे रखी है और विभिन्न टैक्स रियायतें देकर निवेशकों को प्रोत्साहित करने का प्रयास भी किया जा रहा है। लेकिन निवेशकों के कदम वेयरहाउसिंग सेक्टर की ओर धीमी गति से बढ़ रहे हैं। चूंकि पर्याप्त खाद्यान्न भंडारण का संबंध अच्छी विदेशी मुद्रा की कमाई से भी जुड़ गया है अत: खाद्यान्न भंडारण की अच्छी व्यवस्था से खाद्यान्न निर्यात करके खाली होते हुए विदेशी मुद्रा भंडार को भी भरा जा सकेगा। अच्छे खाद्यान्न भंडारण द्वारा यूरो और डॉलर की कमाई विदेशी मुद्रा भंडार को बढ़ाने में मददगार हो सकती है। अच्छी भंडारण क्षमता और खाद्यान्न की उत्पादकता बढ़ाकर खाद्यान्न के निर्यात को विदेश व्यापार का प्रमुख अंग भी बनाया जा सकता है। देश में खाद्यान्न उपलब्धता का वर्तमान परिदृश्य चिंताजनक है। खाद्य एवं कृषि संबंधी कुछ नए वैिक अध्ययन संदेश दे रहे हैं कि भारत में छोटे किसानों को खुशहाल बनाने पर सबसे अधिक ध्यान देना होगा। इस संदर्भ में सी रंगराजन समिति की रिपोर्ट उल्लेखनीय है जिसमें कहा गया कि देश के 4 करोड़ 60 लाख छोटे किसानों को पर्याप्त भंडारण सुविधा, आसान कर्ज और खेती के समुचित संसाधन उपलब्ध नहीं हैं। अब देश में कृषि बाजारों का आधुनिकीकरण किए जाने और उन्हें बहुवांछित बुनियादी ढांचा मुहैया कराने की भी महती आवश्यकता है। यह भी ध्यान देना होगा कि खाद्य सुरक्षा के लिए हम जिस तरह गेहूं और चावल की उत्पादकता बढ़ाने की योजना बना रहे हैं, उसी अनुपात में उन्हें रखने के लिए माकू ल भंडारण सुविधा भी स्थापित करनी होगी। इस कार्य में आने वाली अड़चनों को रोकना होगा। यह ध्यान देना होगा कि भारत से खाद्यान्न निर्यात के लिए प्रतिस्पर्धी देशों के समकक्ष निर्यात की रणनीति तैयार हो। उम्मीद की जानी चाहिए कि देश में कृषि सुधारों के तहत खाद्यान्न उत्पादकता वृद्धि, वेयरहाउसिंग सेक्टर के आधुनिकीकरण तथा भारतीय कृषि सेक्टर को मजबूत आधार दिया जाएगा और खाद्यान्न निर्यात को देश के निर्यात का एक अभिन्न अंग बनाया जाएगा। तभी खाद्यान्न सुरक्षा और किसान का सबलीकरण हो सकता है।

बंपर पैदावार, किसान फिर भी कंगाल


भारी-भरकम सरकारी अमले के बावजूद एक ओर गरीबों को दो जून की रोटी मयस्सर नहीं है, वहीं दूसरी और अनाज का सड़ना नियति बनता जा रहा है। गेहूं के बंपर उत्पादन, खरीद में सुस्ती और उसके भंडारण के लिए उपयुक्त व्यवस्था न होने से उसके सड़ने की खबरें आने लगी हैं। खाद्य मंत्रालय की हालिया रिपोर्ट के मुताबिक पिछले साल पंजाब में 70,000 टन गेहूं उचित रखरखाव के अभाव में बरबाद हो गया। स्थिति की गंभीरता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि केंद्र सरकार राज्यों को गेहूं खरीद के लिए पर्याप्त बोरे भी उपलब्ध नहीं करा पा रही है। खरीद प्रक्रिया धीमी होने के कारण उन्हें मजबूरी में आढ़तियों को न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) से कम कीमत पर गेहूं बेचना पड़ रहा है। जिन राज्यों में एफसीआइ की खरीद का नेटवर्क नहीं है, वहां तो किसान पूरी तरह महाजनों-साहूकारों की दया पर निर्भर हो चुके हैं। खाद्य मंत्रालय ने चालू खरीद सीजन में कुल 3.18 करोड़ टन गेहूं खरीदने का लक्ष्य निर्धारित किया है, लेकिन जमीनी सच्चाई यह है कि भारतीय खाद्य निगम (एफसीआइ) के पास भंडारण के लिए जितने गोदाम हैं, वे पिछले सालों के गेहूं और चावल से भरे पड़े हैं और लाखों टन अनाज अब भी खुले में बने अस्थायी गोदामों में रखा पड़ा है। नियमों के मुताबिक तिरपाल से ढके अस्थायी गोदामों में रखा अनाज हर हाल में सालभर के भीतर खाली करा लिया जाना चाहिए, लेकिन महंगाई से भयाक्रांत सरकार ने गेहूं निर्यात की अनुमति देने में देर कर दी। इसका परिणाम यह हुआ कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में ऑस्ट्रेलिया, रूस और यूक्रेन का गेहूं आ जाने से भारतीय गेहूं का निर्यात लाभकारी नहीं रह गया। भंडारण के संबंध में एक दुर्भाग्य पूर्ण बात यह है कि देश में उपलब्ध भंडारण क्षमता के 76 फीसद का ही उपयोग हो पा रहा है, जबकि उपयुक्त योजना के अभाव में 24 फीसदी खाली पड़ा है। इस समय देश में 720 लाख टन अनाज भंडार है, जो सामान्य रणनीतिक रिजर्व और बफर स्टॉक की सीमा (320 लाख टन) से ज्यादा है। एफसीआइ के आंकड़ों के मुताबिक इस अतिरिक्त भंडार में अनाज के रखरखाव की लागत लगभग पांच रुपये प्रति किलो है। इस हिसाब से देखा जाए तो इस अतिरिक्त 400 लाख टन का रखरखाव खर्च लगभग 20,000 करोड़ रुपये है। अगर सरकार इस अनाज का निर्यात करती है तो 20,000 करोड़ रुपये की लगात तो बचेगी ही, जगह भी निकल आएगी। इससे नए अनाज के भंडारण की समस्या अपने आप दूर हो जाएगी। देर से ही सही, अब सरकार ने केंद्रीय पूल से गेहूं निर्यात के लिए निविदा मांगी है। इसमें विदेशी आयातक ही भाग ले सकेंगे और निर्यात कांडला और मुंद्रा बंदरगाहों से होगा। निर्यात विपणन सीजन 2011-12 और 2012-13 के गेहूं का होगा। हालांकि निविदा में निर्यात की मात्रा और कीमत तय नहीं है, लेकिन अंतरराष्ट्रीय बाजार में गेहूं की कम कीमतों को देखें तो बिना निर्यात सब्सिडी के गेहूं का निर्यात संभव नहीं होगा। चालू फसल सीजन में 25.26 करोड़ टन खाद्यान्न उत्पादन होने का अनुमान है, जिसमें मुख्य हिस्सेदारी गेहूं और धान की होगी। देखा जाए तो भंडारण समस्या की मूल वजह गेहूं और धान केंद्रित कृषि रणनीति ही है। आज ये फसलें निश्चित रिटर्न के चलते नकदी फसलों में तब्दील हो चुकी हैं, लेकिन दलहनों, तिलहनों और मोटे अनाजों की खेती घाटे का सौदा बनी हुई है। ऐसे में यदि गेहूं, धान किसानों को उनकी उपज की वाजिब कीमत नहीं मिली तो इस मामले में भी देश का हाल खाद्य तेल और दालों जैसे ही होगा। गौरतलब है कि उदारीकरण की नीतियों के तहत जब देश में सस्ता पामोलिव-सोयाबीन तेल आयात होने लगा तब सरकार ने तिलहनों की खरीद से मुंह फेर लिया, जिसका परिणाम हुआ कि खाद्य तेल आयात तेजी से बढ़ा। जो देश 1993 तक खाद्य तेलों के मामले में लगभग आत्मनिर्भर था, वही आज दुनिया का सबसे बड़ा खाद्य तेल आयातक बन चुका है। 2011-12 में 94 लाख टन खाद्य तेल का आयात किया गया, जिसके लिए सरकार को 35,000 करोड़ रुपये चुकाने पड़े। यह धनराशि सरकार की बहुचर्चित योजना मनरेगा के साल भर के आवंटन के बराबर है। इसी प्रकार सरकार हर साल 5000 करोड़ रुपये की 25 से 30 लाख टन दालों का आयात करती है। एक ओर सरकार पूर्वी भारत में खाद्यान्नों की पैदावार बढ़ाने के लिए दूसरी हरित क्रांति लाने में जुटी हुई है, वहीं दूसरी ओर इन राज्यों के किसानों के लिए खेती घाटे का सौदा बनी हुई है। सरकार हर साल करीब 14,000 केंद्रों से अनाज की खरीद करती है, लेकिन देश के दर्जन भर राज्य ऐसे हैं, जहां एफसीआइ खरीद नहीं कर पाती। इससे किसानों को सस्ती दरों पर अनाज खुले बाजार में बेचना पड़ता है। इसी को देखते हुए कृषि लागत एवं मूल्यन आयोग ने सरकार को सुझाव दिया है कि किसानों से खाद्यान्न की खरीद में एफसीआइ के साथ निजी क्षेत्र का भी सहयोग लिया जाना चाहिए। जब गोदाम बनाने में निजी क्षेत्र की मदद ले रहे हैं तो अनाज खरीद में संकोच क्यों? खरीद-भंडारण नीति को विकेंद्रित करने के उद्देश्य से भंडारण (विकास एवं विनियमन) अधिनियम 2007 के तहत सरकार ने 25 अक्टूबर 2010 को भंडारण विकास एवं नियामक प्राधिकरण (डब्ल्यूडीआरए) का गठन किया है। इसका उद्देश्य अनाज के खरीद-भंडारण क्षेत्र में निजी क्षेत्र को बढ़ावा देना है। डब्ल्यूडीआरए स्थानीय करों, स्टॉक सीमा जैसे व्यापारिक बाधाओं को दूर करने के साथ-साथ भंडारण क्षमता बढ़ाने हेतु निजी-सार्वजनिक भागीदारी (पीपीपी मॉडल) के तहत दस साल की गारंटी स्कीम बनाई है। इसके तहत पिछले तीन सालों में सरकार ने 1.50 करोड़ टन क्षमता वाले गोदामों के निर्माण की योजना बनाई है, लेकिन जमीनी हकीकत इसके उलट है, क्योंकि 2011 तक मात्र 89 लाख टन क्षमता के गोदामों टेंडर फाइनल किए गए हैं। इन गोदामों के तैयार होने में अभी कई साल लगेंगे। भंडारण क्षमता बढ़ाने में राज्य सरकारों का असहयोग भी एक बड़ी बाधा बन चुका है। सरकार ने 1 अप्रैल 2011 में ग्रामीण भंडारण योजना की शुरुआत की, लेकिन उसे भी अपेक्षित सफलता नहीं मिल पा रही है। देखा जाए तो खाद्यान्न भंडारण के लिए जगह की व्यवस्था करना एक बड़ी चुनौती है। इसका कारण है कि खाद्यान्नों के उत्पादन और सरकारी खरीद में वृद्धि के बावजूद सरकार भंडारण क्षमता बढ़ाने के मुद्दे पर आंख बंद किए रही। उसकी नींद तभी टूटी, जब स्थिति विस्फोटक हो गई। फिर सरकार की खरीद और भंडानरण नीति बेहद केंद्रीकृत रही है। अभी तक अनाज उत्पादक क्षेत्रों में ही भंडारण सुविधा बनाने की नीति रही है, अब इसे बदलकर खपत केंद्रों को आधार बनाना होगा। इससे अनाज की अचानक ढुलाई और कीमतों में उतार-चढ़ाव की समस्या से मुक्ति मिलेगी। भंडारण समस्या से निपटने के लिए फिर अनाज के भंडारण को गेहूं, चावल के चक्र से मुक्ति दिलाकर विविधीकृत करना होगा। 

Saturday, May 19, 2012

पंजाब में सड़े अनाज से बनेगी शराब


पंजाब के गोदामों और अनाज भंडारण के लिए खुले में बनाई गई प्लींथों पर रखे हुए अनाज का एक हिस्सा अब देश में गरीब का निवाला नहीं बन पाएगा। इस पर नॉट फिट फॉर हयूमन कंजंप्शन का ठप्पा लग चुका है। केंद्र सरकार की भंडारण नीति और रेलवे की अनाज ढुलाई गति इस सड़े अनाज को अमीर के प्याले में डालने वाली है, वो भी भारी सब्सिडी के साथ। शराब पर चाहे जितना आबकारी कर लग रहा हो पर इसे बनाने वाली कंपनियों को पंजाब में सड़ चुका करीब 47 हजार टन अनाज इस साल सब्सिडी के साथ अथवा बाजार भाव से एक तिहाई दामों पर मिलने वाला है। अगले साल भी ग्रेन बेस शूगर फ्री व्हीस्की अथवा सस्ती वोदका बनाने वाली किसी कंपनी को कच्चे माल की कमी न आए, इसका प्रबंध भी सरकार ने कर दिया है। यही नहीं चार से पांच हजार टन सड़ा अनाज अगले साल भी नीलाम किया जाएगा। संभव है तब तक हमारी व्यवस्था प्रकृति की आड़ में कुछ ऐसे और इंतजाम कर दे कि फिर आने वाले सालों में भी कमी न आने पाए। राज्य सरकार की अनाज खरीद एजेंसियों की तालमेल कमेटी के चेयरमैन भुपिंदर सिंह कहते हैं कि खराब होने वाली गेहूं का आंकड़ा आधा से एक फीसद ही है। इसे बढ़ा चढ़ाकर दिखाया जा रहा है, लेकिन अगर अनाज खराब हुआ है तो जिम्मेदारी भी तय होनी चाहिए, पर आप इसे सिर्फ कर्मियों के सिर पर नहीं थोप सकते। केंद्र सरकार के मापदंड के अनुसार गेहूं की सेल्फ लाइफ नौ महीने है, पर पंजाब के गोदामों में 2009 का गेहूं भी पड़ा है। 2005 में मामला सर्वोच्च न्यायालय तक जाने के बाद एफसीआइ ने एक साल में ही गेहूं उठवाने की बात स्वीकार की थी, पर अब फिर हालात वहीं के वहीं आ गए हैं। वहीं, पंजाब में एकबारगी सड़कों पर खराब होते धान को ठिकाने लगाने के लिए नई तकनीक की तलाश कर सस्ती बीयर बनाने का विचार भी यहां के नेता दे चुके हैं। वर्ष 2002 के बाद चलाए गए डाइवर्सिफिकेशन अभियान के दौरान कहा गया कि द्वि-फसलीय चक्र ने जौ व गन्ने की खेती के अधीन रकबा खत्म कर दिया है और हम धान की पैदावार इतनी बढ़ा चुके हैं कि संभल नही रहा। तर्क दिया गया कि हिमाचल प्रदेश के दूरदराज के पहाड़ी क्षेत्रों में फल उगते ज्यादा हैं पर मैदानों तक लाना खासा मंहगा हो जाता है। ऐसे में वहां की सरकारों ने वाइन पालिसी बनाई और राजस्व बढ़ाने के साथ रोजगार भी उपलब्ध करवा दिया। हाल ही के वर्षो का उदाहरण दे उक्त खुलासे के साथ सोशल साइंसेज एंड हेल्थ फोरम के डा.पीपी खोसला कहते हैं कि पंजाब के अनाज और देश के हालात को आप इस तरह से नहीं देख सकते। आपको अनाज सड़ने से रोकने के ही उपाय करने होंगे। या तो आप जमीन की कीमत के आधार पर गोदामों का किराया बढ़ाएं या फिर जहां सस्ते गोदाम हैं वहां मानसून आने से पहले गेहूं ले जाएं। डा.खोसला कहते हैं कि गेहूं और धान ही क्यों खराब होता है? केंद्र के संस्थान एफसीआइ का चावल तो कभी नहीं सड़ता।

दो करोड़ टन गेहूं सड़ने की नौबत


केंद्र और राज्य सरकारों की सुस्ती के कारण किसानों को अधिक अन्न उपजाने की सजा मिलने के आसार बनते दिख रहे हैं। खून-पसीना बहाकर पैदा किया अन्न अब किसान आंखों के सामने सड़ते देखेंगे। यही नहीं साढ़े आठ करोड़ टन से ज्यादा रिकार्डतोड़ फसल पैदा करने के बाद भी किसानों की जेब खाली रहेगी और गरीबों के पेट पहले की तरह ही भूखे। चूहे-कीड़े-मकोड़े खुले में सड़ता अनाज पहले जमकर छकेंगे और उसके बाद चांदी होगी तो शराब निर्माताओं की, क्योंकि किसानों के नाम पर कसमें खाने वाली सरकारों के पास उसकी फसल को रखने के इंतजाम ही नहीं हैं। इसके कारण दो करोड़ टन गेहूं बर्बाद होना तय है। केंद्रीय खाद्य मंत्री केवी थॉमस ने स्वीकार किया कि अन्न की ज्यादा पैदावार और भंडारण क्षमता में भारी अंतर बन गया है। उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों को खाद्यान्न भंडारण का अनुभव न होने से स्थितियां और खराब हो सकती हैं। अस्थायी व पक्के गोदामों में छंटाकभर अनाज रखने की जगह नहीं है। देश की बड़ी मंडियों में लाखों टन गेहूं खुले में जमा हो चुका है। उसे तिरपाल तक से ढकने की सुविधा नहीं है। एक जून तक 3.18 करोड़ टन गेहूं भंडारण का लक्ष्य है, लेकिन केंद्र ने हाथ खड़े कर भंडारण की जिम्मेदारी गेहूं उत्पादक राज्यों पर डाल दी है। सरकारी गोदामों में गुरुवार तक 7.80 करोड़ टन खाद्यान्न जमा हो चुका है। इसमें 3.00 करोड़ टन चावल और बाकी 2.30 करोड़ टन गेहूं है। उनमें पिछले सालों का लगभग 70 लाख टन पुराना अनाज भी भरा पड़ा है। देश में कुल 6.38 करोड़ टन खाद्यान्न भंडारण की क्षमता है। पंजाब, हरियाणा, उप्र और मप्र में रोजाना 10 लाख टन गेहूं आ रहा है। मंत्रालय के अनुमान के मुताबिक 1 जून 2012 तक इस क्षमता के मुकाबले दो करोड़ टन अनाज अधिक हो जाएगा। आशंका है कि मानसून की पहली बौछार के साथ बर्बादी की शुरुआत हो जाएगी। जिन राज्यों ने जितना बढ़-चढ़कर बंपर पैदावार की उन्हीं का अनाज सबसे ज्यादा सड़ेगा। 

Tuesday, April 3, 2012

किसानों के साथ वादाखिलाफी



चुनाव के समय मतदाताओं से बड़े-बड़े वादे करने वाली सियासी पार्टियां, सत्ता में आने के बाद किस तरह उनसे वादाखिलाफी करती हैं, हाल ही में यह बात मध्यप्रदेश में सामने आई है। पिछले विधानसभा चुनाव में अपने चुनावी घोषणा-पत्र में किसानों के 50 हजार रुपए तक के कर्ज माफ करने का वादा करने वाली बीजेपी, आज अपने वादे से मुकर गई है। चार साल होने को आए, पर सूबे में यह वादा पूरा होता नहीं दिख रहा। हद तो तब हो गई, जब मध्य प्रदेश विधानसभा के अंदर बीजेपी शासन के मंत्रियों ने ऐसे किसी वादे से अपनी अनभिज्ञता जताई। सहकारिता मंत्री गौरीशंकर बिसेन और उद्योग मंत्री कैलाश विजयवर्गीय दोनों ने ही इस मुद्दे पर विधानसभा में कहा कि सरकार ने किसानों के 50 हजार रुपए की कर्ज माफी का कभी कोई औपचारिक एलान नहीं किया। यानी, अपनी ही पार्टी के चुनावी घोषणा-पत्र को अब सरकार के मंत्री झुठला रहे हैं। सहकारिता मंत्री गौरीशंकर बिसेन ने सरकार का बचाव करते हुए विधानसभा में बचकाना बयान दिया कि कर्ज माफी का वादा पार्टी ने किया था, सरकार ने नहीं। लिहाजा, सरकार जबावदेह नहीं। सहकारिता मंत्री के बयान से जाहिर है कि बीजेपी राज्य में किसानों और उनकी समस्याओं के प्रति कितनी संजीदा है? बीजेपी ने साल 2008 के विधानसभा चुनाव में अपने चुनाव घोषणा-पत्र में किसानों से वादा किया था कि यदि वह सत्ता में आई, तो उनका 50 हजार रुपए तक का कर्ज माफ कर दिया जाएगा। पार्टी ने इस वादे को बाकायदा पचरें में छपवाकर किसानोें के बीच बांटा। यहां तक कि पचरें में उस वक्त के अपने राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह तक का हवाला दिया गया। कर्ज माफी के इस वादे का बीजेपी को खूब फायदा मिला। उसके वायदे पर यकीन कर सूबे के किसानों ने उसको जमकर वोट दिए लेकिन हुकूमत में दोबारा वापिस आते ही सरकार ने अपना वादा भूल गयी। सरकार ने किसानों से तो वादाखिलाफी की ही, केन्द्र से कर्ज माफी के लिए मिले 915 करोड़ रूपए में भी सेंध मार दी। आलम यह है कि सूबे में सहकारी संस्थाओं के घोटालों के चलते किसानों के 115 करोड़ रुपए के कर्ज माफ नहीं हो पाए हैं। इस बात का इकरार खुद सरकार ने किया है। राज्य सरकार की तमाम किसानोन्मुखी योजनाओं के दावों के बीच मध्य प्रदेश में तकरीबन 32 लाख 11 हजार से ज्यादा किसान आज भी कर्ज के बोझ से दबे हैं। खुद सहकारिता मंत्री गौरीशंकर बिसेन ने विधानसभा में इस बात को माना है कि सूबे के किसान जिला सहकारी कृषि व ग्रामीण विकास बैंकों के सात हजार करोड़ रुपए से ज्यादा के कर्जदार हैं। सूबे में औसतन हर किसान पर 14 हजार 218 रुपए के कर्ज का बोझ है। जबकि कडुवी सचाई यह है कि राज्य में 30 फीसद से ज्यादा ऐसे किसान हैं, जिनके पास महज एक से लेकर तीन हेक्टेयर तक ही खेती के काबिल जमीन है। कृषि मामलों के जानकारों का मानना है कि सूबे के 50 फीसद से ज्यादा किसानों पर फिलवक्त संस्थागत कर्ज चढ़ा है। इसके अलावा किसान स्थानीय साहूकारों और बड़े व्यापारियों से भी कर्ज लेते हैं। यह कर्ज ऐसा है, जो उन्हें चैन से जीने नहीं देता। यही वजह है कि मध्य प्रदेश में बीते 10 सालों में किसानों की खुदकुशी के मामलों में लगातार इजाफा हुआ है। इन 10 सालों में यहां तकरीबन 14,155 किसान खुदकुशी कर चुके हैं। राष्ट्रीय अपराध अभिलेख ब्यूरो के आंकड़ों के मुताबिक सूबे में हर दिन चार किसान खुदकुशी करते हैं। साल 2003-04 में पड़े सूखे के बाद से तो यहां आत्महत्या का ग्राफ बढ़ता चला गया है। किसानों को बीज, खाद, पानी और बिजली जैसी खेती की बुनियादी जरूरतें भी नहीं मिल पा रहीं हैं, जिसके चलते वे हताशा में आत्महत्या की तरफ कदम बढ़ा रहे हैं। किसी भी सरकार के लिए इससे ज्यादा अफसोस की बात क्या होगी कि उसके सूबे में किसान आत्महत्याएं करते रहें और वह इस समस्या पर गंभीरता से सोचने की बजाय उसे सिरे से ही खारिज कर दे। इस बात को अभी ज्यादा दिन नहीं गुजरे हैं, जब किसानों की आत्महत्या को कृषि मंत्री रामकृष्ण कुसमरिया ने किसानों का पाप बतलाते हुए अपना पल्ला झाड़ लिया था। जबकि हकीकत यह है कि किसानों की आत्महत्याओं के पीछे प्राकृतिक कारणों से ज्यादा वे कारण जिम्मेदार थे, जिन पर सरकार आसानी से काबू पा सकती थी। घटिया खाद-बीज, नकली कीटनाशक और कर्ज इन किसानों की मौत की बड़ी वजह था। इस बात की तस्दीक हाल में आई राज्य मानवाधिकार आयोग की रिपोर्ट ने भी कर दी है। रिपोर्ट में साफ-साफ तौर पर भ्रष्ट तंत्र, कर्ज और फसल की बर्बादी को किसानों की आत्महत्या का जिम्मेदार ठहराया गया है। राज्य में आज हालत यह है कि यदि जल्द ही किसानों के कर्ज माफ नहीं किए गए तो आत्महत्याओं का ग्राफ और भी बढ़ सकता है। कुल मिलाकर, यह पहली बार नहीं है जब बीजेपी ने सूबे के किसानों के साथ धोखा किया हो। पूर्व मुख्यमंत्री सुंदरलाल पटवा के समय भी बीजेपी ने चुनाव में किसानों से पच्रे भरवाए थे और नारा दिया था, ‘भाजपा का कहना साफ, हर किसान का कर्जा माफ।लेकिन जब बीजेपी सरकार में आई, तो यह वादा भूल गई। दिखावे के लिए कुछ कज्रे माफ हुए और बाद में किसानों को ठेंगा दिखा दिया गया। सूबे में कमोबेश यही कहानी शिवराज सरकार, फिर दोहरा रही है। कर्ज माफी के अपने वादे पर अमल करने की बजाए उसके मंत्री हास्यास्पद दलीलें दे रहें हैं। मानो पार्टी और सरकार जुदा-जुदा हों। सरकार यह कहकर अपनी जिम्मेदारियों से नहीं बच सकती कि कर्ज माफी का वादा पार्टी ने किया था, सरकार ने नहीं। चुनाव घोषणा-पत्र पार्टी का लिखित संविधान होता है और सत्ता में आने के बाद उस पर अमल करना उसका कर्त्तव्य। जो पार्टी चुनाव घोषणा-पत्र के आधार पर सत्ता में आती है, उसका जिम्मा बनता है कि वह प्राथमिकता के आधार पर पहले अपने चुनाव घोषणा-पत्र पर अमल करे, न कि उसे खारिज कर दे। वरना, चुनाव घोषणा-पत्र पर कौन यकीन करेगा?

     

बुंदेलखंड ने गेहूं उत्पादन में पंजाब को पछाड़ा


डेढ़ दशक से सूखे से जूझ रहे बुंदेलखंड के चित्रकूट से राहत देने वाली खबर है। इंद्रदेव के मेहरबान होने से गेहूं के उत्पादन में प्रति हेक्टेयर इतना उछाल आया कि पंजाब भी पीछे हो गया है। गेहूं, चना, अरहर, सरसों और मसूर का इस साल रिकार्ड उत्पादन हुआ है। उम्मीद है कि खरीफ के मौसम में वह किसान भी खेती-बारी फिर शुरू कर देंगे, जो कृषि से तौबा कर चुके थे। दस साल से जिले में सामान्य वर्षा 830 मिलीमीटर से कम हो रही थी, जिससे किसानों के खेत बंजर पड़े रहते थे। 2009 में तो इतना जबर्दस्त सूखा पड़ा कि किसानों ने खेतों में जो बीज डाला था, वह भी वापस नहीं आया था। इसके बाद जिले के किसानों ने खेती से तौबा कर ली। हालांकि इस साल इंद्रदेव बुंदेलखंड में ऐसे मेहरबान हुए कि कई साल की वर्षा का रिकार्ड टूट गया। जिले में 960 मिमी वर्षा हुई, जबकि इसके पूर्व में मात्र 437 मिलीलीटर वर्षा हुई थी। इससे किसानों का हौसला बढ़ा। उन्होंने कई साल से परती पड़े खेतों में रबी और दलहनी फसलों की बुआई कर डाली। इसका अच्छा परिणाम भी देखने को मिला। जिले के खेतों में गेहूं, चना, सरसों, अरहर और मसूर की फसल लहलहाती रही। कृषि विभाग की मानें तो जिला बनने के बाद चित्रकूट में पहली बार रिकार्ड फसल का उत्पादन हुआ है। आंकड़े बताते हैं कि गेहूं के प्रति हेक्टेयर उत्पादन के मामले में तो पंजाब भी पीछे हो गया है। उप कृषि निदेशक मोहम्मद आरिफ सिद्दीकी ने बताया कि जिले में गेहूं उत्पादन प्रति हेक्टेयर 30 से 32 क्विंटल आया है, जबकि पंजाब में पिछले साल 28 क्विंटल प्रति हेक्टेयर उत्पादन हुआ था। जिले में पिछले साल 17.84 क्विंटल प्रति हेक्टेयर उत्पादन हुआ था। उन्होंने बताया कि चना का भी रिकार्ड उत्पादन होने की संभावना है। क्राफ्ट कटिंग में 16 से 18 क्विंटल प्रति हेक्टेयर का उत्पादन सामने आया है। पिछले साल चना का उत्पादन मात्र 6.08 क्विंटल प्रति हेक्टेयर था। सरसों उत्पादन में भी जबर्दस्त उछाल देखा गया है। उन्होंने 12 क्विंटल प्रति हेक्टेयर के उत्पादन की संभावना व्यक्त की, जो पिछले साल के मुकाबले लगभग सात क्विंटल अधिक है। अरहर उत्पादन भी काफी अधिक हुआ है। सिद्दीकी ने बताया कि उनके अलावा जिलाधिकारी डॉ. आदर्श सिंह ने खुद देखा कि प्रति हेक्टेयर उत्पादन 32 क्विंटल निकला है।