पिछले चौदह-पन्द्रह वर्षो से विदर्भ (महाराष्ट्र) के किसान लगातार आत्महत्या कर रहे हैं। सरकारी अमला अपने हिसाब से कार्य कर रहा है लेकिन आत्महत्याओं का सिलसिला बढ़ता जा रहा है। विदर्भ में किसानों की आत्महत्या की ओर सबसे पहले ध्यान 1997-98 में गया। हालांकि इस बीच उनके लिए कई तरह की कर्जमाफी की घोषणाएं हुई हैं पर इससे खास अंतर नहीं आया है। एनसीआरबी की रिपोर्ट के अनुसार पहली बार 1997 में आत्महत्याओं को रिकार्ड में दर्ज किया गया। उसके अनुसार 1997-98 में छह हजार से अधिक किसानों ने आत्महत्या की। 2006 से 2008 के बीच पूर्व की तुलना में पचास प्रतिशत से भी ज्यादा की वृद्धि इन घटनाओं में हुई। अब बुन्देलखंड, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु से भी ऐसी खबरें आने लगी हैं। इन आत्महत्याओं के रिकार्ड के संदर्भ में सरकार के अपने स्रेत हैं, जो किसी वर्ष संख्या बढ़ा देते हैं तो किसी वर्ष घटा देते हैं लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि आज विदर्भ का कोई भी क्षेत्र ऐसा नहीं बचा है जहां आत्महत्या करने वाले किसानों के अनाथ बच्चों की चीत्कार न गूंजती हो। एक चिंताजनक बात यह देखने में आयी है कि आज से दस साल पहले जिन किसानों ने आत्महत्या की, उनकी भावी पीढ़ी भी उसी राह चल रहे हैं। हमारे किसान व्यवस्था के हाथों मजबूर होकर आत्महत्या करने को अभिशप्त हैं। सारी लड़ाई भूख की है। किसानों की आत्महत्या के पीछे दो प्रमुख कारण हैं। पहला कर्ज और दूसरा प्राकृतिक आपदा। 2008 में किसानों के हित में कर्जमाफी की योजना आयी। यह सरकार का किसानों के लिए किया गया नेक और ईमानदार प्रयास था। देश के तमाम किसानों को इसका लाभ मिला लेकिन विदर्भ में इसका प्रभाव बहुत अधिक नहीं पड़ा क्योकि यहां के किसानों का कर्ज सरकारी से अधिक गैर-सरकारी था। मूल्यहीनता के आज के परिवेश में यदि किसानों के पास कोई रास्ता नहीं रहेगा तो वे क्या करेंगे? आज किसानों के साथ खड़ा होने वाला कोई नजर नहीं आता। न कोई विनोबा जैसा प्रखर समाज सेवक है और न स्वामी सहजानंद जैसा किसान हितैषी। आज समाज में उनके लिए काम करने वाले दो वर्ग हैं। पहला वर्ग राजनेताओं का है और दूसरा कुछ उन पेशेवर समाज चिंतकों का जो इस तरह के लोगों की मदद करने के बजाय उनके समस्या को लगातार जिंदा रखना चाहते हैं ताकि सेवा करने के एवज में मेवा पाते रहें और उनकी दुकान चलती रहे। अब तक जो आंकड़े कुछ समाज कार्यकर्ताओं, पत्रकारों और सरकारी दस्तावेज के रूप में मौजूद हैं, उनके अनुसार पिछले 14 वर्षो में सिर्फ विदर्भ में यह संख्या पचास हजार से कम नहीं होगी। दरअसल, विदर्भ के किसानों की आत्महत्या का प्रमुख कारण है कृषि पैदावार में लगातार होती कमी। साथ ही वह कर्ज, जिसे किसान अच्छी फसल की उम्मीद में लेता है लेकिन नुकसान होने पर ब्याज के नाम नाम पर निरंतर चुकाने के लिए अभिशप्त होता है और मूलधन जहां का तहां बना रहता है। दरअसल विदर्भ में निजी तौर पर दिया जाने वाला ऐसा कर्ज बड़े व्यवसाय के रूप प्रशासन की नाक के नीचे चोरी-छुपे खूब फल-फूल रहा है। इसमें एक बार फंसने के बाद बाहर निकलना बड़ा कठिन होता है। कुछ दिन पहले यहां एक किसान ने तीस हजार रुपये कर्ज न चुका पाने के कारण आत्महत्या कर ली। सवाल उठा कि इतनी सी रकम के लिए कोई आत्महत्या क्यों करेगा लेकिन पता चला कि उसने तीन साल पहले कपास की फसल बर्बाद होने पर जो कर्ज लिया था बाद में खेती से होने वाली आमदनी से उसका ब्याज चुकाता रहा लेकिन मूलधन जहां का तहां बना रहा। बराबर ब्याज चुकाते रहने से परिवार का भरण-पोषण मुश्किल हो रहा था। ब्याज की एक किस्त न दे पाने की वजह से सेठ पैसा मांगने घर आ गया और पूरे गांव के सामने उसकी पत्नी और बच्चों को भला-बुरा कहने लगा। किसान को इसका पता चला तो उसने खेत पर ही आत्महत्या कर ली। लगातार बढ़ती मंहगाई भी किसानों को आत्महत्या जैसे कदम उठाने के लिए मजबूर कर रही है। यह इसी देश में होता है कि जब प्याज किसान के पास नहीं होता है तो अस्सी रु पये किलो के भाव से बिकता है और जब किसान के पास होता है तो आठ रुपये किलो भी नहीं बिकता है। आर्थिक संरक्षण के नाम पर किसानों के लिए किसी आयोग की सिफारिश नहीं की जाती। ऐसे में क्या उन्हें अपनी पैदावार का उचित मूल्य नहीं मिलना चाहिए? यह सवाल सबसे पहले अपने को किसानों का हितैषी बताने वाली सरकार से पूछा जाना चाहिए। सच यह है कि सरकार ने किसानों के लिए अब तक जो कुछ किया है, उसकी तुलना में अभी बहुत कुछ करने की आवश्यकता है। यदि कृषि क्षेत्र उपेक्षित होगा और किसान आत्महत्या करते रहेंगे तो शेष आधुनिकता और विकास का कम से कम उनके लिए कोई अर्थ नहीं होगा जिनका जीवन कृषि आधारित है। किसान खुशहाल हों और कृषि संस्कृति को बल मिले, तभी विकास की असल अर्थवत्ता सिद्ध होगी।
Wednesday, April 6, 2011
आत्महत्या के लिए मजबूर किसान
पिछले चौदह-पन्द्रह वर्षो से विदर्भ (महाराष्ट्र) के किसान लगातार आत्महत्या कर रहे हैं। सरकारी अमला अपने हिसाब से कार्य कर रहा है लेकिन आत्महत्याओं का सिलसिला बढ़ता जा रहा है। विदर्भ में किसानों की आत्महत्या की ओर सबसे पहले ध्यान 1997-98 में गया। हालांकि इस बीच उनके लिए कई तरह की कर्जमाफी की घोषणाएं हुई हैं पर इससे खास अंतर नहीं आया है। एनसीआरबी की रिपोर्ट के अनुसार पहली बार 1997 में आत्महत्याओं को रिकार्ड में दर्ज किया गया। उसके अनुसार 1997-98 में छह हजार से अधिक किसानों ने आत्महत्या की। 2006 से 2008 के बीच पूर्व की तुलना में पचास प्रतिशत से भी ज्यादा की वृद्धि इन घटनाओं में हुई। अब बुन्देलखंड, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु से भी ऐसी खबरें आने लगी हैं। इन आत्महत्याओं के रिकार्ड के संदर्भ में सरकार के अपने स्रेत हैं, जो किसी वर्ष संख्या बढ़ा देते हैं तो किसी वर्ष घटा देते हैं लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि आज विदर्भ का कोई भी क्षेत्र ऐसा नहीं बचा है जहां आत्महत्या करने वाले किसानों के अनाथ बच्चों की चीत्कार न गूंजती हो। एक चिंताजनक बात यह देखने में आयी है कि आज से दस साल पहले जिन किसानों ने आत्महत्या की, उनकी भावी पीढ़ी भी उसी राह चल रहे हैं। हमारे किसान व्यवस्था के हाथों मजबूर होकर आत्महत्या करने को अभिशप्त हैं। सारी लड़ाई भूख की है। किसानों की आत्महत्या के पीछे दो प्रमुख कारण हैं। पहला कर्ज और दूसरा प्राकृतिक आपदा। 2008 में किसानों के हित में कर्जमाफी की योजना आयी। यह सरकार का किसानों के लिए किया गया नेक और ईमानदार प्रयास था। देश के तमाम किसानों को इसका लाभ मिला लेकिन विदर्भ में इसका प्रभाव बहुत अधिक नहीं पड़ा क्योकि यहां के किसानों का कर्ज सरकारी से अधिक गैर-सरकारी था। मूल्यहीनता के आज के परिवेश में यदि किसानों के पास कोई रास्ता नहीं रहेगा तो वे क्या करेंगे? आज किसानों के साथ खड़ा होने वाला कोई नजर नहीं आता। न कोई विनोबा जैसा प्रखर समाज सेवक है और न स्वामी सहजानंद जैसा किसान हितैषी। आज समाज में उनके लिए काम करने वाले दो वर्ग हैं। पहला वर्ग राजनेताओं का है और दूसरा कुछ उन पेशेवर समाज चिंतकों का जो इस तरह के लोगों की मदद करने के बजाय उनके समस्या को लगातार जिंदा रखना चाहते हैं ताकि सेवा करने के एवज में मेवा पाते रहें और उनकी दुकान चलती रहे। अब तक जो आंकड़े कुछ समाज कार्यकर्ताओं, पत्रकारों और सरकारी दस्तावेज के रूप में मौजूद हैं, उनके अनुसार पिछले 14 वर्षो में सिर्फ विदर्भ में यह संख्या पचास हजार से कम नहीं होगी। दरअसल, विदर्भ के किसानों की आत्महत्या का प्रमुख कारण है कृषि पैदावार में लगातार होती कमी। साथ ही वह कर्ज, जिसे किसान अच्छी फसल की उम्मीद में लेता है लेकिन नुकसान होने पर ब्याज के नाम नाम पर निरंतर चुकाने के लिए अभिशप्त होता है और मूलधन जहां का तहां बना रहता है। दरअसल विदर्भ में निजी तौर पर दिया जाने वाला ऐसा कर्ज बड़े व्यवसाय के रूप प्रशासन की नाक के नीचे चोरी-छुपे खूब फल-फूल रहा है। इसमें एक बार फंसने के बाद बाहर निकलना बड़ा कठिन होता है। कुछ दिन पहले यहां एक किसान ने तीस हजार रुपये कर्ज न चुका पाने के कारण आत्महत्या कर ली। सवाल उठा कि इतनी सी रकम के लिए कोई आत्महत्या क्यों करेगा लेकिन पता चला कि उसने तीन साल पहले कपास की फसल बर्बाद होने पर जो कर्ज लिया था बाद में खेती से होने वाली आमदनी से उसका ब्याज चुकाता रहा लेकिन मूलधन जहां का तहां बना रहा। बराबर ब्याज चुकाते रहने से परिवार का भरण-पोषण मुश्किल हो रहा था। ब्याज की एक किस्त न दे पाने की वजह से सेठ पैसा मांगने घर आ गया और पूरे गांव के सामने उसकी पत्नी और बच्चों को भला-बुरा कहने लगा। किसान को इसका पता चला तो उसने खेत पर ही आत्महत्या कर ली। लगातार बढ़ती मंहगाई भी किसानों को आत्महत्या जैसे कदम उठाने के लिए मजबूर कर रही है। यह इसी देश में होता है कि जब प्याज किसान के पास नहीं होता है तो अस्सी रु पये किलो के भाव से बिकता है और जब किसान के पास होता है तो आठ रुपये किलो भी नहीं बिकता है। आर्थिक संरक्षण के नाम पर किसानों के लिए किसी आयोग की सिफारिश नहीं की जाती। ऐसे में क्या उन्हें अपनी पैदावार का उचित मूल्य नहीं मिलना चाहिए? यह सवाल सबसे पहले अपने को किसानों का हितैषी बताने वाली सरकार से पूछा जाना चाहिए। सच यह है कि सरकार ने किसानों के लिए अब तक जो कुछ किया है, उसकी तुलना में अभी बहुत कुछ करने की आवश्यकता है। यदि कृषि क्षेत्र उपेक्षित होगा और किसान आत्महत्या करते रहेंगे तो शेष आधुनिकता और विकास का कम से कम उनके लिए कोई अर्थ नहीं होगा जिनका जीवन कृषि आधारित है। किसान खुशहाल हों और कृषि संस्कृति को बल मिले, तभी विकास की असल अर्थवत्ता सिद्ध होगी।
Tuesday, April 5, 2011
Monday, April 4, 2011
तबाही के बीज
जीएम फसलों के दुष्प्रभावों पर लेखक की टिप्पणी
सरकार की जो प्रतिबद्धता किसान और खेती से जुड़े स्थानीय संसाधनों के प्रति दिखाई देनी चाहिए वह बहुराष्ट्रीय कंपनियों के प्रति दिखाई दे रही है। इस मानसिकता से उपजे हालात कालांतर में देश की बहुसंख्यक आबादी की आत्मनिर्भरता को परावलंबी बना देंगे। बीते साल फरवरी में जब पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने बीटी बैंगन की खेती के जमीनी प्रयोगों को बंद करते हुए भरोसा जताया था कि जब तक इनके मानव स्वास्थ्य से जुड़े सुरक्षात्मक पहलुओं की वैज्ञानिक पुष्टि नहीं हो जाती, इनके उत्पादन को मंजूरी नहीं दी जाएगी। इसके बावजूद गोपनीय ढंग से मक्का के संकर बीजों का प्रयोग बिहार में किया गया। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को जब यह पता चला तो उन्होंने सख्त आपत्ति जताते हुए केंद्रीय समिति में राज्य के प्रतिनिधि को भी शामिल करने की पैरवी की। नतीजतन पर्यावरण मंत्रालय ने बिहार में बीटी मक्का के परीक्षण पर रोक लगा दी। लेकिन यहां यह आशंका जरूर उठती है कि ये परीक्षण उन प्रदेशों में जारी होंगे, जहां कांग्रेस और संप्रग के सहयोगी दलों की सरकारें हैं। गुपचुप जारी इन प्रयोगों से पता चलता है कि अमेरिका परस्त मनमोहन सरकार विदेशी कंपनियों के आगे इतनी दयनीय है कि उसे जनता से किए वादे से मुकरना पड़ रहा है। भारत के कृषि और डेयरी उद्योग पर नियंत्रण करना अमेरिका की पहली प्राथमिकताओं में है। इन बीजों की नाकामी साबित हो जाने के बावजूद इनके प्रयोगों का मकसद है मोंसेंटो, माहिको वालमार्ट और सिंजेटा जैसी कंपनियों के कृषि बीज और कीटनाशकों के व्यापार को भारत में जबरन स्थापित करना। बिहार में मक्का-बीजों की पृष्ठभूमि में मोंसेंटों ही थी। इसके पहले धारवाड़ में बीटी बैंगन के बीजों के प्रयोग के साथ इसकी व्यावसायिक खेती को प्रोत्साहित करने में माहिको का हाथ था। यहां तो ये प्रयोग कुछ भारतीय वैज्ञानिकों को लालच देकर कृषि विश्वविद्यालय, धारवाड़ और तमिलनाडु कृषि विश्वविद्यालय कोयंबटूर में चल रहे थे। जीएम बैगन पहली ऐसी सब्जी थी जो भारत में ही नहीं दुनिया में पहली मर्तबा प्रयोग में लाई जाती। इसके बाद एक-एक कर कुल 56 फसलें वर्ण संकर बीजों से उगाई जानी थीं। लेकिन बीटी बैंगन खेती के देश में जबरदस्त विरोध के कारण पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने इसके प्रयोग व खेती पर प्रतिबंध लगा दिया था। दरअसल आनुवंशिक बीजों से खेती को बढ़ावा देने के लिए देश के शासन-प्रशासन को मजबूर होना पड़ रहा है। 2008 में जब परमाणु- करार का हो हल्ला संसद और संसद से बाहर चल रहा था तब अमेरिकी परस्त प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, कृषि मंत्री शरद पवार और पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश की तिगड़ी ने अमेरिका से एक ऐसा समझौता गुपचुप कर लिया था, जिस पर कतई चर्चा नहीं हुई थी। इसी समझौते के मद्देनजर बीटी बैंगन को बाजार का हिस्सा बनाने के लिए शरद पवार और जयराम रमेश ने आनुवंशिक बीजों को सही ठहराने के लिए देश के कई नगरों में जन-सुनवाई के नजरिये से मुहिम भी चलाई थी। लेकिन जनता और स्वयंसेवी संगठनों की जबरदस्त मुहिम के चलते राजनेताओं को इस जिद से तत्काल पीछे हटना पड़ा था। बीटी बैंगन मसलन संकर बीज ऐसा बीज है, जिसे साधारण बीज में एक खास जीवाणु के जीन को आनुवंशिक अभियांत्रिकी तकनीक से प्रवेश कराकर बीटी बीज तैयार किए जाते हैं। भारतीय वैज्ञानिकों का दावा है कि ये बीज स्थानीय और पारपंरिक फसलों के लिए भी खतरनाक हैं। राष्ट्रीय पोषण संस्थान, हैदराबाद के प्रसिद्ध जीव विज्ञानी रमेश भट्ट ने बीटी बैंगन के हल्ले के समय चेतावनी दी थी कि बीटी बैंगन की खेती शुरू होती है तो इसके प्रभाव से बैंगन की स्थानीय किस्म मट्टूगुल्ला प्रभावित होकर लगभग समाप्त हो जाएगी। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)
Friday, April 1, 2011
खाद्य सुरक्षा की कुंजी
लेखक उत्तर प्रदेश सरकार के दो हजार मंडियों की स्थापना के फैसले में किसानों की खुशहाली देख रहे हैं …..
वाल-मार्ट और टेस्को जैसी विशाल सुपरमार्केट रिटेल चेन के भारत में काम शुरू करने पर छिड़ी बहस के बीच उत्तर प्रदेश सरकार ने मंडियों के मौजूदा तंत्र के विस्तार की रूपरेखा तैयार कर ली है। उत्तर प्रदेश में अगले चार साल में 2105 मंडियों का गठन हो जाएगा। अकेला यह कदम ही आपूर्ति की बाधाओं को दूर कर देगा जिससे किसानों को एक सुनिश्चित बाजार मिल जाएगा। मंडियों के व्यापक तंत्र और वह भी किसानों की पहुंच के भीतर होने के कारण ही आज पंजाब देश का खाद्य कटोरा बन गया है। प्रसिद्ध कृषि प्रशासक डॉ. एमएस रंधावा का एक प्रसंग मुझे याद आ रहा है। पंजाब में हरित क्रांति के बीज पड़ने के तुरंत बाद तत्कालीन मुख्यमंत्री लक्ष्मण सिंह गिल ने रंधावा से पूछा कि वह ऐसा क्या काम करें कि उनका नाम इतिहास में अमर हो जाए। रंधावा ने उन्हें सलाह दी कि मंडियों तक पक्के संपर्क मार्गो का निर्माण करा दें, ताकि किसान आसानी से वहां तक पहुंच सकें। लक्ष्मण सिंह ने खरीद केंद्रों से मंडियों तक सड़कों का जाल बिछा दिया। शेष इतिहास है। मैं यह देखकर बहुत खुश हूं कि मायावती सरकार कृषि में इसी प्रकार का विपणन निवेश कर रही हैं। मंडियों का प्रस्तावित ढांचा किसानों को मजबूरी में सस्ती दरों पर व्यापारियों को फसल बेचने से बचाएगा। मंडियों के ढांचे के अभाव में फसल का कोई ऐसा सीजन नहीं होता जब किसानों का बिचौलियों के माध्यम से शोषण न होता हो। यह देखना असामान्य नहीं है कि अपनी फसल को बेचने के लिए किसान पड़ोसी राज्यों तक पहुंचते हैं। उदाहरण के लिए, हर साल पश्चिमी उत्तर प्रदेश के बहुत से किसान गेहूं बेचने के लिए पड़ोसी हरियाणा का रुख करते हैं। उत्तर प्रदेश देश का सबसे अधिक आबादी वाला राज्य है और यही खाद्यान्न का सबसे बड़ा उत्पादक भी है। किंतु पश्चिम के कुछ क्षेत्रों को छोड़कर यहां कृषि विपणन की सुविधाएं बेहद कम हैं। इसीलिए यहां कृषि एक अभिशाप बन गई है। सुनिश्चित बाजार के अभाव में उत्पादन में सुधार के सही निवेश के लिए किसानों को कोई बढ़ावा नहीं मिलता है। न ही वे फसल का उचित दाम हासिल करते हैं। पंजाब और हरियाणा के विपरीत, जहां सरकारी खरीद केंद्र और मंडियों का मजबूत जाल है, उत्तर प्रदेश इस क्षेत्र में काफी पिछड़ा हुआ है। उत्तर प्रदेश में केवल 300 सरकारी खरीद केंद्र हैं। प्रस्ताव के अनुसार प्रदेश में हर साल पांच सौ मंडियों की स्थापना होगी। मंडियों के इस विशाल ढांचे से किसानों की निकटतम मंडी तक पहुंचने की औसत दूरी भी घटकर सात किलोमीटर रह जाएगी। इन मंडियों का संचालन निजी क्षेत्र के हाथों में सौंपने की बजाय, जैसा कि योजना आयोग सलाह दे रहा है, मुख्यमंत्री मायावती ने इनका नियंत्रण राज्य कृषि उत्पादन विपणन बोर्ड को सौंपकर बिल्कुल सही कदम उठाया है। इससे इनकार नहीं किया जा सकता कि पिछले कुछ सालों के दौरान कमीशन एजेंटों ने पूरी तरह से मंडियों पर नियंत्रण कर लिया है। यह समस्या इसलिए पैदा हुई क्योंकि राजनीतिक दलों ने मंडियों का नियंत्रण आढ़तियों के हाथों में सौंप दिया। पेशेवरों द्वारा संचालित होने के बजाए देश की अधिकांश मंडियों में प्रबंधन कमीशन एजेंटों के हाथ में है। किंतु इसका इलाज मंडियों को खत्म कर देने या इनका नियंत्रण निजी कंपनियों के हाथों में सौंपना नहीं है। राजनीतिक दखल से परे एक बेहतर नियामक मंडियों को पुनर्जीवित तथा अधिक प्रभावी कर सकता है। न ही इसका जवाब बड़े खाद्यान्न सुपरमार्केट को भारत में दुकाने खोलने की अनुमति प्रदान करने में है। वाणिज्य मंत्रालय और योजना आयोग वाल-मार्ट और टेस्को जैसी रिटेल चेन को भारत में प्रवेश दिलाने की जबरदस्त पैरवी कर रहे हैं। इनकी दलील है कि इससे किसानों को बेहतर कीमत और ग्राहकों को सस्ती दरों पर खाद्यान्न मिल सकेगा। बड़ी रिटेल चेन से यह भी अपेक्षा जताई जा रही है कि वे मध्यस्थों का खात्मा कर देंगी, जिसका लाभ किसानों को होगा। मुझे लगता है कि कृषि क्षेत्र में सुधारों के नाम पर अब निजी खिलाडि़यों को प्रवेश देने का अधिक दबाव पड़ेगा। अंतरराष्ट्रीय खाद्य नीति अनुसंधान संस्थान (आइएफपीआरआइ) का कहना है, भारत में किसानों को मंडियों में लूटा जा रहा है, और उपभोक्ता बाजार से भारी दामों में खाद्यान्न खरीद रहे हैं। यह दलील बेतुकी है। अनुभव बताता है कि बड़ी खाद्य रिटेल चेन से न तो किसानों का भला हुआ है और न ही उपभोक्ताओं का। न ही इस चेन से रोजगार के अवसर बढ़े हैं। बड़े सुपरमार्केटों का यह दावा कि वे बड़ी संख्या में नौकरियां देकर आर्थिक संवृद्धि को गति देंगे, थोथा साबित हुआ है। इंग्लैंड में, टेस्को और सेंसबरी जैसी दिग्गज रिटेल चेन हजारों नौकरियां पैदा करने के अपने दावों पर खरी नहीं उतरीं। पिछले दो सालों के दौरान, टेस्को ने एक हजार और सेंसबरी ने 13 हजार नौकरियां देने का वायदा किया था, जबकि हकीकत में टेस्को ने कुल 726 लोगों को रोजगार दिया है, जबकि सेंसबरी ने 1600 लोगों को नौकरी से निकाल दिया है। मैं हमेशा से कहता आ रहा हूं कि अगर सुपरमार्केट वास्तव में किसानों के इतने ही हितसाधक हैं तो अमेरिका किसानों को विशाल अनुदान क्यों दे रहा है। आखिरकार, विश्व की सबसे बड़ी रिटेल चेन वाल-मार्ट का जन्म अमेरिका में ही हुआ है और इसे अमेरिका के किसानों को आर्थिक रूप से इतना समर्थ बना देना चाहिए था कि उन्हें सब्सिडी की जरूरत ही न पड़ती। किंतु ऐसा नहीं हुआ। अमेरिका के किसान सरकारी सब्सिडी की बैसाखी पर खड़े हैं। 1995 से 2009 के बीच 12.50 लाख करोड़ रुपये की सब्सिडी अमेरिकी किसानों को दी गई है। इसमें प्रत्यक्ष आय सहयोग भी शामिल है। जरूरत भारत में मंडियों का राष्ट्रव्यापी ढांचा खड़ा करने की है। यह जानना जरूरी है कि अगर पंजाब में मंडियों का विकसित तंत्र खड़ा न होता, तो यह देश का खाद्यान्न कटोरा न होता। मंडियों में सुनिश्चित सरकारी खरीद के बल पर ही किसानों को अपनी पैदावार का अधिक दाम मिलता है। पंजाब में भारी संख्या में मंडियों की मौजूदगी के कारण ही वहां फसल के समय कम दामों में उपज बेचने की घटनाएं देखने में नहीं आतीं। उत्तर प्रदेश में ऐसा कोई साल नहीं है जब फसल के समय निजी व्यापारी किसानों से कम दाम में उपज खरीद कर उन्हें लूट न लेते हों। उत्तर प्रदेश में मंडियों की कम संख्या के कारण यहां के किसानों को भारी नुकसान उठाना पड़ा है। नेशनल सैंपल सर्वे ऑर्गेनाइजेशन के अनुसार, एक औसत किसान परिवार की मासिक आय उत्तर प्रदेश में सबसे कम है। (लेखक कृषि मामलों के विशेषज्ञ हैं )
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