किसी विद्वान का कहना है, हो सके तो जमीन खरीद लो क्योंकि अब इसका बनना बंद हो गया है। अपने देश में इसका स्थूल मतलब निकालते हुए खेती की जमीन की गैर-खेतिहर कामों के लिए अंधाधुंध खरीद शुरू हो गई। सरकार की ही रिपोर्ट पर केंद्रीय कृषि मंत्री का बयान है कि गत दो दशकों में खेती की दो फीसद जमीन घट गई है। यह रकबा लगभग 28 लाख हेक्टेयर बैठता है। कहां गायब हो गई इतनी जमीन? आसपास के बदलावों पर नजर रखने वाले भी जानते हैं कि यह जमीन शहरों के फैलाव, फैक्टरियों, दुकानों और दफ्तरों की भेंट चढ़ गई। खेती की जमीन के प्रति हमारा यह रवैया तब है जबकि गांधी के वचन को तोते की तरह दोहराते आए हैं कि भारत की आत्मा गांवों में बसती है। इसलिए कि वहां रहने वाली 80 फीसद आबादी खेतों में अन्न उपजा कर देश का पेट भरती है। खेती आजीविका का मूलभूत साधन ही नहीं, इस देश की संस्कृति में भी समायी हुई है। अत: शहरों जैसी सुविधाएं तथा खुशहाली गांवों तक ले जाकर उनके अस्तित्व को आबाद रखना है। अब जब खेत के खेत गायब हो रहे हैं तो जाहिर है, हमने उनके वचन या इसके जरिये समझ आने वाले भारत के वास्तविक अभिप्राय को नहीं समझा है। उदारीकरण के तकाजे इस ओर से आंख मूंद लेने के लिए उकसाते रहते हैं। खेत किस तरह गैर कृषि कामों में खपाए जा रहे हैं, यह राष्ट्रीय राजधानी के अनियंत्रित विस्तार को देखने पर मालूम होता है। इसके लिए कभी किसानों को धमकाया जाता है तो कभी मोटी राशि के जरिये फुसलाया जाता है। जिन्हें यह समझ है कि जमीन बेचने के बाद खाएंगे क्या, वे प्रदर्शन करते हैं, तो उन्हें दबाया भी जाता है। सिंगुर, नंदीग्राम, अलीगढ़ और गुड़गांव तक इसके उदाहरण हैं। इसके लिए राज्य के कानून उनके दरबार बजाते हैं, जिनकी नजरें किसानों के खेतों पर गड़ गई हैं। ऐसा नहीं है कि कानून में खेती की जमीन का इतर कामों में उपयोग रोकने की मनाही नहीं है। अगर शब्दश: इसका पालन होता तो राजधानी समेत किस भी महानगर-शहर का अतार्किक विस्तार सम्भव नहीं हो पाता। प्रगति का सिद्धांत:-व्यवहारत: केंद्रीकरण कर देंगे तो खेत घटेंगे ओैर विस्थापन भी बढ़ेगा। सरकार में बैठे उदारीकरण के एक बड़े पैरोकार ने अभी कहा है कि खेती पर आश्रित आबादी को घटा कर 54 फीसद कर देना चाहिए। औद्योगिकीकरण को बढ़ाना चाहिए। विस्थापन से शहरों को और फूलने देना चाहिए। खेती पर आश्रित कोई अर्थव्यवस्था खुशहाल हुई है, उन्हें भरोसा नहीं है। शायद वे चाहते हैं कि डिब्बाबंद लंच और डिनर विदेशों से मंगाए जाएं और यहां के लोग खेती से बाज आएं। उन्हें यह जानकारी होनी चाहिए कि अमेरिका तक में घटते खेतों पर गहरी चिंता जताई जा रही है। जहां हरेक साल 10 लाख एकड़ जमीन हाईवे, मॉल्स और अनगढ़ विकास की बलि चढ़ रही है। पड़ोसी चीन में भी यह चिंता है। हम खाद्य उत्पादन में 38 फीसद वृद्धि पर नहीं इतराना चाहिए क्योंकि जमीन की भी अपनी जैविक संरचना है, जो ताबड़तोड़ दोहन से बंजर बन कर पैदावार देने से इनकार भी कर सकती है। इस स्थिति को जेहन में रख कर कार्ययोजना बनाने की आवश्यकता है।
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Thursday, March 3, 2011
Tuesday, March 1, 2011
सूखे बुंदेलखंड की प्यास बुझाएंगे कृत्रिम बादल
उत्तर प्रदेश के सूखाग्रस्त बुंदलखंड इलाके में खेतों के लिये पलेवा की जरूरत है तो चार ही दिन में आसमान से पानी की बूंदें गिरने लगे तो कैसा लगेगा। भले ही यह देखने में एक लुभावना सपना हो पर अगर सब कुछ सही रहा तो इलाके में जल्द ही कृत्रिम बारिश के जरिए यह यथार्थ में तब्दील होगा। अन्नदाताओं के साथ प्यासों को पानी देने की मुहिम आगे बढ़ाने का काम चित्रकूट जिले के जिलाधिकारी डीके गुप्ता ने एक बार किया है। उनका कहना है कि अगर सब कुछ सही रहा तो अप्रैल के महीने की शुरूआत में इंद्र देव की इच्छा के विपरीत चित्रकूट जिले के बादल पानी बरसायेंगे। गुप्ता ने बताया कि जब वे वर्ष 2008 में लखनऊ में कृषि निदेशालय में थे तो उन्होंने बुंदेलखंड के सभी जिलों में कृत्रिम वर्षा करवाने का प्रोजेक्ट बनाया था। इसके लिये विशेष सचिव कृषि से बात कर अध्ययन के लिये झांसी स्थित भारतीय चारागाह अनुसंधान केंद्र के वैज्ञानिक, झांसी के संयुक्त कृषि निदेशक और मौसम विज्ञान अमौसी लखनऊ का एक दल भेजा गया था। पूरी रिपोर्ट तैयार होने के बाद प्रति जिले में बरसात करवाने के लिये पच्चीस करोड़ रुपयों के खर्च होने का प्रस्ताव बना और बुंदेलखंड के सातों जिलों में कृत्रिम बरसात कराने का निर्णय भी हो गया, लेकिन जून के प्रथम सप्ताह में आशा के विपरीत बरसात होने से यह प्रस्ताव स्थगित कर दिया गया। उन्होंने बताया कि जहां हर जिले में सिंचाई, पेयजल के लिये हर साल काफी लम्बा चौड़ा बजट आता है। अगर एक बार कृत्रिम बरसात करवा दी जाये तो करोड़ों का डीजल व बिजली का खर्च बच सकता है। उन्होंने कहा, यह नई चीज नही है। अमेरिका, चीन में तो हमेशा ही ऐसा किया जाता है। हैदराबाद में भी कई बार कृत्रिम बरसात करवाई जा चुकी है। उन्होंने बताया कि अब उन्होंने फिर से उस प्रस्ताव पर पहल शुरु कर दी है। मुख्य सचिव से बात भी हो रही है उम्मीद जताई कि जल्द ही इस प्रस्ताव को सरकार से हरी झंडी मिल जायेगी। कैसे होती है कृत्रिम बारिश : हाइड्रोजन और कार्बन के मिश्रण से पानी बनता है। मानव हो या पशु पक्षी सभी के सांस लेने के कारण कार्बन डाइआक्साइड वायु मंडल पर बादलों के रूप में जमा रहती है। इसमें हवाई जहाज द्वारा नाइट्रेड की सीडिंग कर दी जाती है, जिससे बादल पानी की वर्षा कर देते हैं। सीडिंग करने के कुछ घंटों के अंदर पानी बरस जाता है|
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