कौन कहता है कि बुंदेलखंड की धरती बंजर हो गई। हौसले के साथ मेहनत की तो यही माटी सोना उगलने लगी। सांतर गांव के एक किसान ने जायद में मूंग की खेती कर खेतों में ऐसी हरियाली बिखेरी की गांव ही नहीं क्षेत्र के किसानों में उम्मीद की किरण चटक हो गयी। अब तो पूरे इलाके में हरियाली दिखाई पड़ने लगी। पिछले दस वर्ष से लगातार पड़ रहे सूखे से बुंदेलखंड के किसानों में हताशा और निराशा भर गयी है। लोग समझने लगे कि हमारी माटी ही धोखा दे गयी है पर ऐसा नहीं है। सांतर के किसान गोपाल शरण सिंह ने 2009 में मूंग की खेती शुरु की। उस समय गांव के किसान यही कह रहे थे कि काहे को पैसा बर्बाद कर रहे हो कुछ होना नहीं है पर उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और हाड़तोड़ मेहनत से सिंचाई का बंदोबस्त किया। रात-दिन रखवाली करके मूंग की फसल तैयार की। 10 बीघे में 10 क्विंटल यानि 60 हजार रुपये की उपज मिली और खर्च मात्र 10 हजार हुआ। 62 दिन में फसल तैयार हो गयी, 50 हजार की आमदनी से गोपाल शरण सिंह का हौसला बढ़ा और 2010 में 17 बीघे मूंग की खेती करके एक लाख रुपये की आमदनी हासिल की। इस वर्ष गोपाल शरण सिंह ने 40 बीघे में मूंग की खेती की है। उनका मानना है कि सबकुछ ठीक रहा तो पांच लाख तक की पैदावार मिलेगी। तकरीबन 40 बीघे में 70 से 80 क्विंटल मूंग की पैदावार मिलने की संभावना है।
Sunday, May 15, 2011
Saturday, May 14, 2011
Friday, May 13, 2011
Monday, May 9, 2011
मानसून नहीं, सरकारी नीति से है खेती की दुर्दशा
इस साल मानसून के अच्छे होने का अनुमान मौसम विभाग द्वारा लगाया गया है लेकिन इससे खाद्य पदार्थो की मुद्रास्फीति नहीं घटने वाली। अहम सवाल खाद्य पदार्थो के उत्पादन और वितरण को लेकर सरकारी नीतियों का है। सही नीतियों के अभाव और कुप्रबंधन ने देश को खाद्यान्न संकट के कगार पर ला खड़ा किया है। इसके लिए पूर्ववर्ती एनडीए और मौजूदा यूपीए, दोनों सरकारें दोषी हैं। अनाजों व दालों की जितनी मांग है उस अनुपात में आपूर्ति घटती जा रही है। मुद्रास्फीति का पारा रिजर्व बैंक की कोशिशों के बाद भी खास नीचे नहीं आ रहा। खाद्यान्न उत्पादन इतना घटा है कि अनाज की कीमत में प्रतिवर्ष 10 प्रतिशत से अधिक का इजाफा देखा जा रहा है। 5 सालों में गेहूं की कीमतों में 25 फीसद तक की वृद्धि हुई है। खाद्यान्न उत्पादन 10 सालों से 210 बिलियन टन पर रुका हुआ है। इस दौरान आबादी करोड़ों में बढ़ी है। खाद्यान्न संकट के पीछे ग्लोबल सप्लाई गड़बड़ाना भी एक पक्ष है किंतु असली समस्या देश के भीतर ही है। हमने कृषि को उतनी तरजीह नहीं दी जितनी जरूरी थी। मानसून को दोष देकर कमियां छुपाते रहे। आज कृषि क्षेत्र में विकास दर महज दो फीसद है जबकि देश की वास्तविक श्रमशक्ति का लगभग 55 प्रतिशत हिस्सा अब भी कृषि पर ही निर्भर है। देश में खाद्यान्न संकट दूर करने के जो फौरी उपाय अपनाए जा रहे हैं उनसे तात्कालिक फायदा ही हो सकता है। ऐसी समस्या आए ही नहीं, इसके लिए दीर्घकालिक नीति बनानी होगी। किसानों के लिए केवल कर्जमाफी जैसे लुभावने कार्य न कर उनकी वास्तविक बेहतरी के प्रयास करने होंगे। अनाज उत्पादन को देश की प्राथमिकता बनानी होगी। इस रास्ते के स्पीडब्रेकर भले ‘सेज’ ही क्यों न हों, उनका खात्मा करना जरूरी है। पहली हरित क्रांति के दुष्प्रभाव से बचते हुए हमें दूसरी हरित क्रांति के लिए खुद को तैयार करना होगा। सरकार को चाहिए कि वह किसानों की मूल समस्या दूर करने को लक्ष्य बनाए। सिंचाई, खाद और अच्छे बीज की कमी, भंडारण सुविधा का अभाव, मौसम की मार, परिवहन की समस्या, बीमा की अच्छी व्यवस्था जैसे पहलुओं पर गम्भीरता से ध्यान दे। मुनाफाखोरी की समस्या दिनोंदिन विकराल हो रही है। कांट्रेक्ट और कारपोरेट खेती के नुकसान वाले पक्ष पर भी ध्यान देना जरूरी है। इस व्यवस्था में किसान एक खरीददार पर आश्रित हो जाता है इसलिए जरूरी है कि सहकारी समितियों के तंत्र को पर्याप्त मजबूती मिले। आयातनि र्यात नीति पर पुनर्विचार की जरूरत है। आयात की इतनी छूट न हो कि देसी किसानों की फसल मंडी से उठे ही नहीं और वे हतोत्साहित होकर कैश क्राप की ओर बढ़ें। हर हाल में आयातकों को कीमत नियंत्रित करने की स्थिति में नहीं पहुंचने देना चाहिए। निर्यात को तभी प्रोत्साहन मिले जब बम्पर फसल हो। सही नीतियों के अभाव के कारण संकट की स्थिति में भी निर्यात जारी रहता है जिससे देसी बाजार में जिंसों की कमी हो जाती है। वायदा बाजार व ऑनलाइन कमोडिटी ट्रेडिंग की व्यवस्था पर पुनर्विचार किया जा सकता है। सरकार को खाद्य वस्तुओं का मैनेजमेंट ठीक से करने में दक्ष होना होगा। सार्वजनिक वितरण पण्राली को मजबूती देनी होगी। नीतियों के स्तर पर वाणिज्य, वित्त एवं कृषि मंत्रालयों में कोआर्डिनेशन को बेहतर बनाना होगा। कृषि क्षेत्र में सब्सिडी के साथ-साथ निवेश को बढ़ाने की जरूरत है। कृषि में निवेश व कृषि के लिए निवेश दोनों में आ रही गिरावट रोकनी होगी। यह जरूरी है कि कृषि के क्षेत्र में शोध कायरे को महत्व मिले। इसके लिए नए कृषि विश्वविद्यालय खोले जाएं और पुराने को सक्षम बनाया जाए।
Saturday, May 7, 2011
एंडो सल्फान पर पाबंदी से राहत
केरल में खतरनाक कीटनाशक एंडोसल्फान के खिलाफ लंबे समय से संघर्षरत किसानों का संघर्ष आखिरकार कुछ रंग लाया है। तमाम ना नुकुर के बाद ही सही, जिनेवा में हुए ‘स्टाकहोम कंनवेंशन ऑन परसिस्टमेंट आग्रेनिक पॉल्यूटेंट्स’ पर हुई बैठक में भारत ने एंडोसल्फान के निर्यात पर प्रतिबंध लगाने में अपनी सहमति जता दी है। वहीं भारत के अंदर एंडोसल्फान के सुरक्षित व किफायती विकल्प ढ़ूंढ़े जाने तक इसका इस्तेमाल होता रहेगा और इसका इस्तेमाल अब 44 फसलों की बजाय 22 पर ही हो सकेगा। जो हो, इस घातक कीटनाशक के खिलाफ एक हद तक लड़ाई जीत ली गई है। मानव जीवन के लिए घातक इस कीटनाशक पर देशव्यापी प्रतिबंध की मांग बरसों से चल रही है। यह सरकार की उदासीनता का ही नतीजा है कि आज लड़ाई अदालत तक पहुंच गई है। एंडोसल्फान पर प्रतिबंध लगाने की मांग वाली याचिका पर हाल में सुप्रीम कोर्ट ने केंन्द्र समेत सभी सूबाई सरकारों को नोटिस जारी की है। मुख्य न्यायाधीश की कयादत वाली तीन सदस्यीय पीठ ने माकपा की युवा इकाई डेमोक्रेटिक यूथ फेडरेशन की याचिका पर सुनवाई के बाद नोटिस जारी कर सरकारों से जबाव मांगा है। याचिकाकर्ताओं की मांग है कि केन्द्र देश में एंडोसल्फान के मौजूदा स्वरूप या किसी अन्य स्वरूप में बिक्री पर प्रतिबंध लगाने का निर्देश दे। गौरतलब है कि देश में हरित क्रांति के दौरान खेती में रासायनिक खाद, हाईब्रीड बीज और कीटनाशक- जिसे अंग्रेजी में लैंड ग्रांड सिस्टम कहा जाता है, का प्रचलन बढ़ा जिसने भारतीय खेती की दशा और दिशा बदल कर रख दी। शुरू में निश्चित रूप से इस कारण अभूतपूर्व पैदावर बढ़ी, लेकिन आहिस्ता-आहिस्ता इनके अंधाधुंध इस्तेमाल ने भूमि की उर्वरा शक्ति घटा दी। साथ ही खेती और किसानों पर भी कीटनाशकों का कुप्रभाव पड़ने लगा। एंडोसल्फान ऐसा ही घातक कीटनाशक है। बीते वर्षो में मुल्क के कई हिस्सों में इसके खतरनाक प्रभाव की शिकायतें मिली हैं। खासतौर से केरल में इसके इस्तेमाल से कई घातक बीमारियां सामने आईं इसके दुष्प्रभाव से अब तक 400 से ज्यादा लोग मौत के मुंह में जा चुके हैं और 4000 से ज्यादा अपंग बताए जाते हैं। लिहाजा, केरल में ही इस पर पाबंदी की मांग सबसे पहली उठी और धरने-प्रदर्शन और बंद आयोजित हुए। केरल के एक सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल ने प्रधानमंत्री से मिलकर मांग की कि सरकार जिनेवा कंवेंशन में इस पर प्रतिबंध लगाने के लिए दबाव बनाए। राज्य के कसारगोड में हजारों लोग इसके दुष्प्रभाव से पीड़ित हैं। कभी अपनी हरियाली के लिए मशहूर कसारगोड का पर्यावरण आज पूरी तरह दूषित हो गया है। इसके इस्तेमाल से न सिर्फ वहां की जैव विविधता पर असर पड़ा है बल्कि पक्षियों और कीट-पतंगों की अनेक प्रजातियां भी विलुप्त होने की कगार पर हैं। आलम यह है कि पीड़ितों को केरल सरकार को राहत और मुआवजा भी देना पड़ रहा है। कीटों से बचाव के लिए खेतों में कीटनाशकों का इस्तेमाल नई बात नहीं है। लेकिन एंडोसल्फान की तुलना दूसरे कीटनाशकों से नहीं की जा सकती। इसके इस्तेमाल के दौरान और बाद में लोगों ने त्वचा और आंखों में जलन से लेकर अंगों के निष्क्रिय होने तक की अनेक शिकायतें की हैं। इसके इस्तेमाल से न सिर्फ लोगों की सेहत पर बुरा प्रभाव पड़ रहा है, बल्कि दिन-ब-दिन जमीन की उर्वरा शक्ति भी घट रही है। यही वजह है कि ज्यादातर मुल्कों ने इसे प्रतिबंधित कर दिया है। यूरोपीय संघ, आस्ट्रेलिया, ब्रिटेन, स्वीडन, नीदरलैंड, जर्मनी, ब्राजील और न्यूजीलैंड समेत 84 मुल्कों में फिलवक्त इस पर पाबंदी है। एंडोसल्फान का सबसे बड़ा उत्पादक अमेरिका है, लेकिन वहां भी इसके दुष्प्रभाव को देखते हुए, बीते साल इस पर पाबंदी लग गयी है। देश में केरल एकमात्र ऐसा सूबा है, जहां इस खतरनाक कीटनाशक पर सबसे पहले पाबंदी लगी। वहां 2005 से इसके इस्तेमाल पर पाबंदी है मगर शेष राज्यों में इसका इस्तेमाल धड़ल्ले से जारी है। जहां एक के बाद एक तमाम पश्चिमी मुल्क अपने यहां इसके इस्तेमाल पर पाबंदी लगा रहे हैं, वहीं हमारा मुल्क इसका सबसे बड़ा उपभोक्ता बना है। सरकार की दलील है कि इस पर पाबंदी लगाने से पैदावार में कमी आएगी। इससे शायद ही किसी को एतराज हो लेकिन ऐसी उपज का भी क्या फायदा, जो लोगोें की सेहत की कीमत पर हो? फिर खुद केंद्र और राज्य द्वारा गठित विषेषज्ञों की एक कमेटी ने अपने वैज्ञानिक अध्ययन में पाया है कि एंडोसल्फान घातक रसायन है और यह मानव विकास को प्रभावित कर सकता है। केरल का कसारगोड जिला इसकी छोटी सी मिसाल है। जहां तमाम राहत प्रयासों के बाद भी इसका प्रभाव दिख रहा है। ऐसे में इसे देश में पूरी तरह प्रतिबंधित न कर सरकार रसायन निर्माता बहुराष्ट्रीय कंपनियों का पक्ष ही ले रही है, जो हर लिहाज से गलत है। एक अनुमान के मुताबिक भारत में यदि एंडोसल्फान पर पाबंदी लगी तो इस उद्योग को हर साल 279 से 450 करोड़ का नुकसान होगा। मुल्क भर में एंडोसल्फान का उत्पादन फिलवक्त 9 हजार टन है। यानी, पूरी दुनिया के कुल उत्पादन का 50 फीसद भारत में होता है। जिसमें वह 70 फीसद निर्यात करता है। यही वजह है कि भारत सरकार इस पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगाने के लिए मन नहीं बना पा रही है। यह पहली बार नहीं है जब किसी कीटनाशक के खिलाफ दुनिया भर में एक साथ आवाज उठी हो। अतीत में गैमेक्सीन और डीडीटी जैसे रसायनों का दुष्प्रभाव देखते हुए इनके इस्तेमाल पर पाबंदी लगी है। एंडोसल्फान को संयुक्त राष्ट्र भी ‘अति खतरनाक’ श्रेणी में रख चुका है अत: इसके उत्पादन और बिक्री पर भारत में तुरंत रोक समय की दरकार है। स्टॉकहोम सम्मेलन ने हालांकि एंडोसल्फान को प्रतिबंधित कर दिया है फिर भी भारत कुछ रियायतें पाने में कामयाब हो गया है। 22 चुनिंदा फसलों पर इसका इस्तेमाल जारी रहेगा। यानी, इंसानी जिंदगी के लिए खतरनाक और हानिकारक कीटनाशक पर भारत में अभी भी पूरी तरह से पाबंदी नहीं लगी है। खैर! केरल के संघर्ष से हम आधी लड़ाई तो जीत गए हैं और आधी बाकी है।
Thursday, May 5, 2011
दरकार दूसरी श्वेत क्रांति की
पिछले दिनों राजस्थान की राजधानी जयपुर में वाजिब दाम नहीं मिलने के कारण दुग्ध उत्पादकों ने सड़क पर दूध बहाया और तीन दिन तक हड़ताल पर बैठे रहे। जयपुर में दूध की किल्लत बढ़ने और मामला गरमाता देख प्रदेश की सतारूढ़ कांग्रेस सरकार ने दुग्ध उत्पादकों की मांग का फौरी समाधान किया है। दुग्ध उत्पादक कालाडेरा में पशु आहार संयंत्र शुरू करने और दूध संकलन 500 रुपये प्रति किलोग्राम फैट की दर से किए जाने की मांग कर रहे थे। बेशक अस्थायी तौर पर जयपुर के दुग्ध उत्पादकों की हड़ताल समाप्त हो गई है, लेकिन समूचे देश का डेयरी उद्योग इस संकट से दो-चार हो रहा है। अमूल और मदर डेयरी जैसे संगठित क्षेत्र के दुग्ध उत्पादक अप्रैल की शुरुआत में दूध की कीमतें एक रुपये प्रति लीटर बढ़ा चुके हैं। वहीं असंगठित क्षेत्र के उत्पादक भी दूध की कीमतों में छह रुपये प्रति लीटर का इजाफा कर चुके हैं। मांग और लागत में बढ़ोतरी और कम उत्पादन के चलते आगे भी दूध की कीमतों में उफान आने वाला है। भारत में श्वेत क्रांति लाने वाले डॉ. वर्गीज कुरियन ने कुछ समय पहले कहा था कि ऑपरेशन फ्लड के बाद लोगों को पानी के मोल दूध उपलब्ध था। यह बात काफी हद तक सही है, क्योंकि 1908 के दशक में दिल्ली और मुंबई जैसे महानगरों में बोतलबंद पानी और दूध की कीमतें एक ही स्तर पर थीं। मगर भटकी हुई सरकारी नीतियों की वजह से श्वेत क्रांति का आधार ही बिखर गया है। नतीजन अब दूध की बढ़ती मांग के सामने डेयरी सेक्टर की सांस उखड़ती जा रही हैं। 1950 से 1960 के बीच डेयरी उद्योग की सालाना विकास दर 1.2 फीसदी थी और 2009-10 में डेयरी उद्योग की विकास दर चार फीसदी रही है। दूसरी ओर शहरी लोगों के खाने के खर्च में दूध की हिस्सेदारी 1971-72 में 14.47 फीसदी और ग्रामीण लोगों के खाने में दूध की हिस्सेदारी 10.01 फीसदी थी। अब ग्रामीण और शहरी लोगों के खाने में दूध की हिस्सेदारी बढकर क्रमश: 14.88 और 18.31 फीसदी हो गई है। जाहिर है कि लोगों की आमदनी बढ़ने के साथ दूध की मांग में तो इजाफा हुआ है, लेकिन इसी अनुपात में दूध का उत्पादन नहीं बढ़ा है। देश की बढ़ती दूध की मांग पूरी करने के लिए 1970 में ऑपरेशन फ्लड की शुरुआत की गई थी। व्यावसायिक रूप से सफल गुजरात के आनंद मिल्क यूनियन लिमिटेड यानी अमूल की तर्ज पर देश भर में डेयरी संघ बनाए गए और केंद्रीय स्तर पर राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड का गठन किया गया। देश के 700 शहरों और कस्बों को जोड़कर राष्ट्रीय दूध जाल बनाया गया और इसके सकारात्मक परिणाम भी देखने को मिले। 1951 में प्रति व्यक्ति 132 ग्राम दूध उपलब्ध था। वहीं, 1991 में प्रति व्यक्ति दूध की उपलब्धता बढ़कर 220 ग्राम हो गई। असल में श्वेत क्रांति के समय दूध के उत्पादन में कोई खास बढ़ोतरी नहीं हुई, बल्कि उस समय दूध के संग्रहण, शीतलीकरण और विपणन तंत्र में सुधार किया गया था। सीधे शब्दों में कहें तो ऑपरेशन फ्लड के तहत ग्रामीण इलाकों के दूध को शहरी बाजार तक पहंुचाने का तंत्र खड़ा किया गया था। समय बीतने के साथ डेयरी संघों पर छुटभैये नेताओं का कब्जा होता गया और अब दूध विपणन का यह तंत्र दरक गया है। दूध उत्पादन में बढ़ोतरी नहीं होने का एक कारण इस क्षेत्र में शोध और तकनीक का अभाव भी है। विश्व के कुल मवेशियों में से 12 फीसदी भारत में हैं और वैश्विक उत्पादन का 16 फीसदी दूध उत्पादित किया जाता है। अमेरिका में मवेशियों की संख्या विश्व की मात्र 4-5 फीसदी है, जबकि वहां विश्व के 11 फीसदी दूध का उत्पादन होता है। हमारे देश में प्रति दुधारू पशु 1,000 लीटर सालाना दूध का उत्पादन होता है, जबकि वैश्विक औसत 8,000 से 10,000 लीटर सालाना का है। किसानों में पशुपालन की वैज्ञानिक जानकारी का अभाव है और संक्रामक रोगों के कारण हर साल बड़े पैमाने पर दुधारू पशुओं की मौत हो जाती है। श्वेत क्रांति के शोरगुल में गाय-भैंसों की देसी नस्लों की जमकर उपेक्षा की गई और विदेशी नस्ल के पशुओं को बढ़ावा दिया गया। विदेशी नस्ल के पशुओं का रख-रखाव महंगा है और कृत्रिम गर्भाधान के आधे-अधूरे ज्ञान से पैदा की गई संकर नस्लों ने किसानों की कब्र खोदने का काम किया है। यह अजीब संकर नस्ल के पशु न तो दूध देते हैं और खेती के काम भी नहीं आते हैं। सदियों से सम्मान पाती आई देसी गाय घरों से बेदखल होकर सड़कों पर घूम रही हैं। दोषपूर्ण सरकारी नीतियों के कारण देश में बूचड़खानों की संख्या तो बढ़ती जा रही है, लेकिन इससे पशुओं की संख्या में तेजी से गिरावट आई है। मांस और चमड़े के लालच में पशु-वध की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है और 120 करोड़ लोगों के इस देश महज 16 करोड़ पशु बचे हैं। मोटे अनुमान के अनुसार, गौधन की रक्षा के लिए 25,000 गौशालाओं की जरूरत है, लेकिन फिलहाल यह संख्या 6,000 ही है। दुधारू पशुओं के वध पर रोक के बावजूद इंदौर और बुंदेलखंड गाय समेत दूसरे पशुओं के कटान के अड्डों में तब्दील हो गए हैं। सबसे बड़ी बात यह है कि देशभर में केवल 40 फीसदी पशुओं के लिए ही पौष्टिक चारा उपलब्ध है, लेकिन सरकार खली के निर्यात में लगी हुई है। चारागाह सिकुड़ते जा रहे हैं और मवेशियों को पौष्टिक चारा मुहैया करवाए बगैर दूध उत्पादन में बढ़ोतरी का दावा खोखला ही कहा जाएगा। हमारे देश में 70 फीसदी दूध का उत्पादन छोटे, सीमांत और भूमिहीन किसान करते हैं और किसानों की आय का यह बेहतरीन जरिया है। राष्ट्रीय अपराध ब्यूरो के आंकड़े इस बात के गवाह हैं कि डेयरी सेक्टर के फैलाव वाले इलाकों में किसान आत्महत्या नहीं कर रहे हैं। गुजरात में अमूल की वलसाड यूनियन अपना 80 फीसदी दूध जनजातीय इलाकों से इकट्ठा करती है। डेयरी की मार्फत किसानों के विकास की यह कहानी मध्य प्रदेश, छतीसगढ़ और दूसरे नक्सल प्रभावित इलाकों में भी दोहराई जा सकती है। गुजरात का डेयरी सेक्टर सफल है, क्योंकि अमूल के नफे-नुकसान में किसानों की सीधी भागीदारी है। पिछले दिनों सरकार ने दूध की ऊंची कीमतों से राहत देने के नाम पर डेयरी उत्पादों के आयात शुल्क में कमी की थी। सवाल है कि भारतीय खली का निर्यात करके विदेशी मिल्क पाउडर मंगाने की बजाए सरकार किसानों को प्रोत्साहन क्यों नहीं देती है। संसद में पेश आर्थिक समीक्षा में सरकार ने स्वीकार किया है कि 2021-22 तक दूध की मांग 18 करोड़ टन हो जाएगी। दूध का मौजूदा उत्पादन 11.2 करोड़ टन है और मांग को पूरा करने के लिए सालाना 5.5 फीसदी की रफ्तार से दुग्ध उत्पादन में बढ़ोतरी करनी होगी। कोई दोराय नहीं है कि चॉकलेट और मिठाई की बढ़ती मांग के चलते दूध की कीमतें और ऊपर जाएंगी। अगर नीति-निर्धारक देश में दूसरी श्वेत क्रांति लाना चाहते हैं तो डेयरी संघों पर नेताओं का कब्जा हटाकर किसानों के हित में बुनियादी कदम उठाने होंगे। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं).
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