मनोज सिंह शुमाली, जमशेदपुर महिलाओं का खेत-खलिहान से नाता नया नहीं है। बात सर्द पानी में धान रोपने की हो या फिर फसल काटने की महिलाएं अपनी मेहनत का लोहा मनवा रहीं हैं। झारखंड सरकार अब सुखाड़ से जूझते जिलों में सिंचाई व्यवस्था की कमान अदिवासी महिलाओं को सौंपने जा रही है। इसकी शुरुआत जमशेदपुर से होने जा रही है। जिला प्रशासन ने महत्वपूर्ण योजना के तहत जिले में सिंचाई के लिए डीप बोरिंग की चाबी महिला स्वयं सहायता समूहों को सौंपने की तैयारी की है। यानी घर की रसोई संभालने वाली गांव की गरीब आदिवासी महिलाएं अब खेतों की सिंचाई को भी दिशा देंगी। महिलाएं अपने छोटे-छोटे सूखे खेतों की दशा सुधारने के साथ ही जरूरतमंद दूसरे लोगों को भी सिंचाई का पानी उपलब्ध कराने में सक्षम होंगी। ऐसे में यह महिलाएं साज-सब्जी की खेती करके अपना और परिवार का भला कर सकेंगी और आत्मनिर्भर बनेंगी। इसके लिए महिला स्वयं सहायता समूहों को डीप बोरिंग प्रोजेक्ट लगाकर दिया जाएगा। व्यवस्था इस तरह की होगी कि पानी को एक जगह टंकी में स्टोर करने के बाद पाइप के जरिए खेतों तक पहुंचाया जाएगा। इसके बाद इसे जरूरत के हिसाब से सिंचाई के काम में लाया जाएगा। किन फसलों की कितनी सिंचाई हो चुकी है और कितनी बाकी है इसका लेखा-जोखा महिलाएं ही रखेंगी। जिला ग्राम्य विकास प्राधिकरण (डीआरडीए) की निदेशक उमाशशि चटर्जी ने बताया कि जल्द ही अनुदान ऋण शिविर में इस योजना की शुरुआत कर दी जाएगी। पूर्वी सिंहभूम की उपायुक्त हिमानी पांडे ने कहा, गांव की बीपीएल परिवार की महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने के लिए इस योजना की शुरुआत की जा रही है। इसमें आदिवासी समाज से जुड़ी उन गरीब महिलाओं का खास ध्यान में रखा गया है जो साग-सब्जी की खेती करके परिवार का पालन-पोषण करती हैं। इस योजना के सहारे वे ज्यादा कारगर ढंग से खुद को स्थापित कर सकेंगी।
Sunday, January 23, 2011
सिंचाई व्यवस्था को दिशा देंगी आदिवासी महिलाएं
मनोज सिंह शुमाली, जमशेदपुर महिलाओं का खेत-खलिहान से नाता नया नहीं है। बात सर्द पानी में धान रोपने की हो या फिर फसल काटने की महिलाएं अपनी मेहनत का लोहा मनवा रहीं हैं। झारखंड सरकार अब सुखाड़ से जूझते जिलों में सिंचाई व्यवस्था की कमान अदिवासी महिलाओं को सौंपने जा रही है। इसकी शुरुआत जमशेदपुर से होने जा रही है। जिला प्रशासन ने महत्वपूर्ण योजना के तहत जिले में सिंचाई के लिए डीप बोरिंग की चाबी महिला स्वयं सहायता समूहों को सौंपने की तैयारी की है। यानी घर की रसोई संभालने वाली गांव की गरीब आदिवासी महिलाएं अब खेतों की सिंचाई को भी दिशा देंगी। महिलाएं अपने छोटे-छोटे सूखे खेतों की दशा सुधारने के साथ ही जरूरतमंद दूसरे लोगों को भी सिंचाई का पानी उपलब्ध कराने में सक्षम होंगी। ऐसे में यह महिलाएं साज-सब्जी की खेती करके अपना और परिवार का भला कर सकेंगी और आत्मनिर्भर बनेंगी। इसके लिए महिला स्वयं सहायता समूहों को डीप बोरिंग प्रोजेक्ट लगाकर दिया जाएगा। व्यवस्था इस तरह की होगी कि पानी को एक जगह टंकी में स्टोर करने के बाद पाइप के जरिए खेतों तक पहुंचाया जाएगा। इसके बाद इसे जरूरत के हिसाब से सिंचाई के काम में लाया जाएगा। किन फसलों की कितनी सिंचाई हो चुकी है और कितनी बाकी है इसका लेखा-जोखा महिलाएं ही रखेंगी। जिला ग्राम्य विकास प्राधिकरण (डीआरडीए) की निदेशक उमाशशि चटर्जी ने बताया कि जल्द ही अनुदान ऋण शिविर में इस योजना की शुरुआत कर दी जाएगी। पूर्वी सिंहभूम की उपायुक्त हिमानी पांडे ने कहा, गांव की बीपीएल परिवार की महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने के लिए इस योजना की शुरुआत की जा रही है। इसमें आदिवासी समाज से जुड़ी उन गरीब महिलाओं का खास ध्यान में रखा गया है जो साग-सब्जी की खेती करके परिवार का पालन-पोषण करती हैं। इस योजना के सहारे वे ज्यादा कारगर ढंग से खुद को स्थापित कर सकेंगी।
बंदूक के साये में प्याज की खेती
प्याज के दामों में लगी आग के कारण हरियाणा के किसान गेहूं छोड़ प्याज की खेती में लग गए हैं। किसानों के बढ़ते आकर्षण का ही नतीजा है कि प्याज की पौध के दामों में भी उछाल आ गया है। मांग बढ़ने से खेतों में खड़ी प्याज की पौध के चोरी होने को अंदेशा है। ऐसे में किसान हथियारों के साथ पौध पर दिन रात पहरा दे रहे हैं। हरियाणा में किसान रबी सीजन में गेहूं की फसल को प्रमुखता देते हैं। सूबे में करीब 25 लाख हेक्टेयर रकबे में गेहूं की बुआई होती है। इस साल देश भर में प्याज का खुदरा मूल्य सौ रुपये प्रति किलो तक जा पहुंचा। अभी भी प्याज 50 रुपये किलो से अधिक चल रहा है। ज्यादा से ज्यादा लाभ की उम्मीद में किसान प्याज की फसल लगाने की तैयारी में जुटे हैं। विभिन्न जिलों में रोपाई का काम जोरों पर है। पिछले साल कुरुक्षेत्र जिले में प्याज का रकबा साढ़े सात सौ हेक्टेयर था। बागवानी विभाग के अनुसार, इस बार इसमें कई गुणा वृद्धि होने की संभावना है। बहुत से किसानों ने गेहूं का मोह छोड़ प्याज के लिए खेत खाली छोड़ रखे हैं। आलू उखाड़ने के बाद खाली हुए रकबे में प्याज की रोपाई हो रही है।प्याज के प्रति आकर्षण देख प्याज की पौध तैयार करने वाले किसानों ने इसके दाम भी एकाएक बढ़ा दिए हैं। इस बार 50 रुपये प्रति किलो के हिसाब से पौध बिकी है। हालांकि जिन किसानों की पौध ज्यादा उम्र की होती जा रही है, वह उसे कुछ कम दाम कर बेच रहे हैं। प्याज की पौध की बढ़ी मांग के चलते इसके चोरी होने का भी डर बना हुआ है। कई जगह पौध चोरी की घटनाएं हुई। हालांकि यह मामला थाने तक नहीं पहुंचा है। ऐसे में मुख्य सड़क के आसपास तैयार प्याज की पौध पर किसान 24 घंटे पहरा दे रहे हैं। कइयों ने तो अपने लाइसेंसी हथियार भी अपने पास रखे हैं। बंदूक के साथ प्याज की फसल पर पहरा दे रहे गांव बीड सौंटी के किसान हरबंस सिंह और ध्यान सिंह का कहना है कि पौध के दाम इतने बढ़ चुके हैं कि इसकी चोरी का खतरा है। उनके खेत जंगल के पास है, यहां चोरी की संभावना ज्यादा रहती है। ऐसे में उन्हें दिन-रात निगरानी करनी पड़ रही है। सब्जी विशेषज्ञ डा. सीबी सिंह का कहना है कि प्रदेश में पहली बार प्याज के प्रति किसान इतने आकर्षित होते दिखाई दिए हैं। किसान महंगे दामों में पौध खरीदकर प्याज की रोपाई करने में जुटे हैं।
दाने-दाने को मोहताज अन्नदाता
कर्ज के बोझ तले किसानों की आत्महत्याओं और गरीबी के कारण लाखों लोगों के भूखे सो जाने की खबरें बताती हैं कि आज हालात किस तरह बिगड़े हुए हैं। ऐसे समय में किसानों और गरीबों को संबल देना समाज व सरकार दोनों की ही जिम्मेदारी है। जिंदगी में मुसीबतें आती हैं किंतु उनसे लड़ने का हौसला खत्म हो जाए तो क्या बचता है? ऐसे में सरकारी तंत्र को ज्यादा संवेदना दिखाने की जरूरत है। उसे यह प्रदर्शित करना होगा कि वह किसानों के दर्द में शामिल है। कर्ज लेने और न चुका पाने का जो भंवर हमने शुरू किया है, उसकी परिणति तो यही होनी थी। भारतीय खेती का चेहरा, चाल और चरित्र सब कुछ बदल रहा है। खेती अपने परंपरागत तरीकों से हट रही है और नए रूप ले रही है। आज सरकारी तंत्र के लिए यह गंभीर चिंता का विषय है कि इतनी सारी किसान समर्थक योजनाओं के बावजूद क्यों किसान आत्महत्या के लिए मजबूर हैं। किसान इस जाल में लगातार फंस रहे हैं और कर्ज का बोझ लगातार बढ़ रहा है। बाजार की नीतियों के चलते उन्हें सही बीज, खाद और कीटनाशक घटिया मिलते हैं। जाहिर तौर पर इसने भी फसलों के उत्पादन पर विपरीत प्रभाव डाला है। इसके चलते आज खेती हानि का व्यवसाय बन गई है। अन्नदाता खुद एक कर्ज के चक्र में फंस जाता है। मौसम की मार अलग है। सिंचाई सुविधाओं के सवाल तो जुड़े ही हैं। किसान के लिए खेती आज लाभ का धंधा नहीं रही। वह एक ऐसा कुचक्र बन रही है जिसमें फंसकर वह कहीं का नहीं रह पा रहा है। उसके सामने परिवार को पालने से लेकर आज के समय की तमाम चुनौतियों से जूझने और संसाधन जुटाने का साहस नहीं है। वह अपने परिवार की जरूरतों को पूरा नहीं कर पा रहा है। कर्ज में डूबा किसान आज मौसम की मार, खराब खाद और बीज जैसी चुनौतियों के कारण अगर हताश और निराश है तो उसे इस हताशा से निकालने की जिम्मेदारी आखिर किसकी है? आज सरकार, समाज और मीडिया को मिलकर एक वातावरण बनाना होगा कि समाज में गरीबों और किसानों के प्रति आदर बढे़ और उसे दो जून की रोटी की उपलब्धता सुनिश्चित हो ताकि वह मौत को गले न लगाएं। मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने हालांकि तुरंत इस विषय में धोषणा करते हुए कहा कि किसानों को फसल का पूरा मुआवजा मिलेगा और किसानों को आठ घंटे बिजली भी मिलने लगेगी। निश्चय ही मुख्यमंत्री की यह घोषणा कि किसानों को हुए नुकसान के बराबर मुआवजा मिलेगा एक संवेदशील घोषणा है। सरकार को भी इन घटनाओं के अन्य कारण तलाशने में समय गंवाने की बजाय किसानों को आश्वस्त करना चाहिए। मूल चिंता यह है कि किसानों की स्थिति को देखते हुए जिस तरह बैंक कर्ज बांट रहे हैं और किसानों को लुभा रहे हैं वह कहीं न कहीं किसानों के लिए घातक साबित हो रहा है। कर्ज लेने से किसान उसे समय पर चुका न पाने कारण अनेक प्रकार से प्रताडि़त हो रहा है और उसके चलते उस पर दबाव बन रहा है। सरकार में भी इस बात को लेकर चिंता है कि कैसे हालात संभाले जाएं? इस संदर्भ में सरकार खाद्य सुरक्षा के अधिकार विधेयक को पारित करके देश की एक बड़ी आबादी के रूप में रह रहे किसानों की बड़ी मदद कर सकती है। सरकार के तंत्र को सिर्फ संवेदनशीलता के बल पर इस विषय से जूझना चाहिए। उम्मीद की जानी चाहिए अन्नदाताओं के मनोबल को बढ़ाने के लिए सरकार कुछ ऐसे कदम उठाएगी जिससे वे आत्महत्या जैसे कदम उठाने के लिए विवश न हों। व्यावसायिक लाबियों के दबाव में हमारे केंद्रीय कृषि मंत्री किस तरह की बयानबाजी कर रहे हैं, यह सारे देश ने देखा है। एक तरफ बर्बाद फसल तो दूसरी ओर बढ़ती महंगाई, आखिर आम आदमी के लिए इस गणतंत्र में आखिर क्यों नहीं जगह हो सकती है? यह सब एक संवेदनशील समाज को झकझोरकर जगाने के लिए पर्याप्त हैं, लेकिन इसके बावजूद हमारे सत्ताधीशों की कुंभकर्णी निद्रा जारी है। ऐसे में क्या हम दिल पर हाथ रखकर यह दावा कर सकते हैं कि हम एक लोककल्याणकारी राज्य की शर्तो को पूरा कर रहे हैं। नौकरशाही किसानों की आत्महत्याओं को एक अलग रंग देने में लगी है। सत्ता में बैठे नेता जनता को गुमराह जरूर कर सकते हैं, लेकिन किसानों की आह लेकर कोई भी राजसत्ता लंबे समय तक सिंहासन पर नहीं रह सकती है। इस बारे में समय रहते हमें सोचना होगा और यथोचित कदम उठाने होंगे।
धान खरीद के लिए किसानों को पुचकारेंगे सरकारी कर्मी
उत्तर प्रदेश में खाद्य एवं रसद विभाग के अधिकारी-कर्मी धान खरीद के लिए किसानों को पुचकारेंगे। अफसरों के लिए धान खरीद का लक्ष्य चुनौती बन गया है। बीस लाख मीट्रिक टन खरीद लक्ष्य के विपरीत साढ़े तीन माह में महज 8.94 लाख मीट्रिक टन की ही खरीद हो सकी है। अब डेढ़ माह से भी कम समय बचा है और 11 लाख मीट्रिक टन से भी अधिक की खरीद होनी बाकी है। गत दिनों शासन ने सभी जिलों के अफसरों को खरीद बढ़ाने के लिए निर्देश के साथ ही ताकीद की कि क्रय केंद्रों पर लगे कर्मचारी किसानों के साथ व्यवहार में बदलाव लायें। इसकी जांच के लिए खाद्य विभाग के वरिष्ठ अधिकारी जल्दी ही क्रय केंद्रों का दौरा कर किसानों से सच्चाई जानेंगे। चावल मिलों के लिए तय कर दिया गया है कि जब तक वे सरकारी धान खरीद से बनने वाला पूरा चावल (सीएमआर) भारतीय खाद्य निगम के डिपो पर नहीं जमा कर देती हैं तब तक सरकार उनसे किसानों की सीधे खरीद से बनने वाला चावल (लेवी) नहीं लेगी। इस पर नजर रखने के लिए खाद्य एवं रसद विभाग के विपणन अधिकारियों से कहा गया है। सूत्र बताते हैं कि 8.94 लाख मीट्रिक टन धान की सरकारी खरीद के आधार पर 5.27 लाख मीट्रिक टन चावल खाद्य निगम के डिपो पर पहुंचना चाहिए लेकिन मिलों ने अभी तक 2.67 लाख मीट्रिक टन ही जमा किया है। मिलों के इस रवैये के आधार पर अनुमान है कि मिलें धान की सरकारी खरीद से बनने वाले चावल को देने के बजाय स्वयं द्वारा खरीदे गये धान से बनने वाले चावल को डिपो तक पहुंचाने में ज्यादा दिलचस्पी दिखा रही हैं। ज्ञात हो, प्रदेश में धान की सरकारी खरीद 1 अक्टूबर से शुरू हो जाती है। खाद्य विभाग, पीसीएफ, यूपी एग्रो, राज्य खाद्य एवं आवश्यक वस्तु निगम और कर्मचारी कल्याण निगम को 20 लाख मीट्रिक टन खरीद का लक्ष्य दिया गया लेकिन 18 जनवरी तक एजेंसियां आठ लाख 94 हजार 760 मीट्रिक टन धान ही खरीद सकी हैं।
Friday, January 21, 2011
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