सिरसा वेद-पुराण सिर्फ हमारी सभ्यता-संस्कृति के वाहक नहीं, बल्कि अभी भी सफलता की गारंटी हैं। वैदिक युग के नुस्खे से मिश्रित या सामुदायिक खेती से जबर्दस्त नतीजे लेकर सिरसा के छोटे से कस्बे के किसान हरपाल सिंह ग्रेवाल ने कुछ यही साबित किया है। सिरसा से 12 किलोमीटर दूर स्थित बाबा सावन सिंह थेड़ी के किसान हरपाल सिंह ग्रेवाल ने वेद-पुराणों में वर्णित कृषि पद्धति को आधुनिक प्रयोगों के संग अपनाकर खेती की अनोखी राह दिखाई है। पिता से मिले ज्ञान के तहत वे अपने खेतों में एक साथ चार फसलों की उपज ले रहे हैं। इससे न केवल अधिक उपज होती है, बल्कि परंपरागत खेती की कई समस्याओं से भी मुक्ति मिलती है और फसल चक्र जैसे मसले का अंत भी। वह बताते हैं कि अग्निहोत्र, वृक्ष आयुर्वेद, पांचांग आदि पुराणों में कृषि के विविध रूपों को वर्णित किया गया है। इस नुस्खे या मिश्रित खेती में चार फसलों की एक साथ खेती होती है। इनके बीजों को एक साथ मिलाकर इसकी बुवाई की जाती है। पिछले 20 वर्षो से गेहूं, चना, सरसों व अलसी की पैदावार एक साथ प्राप्त रहे हैं। मिश्रित खेती से पैदावार भी अधिक मिल रही है। एक एकड़ में गेहूं 10 क्विंटल, चना छह क्विंटल, अलसी एक क्विंटल तथा सरसों पांच क्विंटल प्राप्त होता है। ग्रेवाल के साथ अब कई किसान जुड़ गए हैं और उन्होंने डाल दी है सामुदायिक खेती की नींव। अभी वह रूपाली शेरगिल, दलजीत सिंह भड़ाल, जसपाल सिंह ग्रेवाल व खुद की लगभग 87 एकड़ जमीन में सामुदायिक खेती कर रहे हैं। ग्रेवाल से खेती का यह गुर सीखने अमेरिका, आस्ट्रेलिया से हर वर्ष किसानों के दल आ रहे हैं। ग्रेवाल ने फसलों की सिंचाई के लिए वाटर हार्वेस्टिंग को अपनाया है। इसके तहत 4.1 एकड़ भूमि में वाटर बैंक बनाया है। 95 फीट चौड़ाई तथा 17 फीट गहराई वाला वाटर बैंक पर्यावरण को भी अनुकूल रखता है। सवाल रहा इन चारों फसलों को काटने के बाद अलग करना तो ग्रेवाल के अनुसार इसमें कोई परेशानी नहीं होती। पहले सरसों की फसल को काटा जाता है और शेष तीन फसलों को एक साथ काटते हैं। पुराने समय में सिरकियां या झारना होती थीं। उसी विधि से इन्हें आसानी से अलग कर लिया जाता है। झारना लोहे की प्लेट होती है जिसमें अलग-अलग आकार के छेद होते हैं। थ्रेसर में अलग-अलग आकार के झारने का प्रयोग करके एक ही समय में गेहूं, चना व अलसी को अलग कर लिया जाता है|
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Sunday, March 6, 2011
Friday, February 25, 2011
मप्र और कर्नाटक में एक फीसदी पर मिलेगा कृषि ऋण
मध्य प्रदेश और कर्नाटक में किसानों को एक फीसदी दर पर कृषि ऋण मिल सकेगा। मप्र में पेश आम बजट और कर्नाटक में अपनी तरह के पहले कृषि बजट में इस आशय की घोषणा की गई। मध्य प्रदेश में वित्त मंत्री राघवजी ने गुरुवार को प्रदेश का बजट पेश किया। बाद में पत्रकारों से बातचीत में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने बताया कि मैंने जो कहा था वह करके दिखा दिया। गरीबों पर आधा बजट खर्च करने की घोषणा की थी, बजट के माध्यम से उसे पूरा कर दिया। किसानों को कर्ज के दलदल से उबारने के लिए एक फीसदी दर पर कृषि ऋण के लिए बजट में प्रावधान किया गया है। इसी तरह, कर्नाटक में मुख्यमंत्री बीएस येद्दयुरप्पा ने 17,857 करोड़ रुपये का कृषि बजट प्रस्तुत किया। इसमें किसानों को एक प्रतिशत ब्याज की दर से कृषि ऋण देने का प्रावधान प्रस्तावित है। मुख्यमंत्री ने बताया कि फसल ऋण तीन लाख रुपये तक का होगा। दस लाख किसान परिवारों की तरक्की के लिए सुवर्णा भूमि योजना के तहत एक हजार करोड़ रुपये व्यय का प्रावधान होगा।
Wednesday, February 23, 2011
कर्नाटक लाएगा अलग कृषि बजट
कर्नाटक के मुख्यमंत्री बीएस येद्दयुरप्पा गुरुवार को कृषि के लिए अलग से बजट पेश करेंगे। ऐसा करने वाले वह देश के पहले मुख्यमंत्री और कर्नाटक पहला राज्य होगा। येद्दयुरप्पा जो सूबे के वित्त मंत्री भी हैं और दक्षिण भारत में भारतीय जनता पार्टी के सरकार के पहले मुख्यमंत्री हैं। येद्दयुरप्पा मुख्यमंत्री के रूप में चौथी बार आम बजट पेश करेंगे। इससे पहले राज्य में राष्ट्रपति शासन से पूर्व जनता दल सेक्यूलर (जेडीएस) और भाजपा की गठबंधन सरकार (2006-07) में वह उप मुख्यमंत्री और वित्त मंत्री थे। तब उन्होंने अपने 20 माह के कार्यकाल में दो बार बजट पेश किया था। इस बीच विपक्षी दल कांग्रेस और जेडीएस ने भाजपा द्वारा अलग से कृषि बजट पेश किए जाने की आलोचना की है। विपक्षी दलों को कहना है येद्दयुरप्पा की यह एक नई नौटंकी है, लेकिन मुख्यमंत्री जो खुद को एक किसान का बेटा कहते हैं, ने अपने दृढ़ता से अपने विचार (कृषि बजट) का बचाव किया है। उनका कहना है, किसानों की यह लंबे समय से चली आ रही मांग है, और जब मैं विपक्ष का नेता था तब भी मैं इस विचार का समर्थन करता था। 25 मई 2008 को राज्य के मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने वाले येद्दयुरप्पा ने वादा किया कि वह किसानों को एक फीसदी वार्षिक ब्याज की दर पर ऋण उपलब्ध कराएंगे। संभावना है कि ऋण की राशि का खुलासा गुरुवार को बजट में घोषित कर दी जाएगी। मुख्यमंत्री के अलग से कृषि बजट पेश करने के मामले पर आइआइएम बेंगलूर का कहना है कि येद्दयुरप्पा ने बहुत ही हतोत्साहित करने वाला कार्य अपने हाथों में लिया है
Tuesday, February 22, 2011
मौत के खेल में किसानों का इस्तेमाल
यूपी में मिलावटखोरों का धंधा तो फल फूल रहा ही है, कच्ची सब्जियों को कृत्रिम रंग से रंग कर खुलेआम हर बाजारों में बेंचा जा रहा है। यही नहीं गहरी नींद में सो रही सरकार की लाचारी का फायदा उठाते हुए बड़े सौदागर सब्जियों में हार्मोन्स की सूई लगाकर पैदावार बढ़ाने में किसानों का इस्तेमाल कर रहे हैं। कृषि और हार्टीकल्चर विभाग की उदासीनता से जहर के सौदागरों का हौंसला बुलंद है तो खा एवं औषधि प्रशासन विभाग सब्जियों में ऑक्सीटोसिन के इस्तेमाल से पल्ला झाड़ लिया है। वह कह रहा है कि सब्जियों में हार्मोन्स की सूई लगाने को रोकने की जिम्मेदारी हार्टीकल्चर विभाग की है।
हरी सब्जियां ग्रीन प्वाइजन बन चुकी हैं। सरकार इससे बेतकल्लुफ है। जहर के सौदागरों ने लौकी, गाजर, खीरा, करैला, शलजम, टमाटर से लेकर यहां तक कि पपीते में ऑक्सीटोसिन का इंजेक्शन लगाकर पैदावार बढ़ाने और उसके प्राकृतिक आकार में बदलाव पैदा कर दिया है। जहर का यह कारोबार खुलेआम हो रहा है। इसके अलावा सब्जियों को कृत्रिम रंग से रंगने का काम भी बड़ी-बड़ी मंडियों में चल रहा है। आरटीआई ऐक्टिविस्ट सलीम बेग द्वारा पूछे गए सूचना का अधिकार के तहत खा एवं औषधि प्रशासन विभाग के आयुक्त ने स्वीकार भी किया है कि प्रदेश में कृत्रिम रूप से रंगी गई कच्ची सब्जियों के 124 नमूने संग्रहीत कर जांच कराई गई। जांच में पांच नमूने अखा रंगों से रंगे हुए पाए गए। खा आयुक्त ने बताया कि अखा रंगों से रंगी पाई गई पांच नमूनों की सब्जियों के विक्रेताओं को दंडित कराने के लिए खा अपमिश्रण निवारण अधिनियम के तहत मुकदमा सक्षम न्यायालय में दायर कराए गए। दरअसल जहर के बड़े कारोबारियों के हाथ इतने लम्बे हैं कि खा एवं औषधि प्रशासन विभाग उन्हें पकड़ने की हिमाकत नहीं कर पाता है। विभाग सिर्फ छापेमारी के जरिए उसे ही पकड़ रहा है जो उनके हाथों की कठपुतली बने हुए हैं। सब्जियों में हार्मोन्स की सूई लगाने जैसे अपराध पर भी विभाग ने अपना पल्ला झाड़ लिया है। डीएनए ने जब खा एवं औषधि प्रशासन विभाग के विशेष सचिव शिव श्याम मिश्रा से इस बाबत पूछा तो वे हार्टीकल्चर विभाग पर इसका ठीकरा फोड़ने लगे। श्री मिश्र ने कहा कि पहले आप हार्टीकल्चर से यह पूछो कि वे सब्जियों, फलों व अन्य शाक-भाजी के विकास में क्या प्रमोट करते हैं? वह यूरिया है या अन्य फर्टिलाइजर? अगर सब्जियों की पैदावार में ऑक्सीटोसिन इस्तेमाल किया जा रहा है तो इसे रोकने की जिम्मेदारी उनकी है। हमारी नहीं। उधर विशेष सचिव ने कहा कि हमने 29 लाख ऑक्सीटोसिन के डोज छापेमारी के दौरान पकड़े हैं। बीते नौ महीने में 76 को जेल भेजा है और 89 लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराई है। मगर खा एवं औषधि प्रशासन विभाग ने सब्जियों में हार्मोन्स की सूई लगाकर पैदावार बढ़ाने सम्बंधी किसी ऐसी शिकायत से साफ इनकार कर दिया है। मगर जिस प्रकार कृत्रिम रूप से रंगी गई कच्ची सब्जियों को बेचने तथा हार्मोन्स की सूई के जरिए सब्जियों की पैदावार बढ़ाई जा रही है उससे घातक बीमारियां हो सकती हैं। आयुर्वेदिक चिकित्सक डॉ. भगवान सिंह ने बताया कि रंगी गई सब्जियों से चर्म रोग, अल्सर तथा पाचन तंत्र खराब हो जाता है। आंतों पर प्रभाव पड़ता है। कैंसर की संभावना बढ़ जाती है।
हरी सब्जियां ग्रीन प्वाइजन बन चुकी हैं। सरकार इससे बेतकल्लुफ है। जहर के सौदागरों ने लौकी, गाजर, खीरा, करैला, शलजम, टमाटर से लेकर यहां तक कि पपीते में ऑक्सीटोसिन का इंजेक्शन लगाकर पैदावार बढ़ाने और उसके प्राकृतिक आकार में बदलाव पैदा कर दिया है। जहर का यह कारोबार खुलेआम हो रहा है। इसके अलावा सब्जियों को कृत्रिम रंग से रंगने का काम भी बड़ी-बड़ी मंडियों में चल रहा है। आरटीआई ऐक्टिविस्ट सलीम बेग द्वारा पूछे गए सूचना का अधिकार के तहत खा एवं औषधि प्रशासन विभाग के आयुक्त ने स्वीकार भी किया है कि प्रदेश में कृत्रिम रूप से रंगी गई कच्ची सब्जियों के 124 नमूने संग्रहीत कर जांच कराई गई। जांच में पांच नमूने अखा रंगों से रंगे हुए पाए गए। खा आयुक्त ने बताया कि अखा रंगों से रंगी पाई गई पांच नमूनों की सब्जियों के विक्रेताओं को दंडित कराने के लिए खा अपमिश्रण निवारण अधिनियम के तहत मुकदमा सक्षम न्यायालय में दायर कराए गए। दरअसल जहर के बड़े कारोबारियों के हाथ इतने लम्बे हैं कि खा एवं औषधि प्रशासन विभाग उन्हें पकड़ने की हिमाकत नहीं कर पाता है। विभाग सिर्फ छापेमारी के जरिए उसे ही पकड़ रहा है जो उनके हाथों की कठपुतली बने हुए हैं। सब्जियों में हार्मोन्स की सूई लगाने जैसे अपराध पर भी विभाग ने अपना पल्ला झाड़ लिया है। डीएनए ने जब खा एवं औषधि प्रशासन विभाग के विशेष सचिव शिव श्याम मिश्रा से इस बाबत पूछा तो वे हार्टीकल्चर विभाग पर इसका ठीकरा फोड़ने लगे। श्री मिश्र ने कहा कि पहले आप हार्टीकल्चर से यह पूछो कि वे सब्जियों, फलों व अन्य शाक-भाजी के विकास में क्या प्रमोट करते हैं? वह यूरिया है या अन्य फर्टिलाइजर? अगर सब्जियों की पैदावार में ऑक्सीटोसिन इस्तेमाल किया जा रहा है तो इसे रोकने की जिम्मेदारी उनकी है। हमारी नहीं। उधर विशेष सचिव ने कहा कि हमने 29 लाख ऑक्सीटोसिन के डोज छापेमारी के दौरान पकड़े हैं। बीते नौ महीने में 76 को जेल भेजा है और 89 लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराई है। मगर खा एवं औषधि प्रशासन विभाग ने सब्जियों में हार्मोन्स की सूई लगाकर पैदावार बढ़ाने सम्बंधी किसी ऐसी शिकायत से साफ इनकार कर दिया है। मगर जिस प्रकार कृत्रिम रूप से रंगी गई कच्ची सब्जियों को बेचने तथा हार्मोन्स की सूई के जरिए सब्जियों की पैदावार बढ़ाई जा रही है उससे घातक बीमारियां हो सकती हैं। आयुर्वेदिक चिकित्सक डॉ. भगवान सिंह ने बताया कि रंगी गई सब्जियों से चर्म रोग, अल्सर तथा पाचन तंत्र खराब हो जाता है। आंतों पर प्रभाव पड़ता है। कैंसर की संभावना बढ़ जाती है।
Wednesday, January 26, 2011
जैविक खाद से भट्ठों पर पकाई जा रही ईंट
जमीन के लिए सबसे ताकतवर खाद ‘प्रेस मड’
इसके इस्तेमाल से बढ़ जाता है जीवाश्म का लेवल
खेतों के लिए गुणवान है मैली
मुरादाबाद। गन्ने की मैली यानी ‘प्रेस मड’ को उम्दा जैविक खाद माना जाता है। खेतों में इसके इस्तेमाल से न केवल जीवाश्म का लेवल बढ़ता है बल्कि लाभकारी आर्गेनिक कार्बन मिट्टी में पहुंचते हैं। लेकिन खेतों की ‘जान’ कही जाने वाली इस मैली का इस्तेमाल ईंधन के रूप में हो रहा है। भट्ठों में इसे झोंक ईंट पकाई जा रही हैं। हालांकि इस पर सिर्फ किसानों का हक होना चाहिए लेकिन सरकारी मशीनरी की अनदेखी और सख्त कानून न बनने से उत्तर प्रदेश की धरती को एक बड़ा नुकसान झेलना पड़ रहा है।
रासायनिक खादों के अंधाधुंध इस्तेमाल से बिगड़ती जमीन की दशा को सुधारने के लिए यूं तो हर साल करोड़ों का बजट जारी होता है। जैविक खाद के बढ़ावे को तमाम प्रोग्राम बने हैं। लेकिन दूसरी तरफ जैविक खाद की सूची में नंबर एक पर गिनी जाने वाली मैली को जलाया जा रहा है। उत्तर प्रदेश में 126 चीनी मिलें गन्ने की खरीद कर रही हैं। एक मिल में लाखों कुंतल गन्ने की पेराई होती है। एक कुंतल गन्ने में करीब चार प्रतिशत मैली निकलती है। अनुमान लगाइए कि अगर इस मैली को प्रदेश के गन्ना किसानों को ही दे दिया जाए तो कितना मुनाफा होगा। गन्ने की पैदावार में तो बढ़ोत्तरी होगी ही क्वालिटी भी सुधर जाएगी। मौजूदा समय में मैली सोलह से अट्ठारह रुपये कुंतल बेची जा रही है। जबकि पिछले साल मुश्किल से आठ रुपये कुंतल बिकी। प्रदेश में ईंट भट्ठों की संख्या लगातार बढ़ रही है जिससे मैली के रेट भी बढ़ गए हैं।
भट्ठा मालिकों का कहना है कि गन्ने की मैली सूखने के बाद कोयले से भी अच्छी जलती है। इसका ईंधन सस्ता भी पड़ता है। उपगन्ना आयुक्त सुल्तान अहमद ने बताया कि मैली तो किसानों को अभी भी मिल रही है लेकिन भट्ठों पर भी जलाई जा रही है। मैली अच्छी खाद मानी जाती है लिहाजा खेतों में ही पहुंचनी चाहिए।
मैली के इस दुरुपयोग को रोकने के लिए प्रदेश सरकार कानून बनाने जा रही है जिसके लिए हर जिले से रिपोर्ट मंगाई जा चुकी है।
कृषि विभाग के डिप्टी डायरेक्टर वीरेंद्र त्रिपाठी का कहना है कि इसके इस्तेमाल से पैदावार में इजाफा हो जाता है। इसमें नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटाश के साथ तमाम सूक्ष्म माइक्रो एलीमेंट होते हैं। मिट्टी के लिए लाभकारी जीवाणुओं की संख्या भी बढ़ जाती है। पौधे में रोग से लड़ने की ताकत आती है। क्योंकि भूमि की जलधारण क्षमता बढ़ती है लिहाजा बार बार सिंचाई भी नहीं करनी पड़ती।
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